भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१७७ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •

जामातासे कहा—'राजन्! बताइये, मैं इस विवाहमें दहेजके रूपमें आपको क्या दूँ? मेरी तपस्या अप्रतिहत है। मैं आपको दुर्लभ वस्तु भी दे सकता हूँ।'

राजा ने कहा—मुने! मेरा जन्म स्वायम्भुव मनुके वंशमें हुआ है। अतः मैं आपकी कृपासे ऐसा पुत्र चाहता हूँ, जो मन्वन्तरका स्वामी हो।

ऋषि बोले—राजन्! तुम्हारी यह कामना पूर्ण होगी। तुम्हारा पुत्र मनु होकर सम्पूर्ण पृथ्वीका उपभोग करेगा और धर्मका ज्ञाता होगा।

तब राजा उस स्त्रीको साथ ले अपने नगरको चले गये। उनसे रेवतीके गर्भसे रैवतका जन्म हुआ, जो सब धर्मोंसे सम्पन्न और मनुष्योंसे अजेय थे। वे सब शास्त्रोंके ज्ञाता और वेदविद्याके विशारद थे। उनके मन्वन्तरमें सुमेधा, भूपति, वैकुण्ठ और अमिताभ—ये चार देवगण थे। इनमेंसे प्रत्येक गणमें चौदह-चौदह देवता थे। इन चारों देवगणोंके स्वामी विभु नामक इन्द्र थे, जिन्होंने सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके इस पदको प्राप्त किया था। हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य, महामुनि तथा वेद-वेदांगोंके पारगामी महाभाग वसिष्ठ—ये सात रैवत मन्वन्तरके सप्तर्षि थे। बलबन्धु, महावीर्य, सुद्युम्न तथा सत्यक आदि रैवत मनुके पुत्र थे।


चाक्षुष मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन

मार्कण्डेयजी कहते हैं—मुने! यह मैंने तुम्हें पाँचवें मन्वन्तरकी कथा सुनायी है। अब चाक्षुष मनुके छठे मन्वन्तरका वृत्तान्त सुनो। ब्रह्मन्! वे पूर्वजन्ममें ब्रह्माजीके चक्षुसे उत्पन्न हुए थे, इसलिये इस जन्ममें भी उनका नाम चाक्षुष ही हुआ। यद्यपि महात्मा अनमित्रकी पत्नी भद्राने एक पुत्रको जन्म दिया, जो बहुत ही विद्वान्, पवित्र, पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाला और समर्थ था। उस पुत्रको गोदमें लेकर माता बारंबार पुचकारती, प्यारसे बुलाती और स्नेहवश छातीसे चिपका लेती थी; किन्तु वह तो पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाला था, अतः माताकी गोदमें पड़ा-पड़ा हँसने लगा। इसपर माता बोली—'बेटा! यह क्या? मैं तो डर गयी हूँ; तुम्हारे मुखपर यह हास्य कैसा? क्या तुम्हें असमयमें ही बोध हो गया? क्या तुम कोई शुभ देख रहे हो?'

पुत्र बोला—माँ! क्या तुम नहीं देखती, सामने जो यह बिल्ली खड़ी है मुझे खा जाना चाहती है। दूसरी ओर जातहारिणी मुझे हड़प लेनेको तैयार है। यह अदृश्यभावसे खड़ी है। इधर तुम पुत्र-प्रेमके कारण अत्यन्त स्नेहवश मेरी ओर देखती, बारंबार मुझे बुलाती और छातीसे लगाती हो। तुम्हारे शरीरमें रोमाञ्च हो आता है। वात्सल्य-स्नेहके कारण तुम्हारे नेत्र आँसुओंसे भीग रहे हैं। यही सब देखकर मुझे हँसी आ गयी। जैसे ये दोनों स्वार्थवश स्निग्ध हृदयसे मेरी ओर देखती हैं, उसी प्रकार तुम भी स्वार्थको लेकर ही मुझसे स्नेह करती जान पड़ती हो। अन्तर इतना ही है कि बिल्ली और जातहारिणी तो मुझे अभी खा जाना चाहती हैं और तुम धीरे-धीरे मुझसे प्राप्त होनेवाले उपभोगयोग्य फलकी कामना रखती हो।

माताने कहा—बेटा! मैं उपकारके लिये नहीं, प्रेमके कारण ही तुम्हें छातीसे लगाती हूँ। यदि इससे तुम्हें प्रसन्नता नहीं होती तो इसका