संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१७७ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •
जामातासे कहा—'राजन्! बताइये, मैं इस विवाहमें दहेजके रूपमें आपको क्या दूँ? मेरी तपस्या अप्रतिहत है। मैं आपको दुर्लभ वस्तु भी दे सकता हूँ।'
राजा ने कहा—मुने! मेरा जन्म स्वायम्भुव मनुके वंशमें हुआ है। अतः मैं आपकी कृपासे ऐसा पुत्र चाहता हूँ, जो मन्वन्तरका स्वामी हो।
ऋषि बोले—राजन्! तुम्हारी यह कामना पूर्ण होगी। तुम्हारा पुत्र मनु होकर सम्पूर्ण पृथ्वीका उपभोग करेगा और धर्मका ज्ञाता होगा।
तब राजा उस स्त्रीको साथ ले अपने नगरको चले गये। उनसे रेवतीके गर्भसे रैवतका जन्म हुआ, जो सब धर्मोंसे सम्पन्न और मनुष्योंसे अजेय थे। वे सब शास्त्रोंके ज्ञाता और वेदविद्याके विशारद थे। उनके मन्वन्तरमें सुमेधा, भूपति, वैकुण्ठ और अमिताभ—ये चार देवगण थे। इनमेंसे प्रत्येक गणमें चौदह-चौदह देवता थे। इन चारों देवगणोंके स्वामी विभु नामक इन्द्र थे, जिन्होंने सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके इस पदको प्राप्त किया था। हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य, महामुनि तथा वेद-वेदांगोंके पारगामी महाभाग वसिष्ठ—ये सात रैवत मन्वन्तरके सप्तर्षि थे। बलबन्धु, महावीर्य, सुद्युम्न तथा सत्यक आदि रैवत मनुके पुत्र थे।
चाक्षुष मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन
मार्कण्डेयजी कहते हैं—मुने! यह मैंने तुम्हें पाँचवें मन्वन्तरकी कथा सुनायी है। अब चाक्षुष मनुके छठे मन्वन्तरका वृत्तान्त सुनो। ब्रह्मन्! वे पूर्वजन्ममें ब्रह्माजीके चक्षुसे उत्पन्न हुए थे, इसलिये इस जन्ममें भी उनका नाम चाक्षुष ही हुआ। यद्यपि महात्मा अनमित्रकी पत्नी भद्राने एक पुत्रको जन्म दिया, जो बहुत ही विद्वान्, पवित्र, पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाला और समर्थ था। उस पुत्रको गोदमें लेकर माता बारंबार पुचकारती, प्यारसे बुलाती और स्नेहवश छातीसे चिपका लेती थी; किन्तु वह तो पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाला था, अतः माताकी गोदमें पड़ा-पड़ा हँसने लगा। इसपर माता बोली—'बेटा! यह क्या? मैं तो डर गयी हूँ; तुम्हारे मुखपर यह हास्य कैसा? क्या तुम्हें असमयमें ही बोध हो गया? क्या तुम कोई शुभ देख रहे हो?'
पुत्र बोला—माँ! क्या तुम नहीं देखती, सामने जो यह बिल्ली खड़ी है मुझे खा जाना चाहती है। दूसरी ओर जातहारिणी मुझे हड़प लेनेको तैयार है। यह अदृश्यभावसे खड़ी है। इधर तुम पुत्र-प्रेमके कारण अत्यन्त स्नेहवश मेरी ओर देखती, बारंबार मुझे बुलाती और छातीसे लगाती हो। तुम्हारे शरीरमें रोमाञ्च हो आता है। वात्सल्य-स्नेहके कारण तुम्हारे नेत्र आँसुओंसे भीग रहे हैं। यही सब देखकर मुझे हँसी आ गयी। जैसे ये दोनों स्वार्थवश स्निग्ध हृदयसे मेरी ओर देखती हैं, उसी प्रकार तुम भी स्वार्थको लेकर ही मुझसे स्नेह करती जान पड़ती हो। अन्तर इतना ही है कि बिल्ली और जातहारिणी तो मुझे अभी खा जाना चाहती हैं और तुम धीरे-धीरे मुझसे प्राप्त होनेवाले उपभोगयोग्य फलकी कामना रखती हो।
माताने कहा—बेटा! मैं उपकारके लिये नहीं, प्रेमके कारण ही तुम्हें छातीसे लगाती हूँ। यदि इससे तुम्हें प्रसन्नता नहीं होती तो इसका
- चाक्षुष मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन * १७१
अर्थ यह है कि तुमने मुझे त्याग दिया। लो, तुमसे प्राप्त होनेवाले स्वार्थका मैंने परित्याग कर दिया।
यों कहकर वह बालकको वहीं छोड़ सूतिका गृहसे बाहर निकल गयी। उसी समय जातहारिणीने उस शुद्धात्मा बालकको हड़प लिया और उसे ले जाकर राजा विक्रान्तकी पत्नीके शयन-गृहमें सुला दिया। फिर रानीके नवजात पुत्रको ले जाकर दूसरेके घरमें रख दिया और उसके बालकको ले जाकर अपना ग्रास बना लिया। इस प्रकार नवजात शिशुओंको चुरानेवाली वह क्रूर राक्षसी तीसरे घरके बालकको खा लिया करती थी। बालकोंके चुराने और बदलनेका काम वह प्रतिदिन करती थी। राजा विक्रान्तने अपने घरमें आये हुए बालकका क्षत्रियोचित संस्कार कराया और बड़ी प्रसन्नताके साथ नामकरण-संस्कारकी विधि पूरी करके उसका नाम आनन्द रखा। जब बालक कुछ बड़ा हुआ, तब उसका उपनयन-संस्कार करते समय आचार्यने कहा—'वत्स ! पहले अपनी माँके पास जाकर उन्हें प्रणाम करो।' गुरुकी बात सुनकर बालक हँस पड़ा और बोला—'गुरुदेव ! मैं किस माताको प्रणाम करूँ—जन्म देनेवाली अथवा पालन करनेवालीको ? मैं राजा अनमित्रके घरमें उनकी धर्मपत्नी गिरिभद्रा देवीके गर्भसे उत्पन्न हुआ; किन्तु जातहारिणी मुझे उठा ले आयी और यहाँ हैमिनीके पास छोड़कर इसके पुत्रको स्वयं उठा ले गयी। फिर उसे भी विप्रवर घोषके गृहमें ले जाकर उसने रख दिया और उनके पुत्रको हड़पकर भक्षण कर लिया। रानी हैमिनीका पुत्र वहाँ ब्राह्मणोचित संस्कारोंके साथ पालित हो रहा है और मेरा यहाँ आप संस्कार करा रहे हैं। मुझे आपकी आज्ञाका पालन करना है; अतः बताइये, किस माताके पास प्रणाम करनेके लिये जाऊँ ?'
गुरु बोले—बेटा ! यह बड़ा गहन संकट उपस्थित हुआ। मेरी समझमें तो कुछ भी नहीं आता। मोहसे मेरी बुद्धि भ्रान्त हो रही है।
आनन्दने कहा—ब्रह्मर्षे ! संसारकी ऐसी ही व्यवस्था है। इसमें मोहके लिये कहाँ अवसर है। सोचिये तो कौन किसका पुत्र है और कौन किसका बन्धु। जीव जन्म लेनेके बादसे ही मनुष्योंका सम्बन्धी होता है, किन्तु मरते ही उसके सभी सम्बन्धी छूट जाते हैं। यहाँ भी जिसका जन्म हुआ है और जन्मके साथ ही बन्धु-बान्धवोंसे सम्बन्ध जुड़ गया है, उस देहका अन्त होते ही सारा सम्बन्ध टूट जाता है। इसीलिये मैं कहता हूँ, संसारमें रहनेवाले जीवका कोई भी बन्धु-बान्धव नहीं है। भला, कौन किसीके साथ सदा ही बन्धुत्व निभाता है। मैंने तो इसी जन्ममें दो माताएँ और दो पिता प्राप्त किये। फिर यदि दूसरी देह धारण करनेपर वे सम्बन्ध बढ़ें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। अतः अब मैं तपस्या करूँगा। आप विशाल नामक ग्रामसे, इस राजाके पुत्रको, जो चैत्र नामसे विख्यात है, यहाँ बुला लीजिये।
आनन्दकी बात सुनकर राजा अपनी स्त्री और बन्धु-बान्धवोंके साथ बड़े विस्मयमें पड़े और उसकी ओरसे ममता हटाकर उन्होंने उसे वन जानेकी अनुमति दे दी। फिर अपने पुत्र चैत्रको बुलाकर उसे राज्य करनेके योग्य बनाया और जिसने गुप्त-बुद्धिसे उसका पालन किया था, उस ब्राह्मणका भी भलीभाँति सम्मान किया। आनन्द तपस्यामें लगे थे। उन्हें तपस्या करते देख ब्रह्माजीने पूछा—'वत्स ! बताओ तो सही, किसलिये इतना कठोर तप करते हो ?
१७२
- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
आनन्दने कहा—भगवन्! मैं आत्मशुद्धिके लिये तपस्या कर रहा हूँ। बन्धनके हेतुभूत जो मेरे कर्म हैं, उनका नाश हो जाय—यही इस तपस्याका उद्देश्य है।
ब्रह्माजी बोले—जिसके कर्म-भोगका अधिकार क्षीण हो जाता है, वही मुक्तिके योग्य होता है। जिसके पास कर्मोंका संचय है, वह नहीं। तुम तो सत्त्वाधिकारी हो, मुक्ति कैसे पा सकोगे। तुम्हें छठा मनु होना है; चलो, अपने अधिकारका पालन करो। तुम्हारे लिये तपस्याकी आवश्यकता नहीं है। मनुकी मर्यादाका पालन करके तुम मुक्त हो जाओगे।
ब्रह्माजीके यों कहनेपर परम बुद्धिमान् आनन्दने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और तपस्यासे विरत होकर मनुका कार्य पूर्ण करनेके लिये वहाँसे चल दिये। ब्रह्माजीने उन्हें तपस्यासे हटाते समय चाक्षुष नामसे सम्बोधित किया था, इसलिये वे उसी नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्होंने राजा उग्रकी कन्या विद्रम्भासे विवाह किया और उसके गर्भसे विख्यात पराक्रमी-अनेक पुत्र उत्पन्न किये। चाक्षुष मन्वन्तरमें आर्य्य, प्रसूत, भव्य, पृथग और लेख—ये पाँच देवगण थे। इन सभी गणोंमें आठ-आठ देवताओंका संनिवेश था। सब देवता यज्ञभोजी एवं अमृताशी थे। इन सबके स्वामी मनोजव नामक इन्द्र थे, जिन्होंने सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंका आधिपत्य प्राप्त किया था। उस समय सुमेधा, विरजा, हविष्मान्, उन्नत, मधु, अतिनामा और सहिष्णु—ये सात सप्तर्षि थे। ऊरु, पुरु और शतद्युम्न आदि महाबली नरेश चाक्षुष मनुके पुत्र थे, जिन्होंने इस पृथ्वीका राज्य किया। इस समय वैवस्वत नामके सातवें मनु राज्य करते हैं। उनके मन्वन्तरमें जो देवता आदि हुए हैं, उनका वर्णन सुनो।
वैवस्वत मन्वन्तरकी कथा तथा सावर्णिक मन्वन्तरका संक्षिप्त परिचय
मार्कण्डेयजी कहते हैं—विश्वकर्माकी पुत्री संज्ञा भगवान् सूर्यकी पत्नी हैं। उनके गर्भसे वैवस्वत मनुका जन्म हुआ, जो विख्यात यशस्वी और अनेक विषयोंके ज्ञानमें पारङ्गत थे। विवस्वान्के पुत्र होनेके कारण ही वे वैवस्वत कहलाये। जब भगवान् सूर्य संज्ञाकी ओर देखते तो वे अपनी आँखें बंद कर लेती थीं। इससे रुष्ट होकर सूर्यने संज्ञासे यह निष्ठुर वचन कहा—'ओ मूर्खे ! तू मुझे देखकर सदा नेत्रोंका संयम करती (आँखें मूँद लेती) है। इसलिये तेरे गर्भसे प्रजाजनोंको संयम (शासन)-में रखनेवाला यम उत्पन्न होगा।'
यह सुनकर संज्ञादेवी भयसे व्याकुल हो उठीं। उनकी दृष्टि चञ्चल हो गयी। यह देख सूर्यने फिर कहा—'तूने इस समय मुझे देखकर
- वैवस्वत मन्वन्तरकी कथा तथा सावर्णिक मन्वन्तरका संक्षिप्त परिचय * १७३
अपनी दृष्टि चञ्चल की है, इसलिये चञ्चल लहरोंसे युक्त नदी तेरी कन्याके रूपमें उत्पन्न होगी। तदनन्तर पतिके शापसे संज्ञाने एक पुत्र और पुत्रीको जन्म दिया। पुत्रका नाम यम हुआ और पुत्री यमुना नामसे विख्यात महानदी हुई। संज्ञा सूर्यके तेजको बड़े कष्टसे सहन करती थी। वह उसके लिये असह्य था। उसने सोचा—‘क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कहाँ जानेसे मुझे शान्ति मिलेगी और मेरे स्वामी मुझपर कुपित भी नहीं होंगे?’ इस तरह अनेक प्रकारसे विचार करके प्रजापतिकुमारी संज्ञाने पिताके घरका आश्रय लेना ही ठीक समझा। वहाँ जानेके लिये उद्यत होकर उसने अपनी छायाको ही सूर्यदेवकी पत्नी बनाया और उससे कहा—‘तू इस घरमें रह और मेरी ही तरह सब संतानों तथा भगवान् सूर्यके प्रति भी उत्तम बर्ताव करना।’
यों कहकर संज्ञादेवी अपने पिताके घर चली गयीं। वहाँ उन्होंने त्वष्टा प्रजापतिका दर्शन किया, उन्होंने भी बड़े आदरके साथ पुत्रीका स्वागत-सत्कार किया। वे कुछ कालतक वहाँ रहीं। इसके बाद पिताने उन्हें प्रेमपूर्वक समझाते हुए कहा—‘बेटी! तुम तीनों लोकके स्वामी भगवान् सूर्यकी पत्नी हो। अतः तुम्हें अधिक समयतक पिताके घरमें नहीं ठहरना चाहिये। अब तुम स्वामीके घर जाओ। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ।’
पिताके यों कहनेपर संज्ञाने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और उन्हें प्रणाम करके वहाँसे चली गयीं। वे सूर्यके तेजसे बहुत डरती थीं और उनके तापका सामना करना नहीं चाहती थीं; इसलिये उत्तरकुरुमें जाकर घोड़ीके रूपमें रहने और तपस्या करने लगीं। उधर छायासंज्ञाको ही संज्ञा समझकर भगवान् सूर्यने उससे दो पुत्र और एक मनोहर कन्या उत्पन्न की। छायासंज्ञा अपनी संतानोंको जितना प्यार करती थी, उतना संज्ञाके पुत्र-पुत्रीको नहीं। मनु तो उसके इस बर्तावको सह लेते थे, किन्तु यमसे सहन नहीं हुआ। उन्होंने क्रोधमें आकर उसे मारनेके लिये लात उठायी, किन्तु फिर क्षमा-भावका आश्रय ले उसके शरीरपर लात नहीं लगायी। तब छायासंज्ञाने कुपित हो यमको शाप दिया—‘मैं तुम्हारे पिताकी पत्नी हूँ, किन्तु तुम मर्यादाका उल्लङ्घन करके मुझे मारनेके लिये लात उठा रहे हो; इसलिये तुम्हारा यह पैर आज ही पृथ्वीपर गिर पड़ेगा।’
माताका दिया हुआ शाप सुनकर यम भयसे व्याकुल हो उठे और अपने पिताके पास जा उन्हें प्रणाम करके बोले—‘पिताजी! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है; ऐसा तो कभी किसीने भी नहीं देखा होगा कि माता वात्सल्य छोड़कर अपने पुत्रको शाप दे डाले। दुर्गुणी पुत्रोंके प्रति भी माताका दुर्भाव नहीं होता।' यमराजकी यह बात सुनकर भगवान् सूर्यने छायासंज्ञाको बुलाकर पूछा—'संज्ञा कहाँ गयी?' वह बोली—'नाथ! मैं ही तो त्वष्टा प्रजापतिकी कन्या और आपकी पत्नी संज्ञा हूँ। आपने मुझसे ही ये संतान उत्पन्न किये हैं।' सूर्यने कई बार घुमा-फिराकर पूछा, किन्तु उसने सच्ची बात नहीं बतायी। तब सूर्यदेव उसे शाप देनेको उद्यत हुए, यह देख उसने सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। असली बातका पता लगनेपर भगवान् सूर्य विश्वकर्माके घर गये। विश्वकर्माने अपने घर पधारे हुए त्रिलोकपूजित सूर्यदेवका बड़ी भक्तिके साथ पूजन किया। फिर संज्ञाका पता पूछनेपर उन्होंने कहा—‘भगवन्! वह मेरे घरपर आयी अवश्य थी, किन्तु मैंने पुनः उसे
१७४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
आपके ही घर भेज दिया।' तब सूर्यने समाधिस्थ होकर देखा, वह घोड़ीका रूप धारणकर उत्तरकुरु देशमें तपस्या कर रही है। उसकी तपस्याका एक ही उद्देश्य है, 'मेरे स्वामीकी आकृति सौम्य एवं शुभ हो जाय।' सूर्यको उसकी तपस्याका उद्देश्य ज्ञात हो गया; अतः उन्होंने विश्वकर्मासे कहा- 'आप मेरे तेजको छाँट दीजिये।' तब उन्होंने संवत्सररूप चक्रवाले सूर्यके तेजको छाँट दिया, उस समय देवताओने उनकी बड़ी प्रशंसा की। तदनन्तर देवताओं और ऋषियोंने सम्पूर्ण त्रिभुवनके पूजनीय भगवान् सूर्यका स्तवन आरम्भ किया-
देवा ऊचुः नमस्ते ऋक्स्वरूपाय सामरूपाय ते नमः। यजुःस्वरूपरूपाय साम्नां धामवते नमः॥ ज्ञानैकधामभूताय निर्धूततमसे नमः। शुद्धज्योतिःस्वरूपाय विशुद्धायामलात्मने॥ वरिष्ठाय वरेण्याय परस्मै परमात्मने। नमोऽखिलजगद्व्यापिस्वरूपायात्ममूर्त्तये ॥ सर्वकारणभूताय निष्ठाय ज्ञानचेतसाम्। नमः सूर्यस्वरूपाय प्रकाशात्मस्वरूपिणे॥ भास्कराय नमस्तुभ्यं तथा दिनकृते नमः। शर्वरीहेतवे चैव सन्ध्याज्योत्स्नाकृते नमः॥
देवता बोले—भगवन्! ऋग्वेदस्वरूप आपको नमस्कार है। सामवेदरूप आपको प्रणाम है। यजुर्वेदस्वरूप आपको नमस्कार है। आप ही समस्त सामोंके अधिष्ठान हैं, आपको प्रणाम है। आप ज्ञानके एकमात्र आधार एवं अन्धकारका नाश करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप शुद्ध ज्योतिर्मय है। आप स्वभावसे ही परम शुद्ध एवं निर्मलात्मा हैं, आपको प्रणाम है। आप सबसे महान्, सर्वश्रेष्ठ, सबसे परे और साक्षात् परमात्मा हैं। आपका स्वरूप सम्पूर्ण जगत्में व्यापक है। आप सबके आत्मरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप सबकी उत्पत्तिके कारण, ज्ञानका चिन्तन करनेवाले पुरुषोंके प्राप्य स्थान, सूर्यस्वरूप तथा प्रकाशात्मारूप हैं। आपको नमस्कार है। प्रभाका विस्तार करनेवाले आपको नमस्कार है। दिनकी सृष्टि करनेवाले आपको प्रणाम है। रात्रिके हेतु भी आप ही हैं तथा संध्या, और चाँदनीकी सृष्टि भी आप ही करते हैं; आपको नमस्कार है।
त्वं सर्वमेतद् भगवन् जगदुद्भ्रमता त्वया। भ्रमत्यविद्धमखिलं ब्रह्माण्डं सचराचरम्॥ त्वदंशुभिरिदं स्पृष्टं सर्वं संजायते शुचि। क्रियते त्वत्करैः स्पर्शाज्जलादीनां पवित्रता॥ होमदानादिको धर्मो नोपकाराय जायते। तावद् यावन्न संयोगि जगदेतत् त्वदंशुभिः॥
भगवन्! आप ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं। आपमें ही चराचर प्राणियोंसहित समस्त ब्रह्माण्ड ओतप्रोत है; अतएव ऊर्ध्वलोकमें जब आप भ्रमण करते हैं तो आपके साथ यह ब्रह्माण्ड भी घूमता है। आपकी किरणोंका स्पर्श पाकर ही सम्पूर्ण वस्तुएँ पवित्र होती हैं। आपकी किरणें ही अपने स्पर्शसे जल आदिको पवित्र करती हैं। जबतक इस जगत्में आपकी दिव्य रश्मियोंका संयोग नहीं होता, तबतक होम-दान आदि धर्म सफल नहीं हो पाता।
ऋचस्ते सकला होता यजूंष्येतानि चान्यतः। सकलानि च सामानि निपतन्ति त्वदङ्गतः॥ ऋङ्मयस्त्वं जगन्नाथ त्वमेव च यजुर्मयः। यतः साममयश्चैव ततो नाथ त्रयीमयः॥ त्वमेव ब्रह्मणो रूपं परं चापरमेव च। मूर्त्तामूर्त्तस्तथा सूक्ष्मः स्थूलरूपस्तथा स्थितः॥ निमेषकाष्ठादिमयः कालरूपः क्षयात्मकः।
- वैवस्वत मन्वन्तरकी कथा तथा सावर्णिंक मन्वन्तरका संक्षिप्त परिचय * १७५
प्रसीद स्वेच्छया रूपं स्वतेजःशमने कुरु॥
ऋग्वेदकी ये सम्पूर्ण ऋचाएँ, दूसरी ओर यजुर्वेदके ये सब मन्त्र तथा सामवेदकी सम्पूर्ण श्रुतियाँ आपके ही अङ्गोंसे प्रकट होती हैं। जगन्नाथ! आप ऋग्वैदमय हैं, आप ही यजुर्वेदमय हैं तथा आप ही सामवेदमय हैं। नाथ! इस प्रकार आप त्रयीमय हैं—तीनों वेद आपके ही स्वरूप हैं। आप ही ब्रह्मके पर और अपर रूप हैं। मूर्त्त, अमूर्त्त, स्थूल और सूक्ष्म सभी रूपोंमें आपकी ही स्थिति है। निमेष, काष्ठा आदि जो कालके छोटे-छोटे विभाग हैं, वे सब आपके ही स्वरूप हैं। आप ही क्षणात्मक (प्रतिक्षण बीतनेवाला) कालरूप हैं। भगवन्! आप प्रसन्न होइये और अपनी इच्छासे ही अपने प्रचण्ड तेजको शान्त कीजिये।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—देवताओं और देवर्षियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर तेजोराशि अविनाशी भगवान् सूर्यने विश्वकर्माके द्वारा अपने तेजको कम कर दिया। उनका जो ऋग्वेदद्मय तेज था, उससे पृथ्वीका निर्माण हुआ। यजुर्वेदमय तेजसे द्युलोककी रचना हुई और सामवेदमय तेज ही स्वर्गलोकके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ। विश्वकर्माने सूर्यके तेजके सोलह भागोंमेंसे पंद्रह भाग छाँट दिये और उनके द्वारा शंकरजीका त्रिशूल, भगवान् विष्णुका चक्र, वसुगणोंके भयंकर शङ्कु, अग्निकी शक्ति, कुबेरकी शिविका तथा अन्यान्य देवता, यक्ष एवं विद्याधरोंके लिये भयंकर अस्त्र शस्त्र बनाये। भगवान् सूर्य तबसे अपने तेजके सोलहवें भागको धारण करते हैं। तेज कम होनेके बाद वे अश्वका रूप धारण करके उत्तरकुरु नामक देशमें गये और वहाँ उन्होंने घोड़ीके रूपमें संज्ञाको देखा। उन्हें आते देख संज्ञाको पराये पुरुषकी आशङ्का हुई, इसलिये वह अपने पृष्ठभागकी रक्षा करती हुई सामनेकी ओरसे उनके सम्मुख गयी; फिर वहाँ उनके मिलनेपर पहले दोनोंकी नासिकाका संयोग हुआ। इससे अश्वरूपधारिणी संज्ञाके मुखसे दो पुत्र प्रकट हुए, जो नासत्य और दस्र नामसे प्रसिद्ध हुए। फिर वीर्यपातके अनन्तर रेवन्त नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो ढाल, तलवार और कवच धारण किये, बाण और तरकससे सुसज्जित हो घोड़ेपर चढ़ा हुआ ही प्रकट हुआ था।
तत्पश्चात् भगवान् सूर्यने संज्ञाको अपने अनुपम स्वरूपका दर्शन कराया। उनके इस रूपको देखकर संज्ञाको बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर उसने भी अपना रूप धारण कर लिया। तब सूर्यदेव अपनी प्रीतिमती पत्नी संज्ञाको साथ ले अपने निवास-स्थानपर आये। भगवान् सूर्यके जो प्रथम पुत्र थे, उनकी वैवस्वत नामसे प्रसिद्धि हुई। दूसरे पुत्रका नाम यम था। ये माताके शापसे ग्रस्त थे। पिताने इनके शापका अन्त इस प्रकार किया था—‘कीड़े यमके पैरका मांस लेकर पृथ्वीपर गिर पड़ेंगे। फिर इनका पैर ठीक हो जायगा।’ यम धर्मपर दृष्टि रखते थे और मित्र तथा शत्रुके प्रति उनका समान भाव था। अतः सूर्यने प्रजाओंके धर्माधर्मका फल देनेके लिये उन्हें यमराजके पदपर प्रतिष्ठित किया। यमुना कलिन्दपर्वतके बीचसे बहनेवाली नदी हो गयी। दोनों अश्विनीकुमार देवताओंके वैद्य नियुक्त किये गये। रेवन्तको भी गुह्यकोंका स्वामी बनाया गया। अब छायासंज्ञाके पुत्रोंकी जहाँ नियुक्ति हुई, उसका हाल सुनो। छायासंज्ञाके ज्येष्ठ पुत्रका वर्ण (रूप-रंग) वैवस्वत मनुके ही समान था, अतः वे सावर्णिंक नामसे प्रसिद्ध हुए। वे ही आठवें मनु होंगे। उस समय राजा बलि इन्द्रके पदपर प्रतिष्ठित रहेंगे। छायाके दूसरे पुत्र शनैश्चरको पिताने ग्रहोंके
१७६
- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
| पद्ममें नियुक्त किया। तीसरी संतान तपती नामकी कन्या थी। उसने राजा संवरणको अपना स्वामी बनाया और उनसे कुरु नामक पुत्रको जन्म दिया। ये कुरु एक प्रसिद्ध राजा हुए। <br> वैवस्वत मन्वन्तरमें आठ देवगण माने गये हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, विश्वेदेव, मरुत्, भृगु तथा अङ्गिरा। इनमें आदित्यगण, मरुद्गण तथा रुद्रगण कश्यपजीके पुत्र हैं। साध्यगण, वसुगण और विश्वेदेवगण—ये धर्मके पुत्र हैं। भृगुगण भृगुके और आङ्गिरसगण महर्षि अङ्गिराके पुत्र हैं। ब्रह्मन्! यह सब नारीच सर्ग है। मरीचिनन्दन कश्यपकी संतान होनेके कारण इन्हें मारीच कहते हैं। इस मन्वन्तरमें जो इन्द्र हैं, उनका नाम ऊर्जस्वी है। वे महात्मा यज्ञभागके भोक्ता हैं। भूत, भविष्य और वर्तमानमें जो इन्द्र होते हैं, उन सबका लक्षण एक सा ही समझना चाहिये। <br> अब वर्तमान त्रिलोकीका वर्णन सुनो। भूर्लोक तो यह पृथ्वी है। अन्तरिक्षको द्युलोक या भुवर्लोक माना गया है और दिव्यलोकको स्वर्लोक कहते हैं। अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र तथा जमदग्नि—ये ही इस मन्वन्तरके सप्तर्षि हैं। इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, अरिष्ट, करूष और पृषध्र—ये नौ वैवस्वत मनुके पुत्र कहे गये हैं। इस प्रकार मैंने तुमसे यह वैवस्वत मन्वन्तरका वर्णन किया है। इसका श्रवण और पाठ करनेसे मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता और महान् पुण्यका भागी होता है। <br> क्रौष्टुकि बोले— महामुने! आपने स्वायम्भुव आदि सात मनुओंका वर्णन किया तथा उनके | मन्वन्तरोंमें जो देवता, राजा और मुनि हुए थे, उनको भी बतलाया। इस कल्पमें जो दूसरे सात मनु होंगे, उनका परिचय दीजिये तथा उनके मन्वन्तरोंमें जो देवता आदि होनेवाले हैं, उनका भी वर्णन कीजिये। <br> मार्कण्डेयजीने कहा— ब्रह्मन्! छायासंज्ञाके पुत्र सवर्णिका नाम मैं तुम्हें बतला चुका हूँ। वे सब बातोंमें अपने बड़े भाई वैवस्वत मनुके ही समान हैं। ये ही आठवें मनु होंगे। परशुराम, व्यास, गालव, दीप्तिमान्, कृप, ऋष्यशृङ्ग तथा अश्वत्थामा—ये सात सावर्णि मन्वन्तरमें सप्तर्षि होंगे। सुतपा, अमिताभ और मुख्य—ये तीन देवगण होंगे। इनमेंसे प्रत्येक गण पृथक्-पृथक् बीस-बीस देवताओंका समुदाय होगा। तपस्तप, शक्र, द्युति, ज्योति, प्रभाकर, प्रभास, दयित, धर्म, तेज, रश्मि तथा वक्रतु आदि देवता सुतपागणके बीस देवताओंके अन्तर्गत हैं। प्रभु, विभु और विभास आदि देवता अमिताभ नामक द्वितीय गणके बीस देवताओंके अन्तर्गत हैं। तीसरे गणके जो बीस देवता हैं, उनमें दम, दान्त, रित, सोम और विन्त आदि प्रधान हैं। वे मुख्यगणके देवता कहे गये हैं। ये सभी मन्वन्तरके स्वामी होंगे। ये मरीचिनन्दन प्रजापति कश्यपके ही पुत्र हैं। विरोचनके पुत्र बलि इनके इन्द्र होंगे। वे बलि आज भी अपनी प्रतिज्ञाके बन्धनसे बँधकर पाताललोकमें विराजमान हैं। विरजा, अर्ववीर, निर्मोह, सत्यवाक्, कृति तथा विष्णु आदि सावर्णि मनुके पुत्र होंगे। |
- मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना * १७७ सावर्णि मनुकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें देवी-माहात्म्य प्रथमोऽध्यायः मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा बताते हुए मधु-कैटभ-वधका प्रसङ्ग सुनाना विनियोग [ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः, नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्, ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः । प्रथम चरित्रके ब्रह्मा ऋषि, महाकाली देवता, गायत्री छन्द, नन्दा शक्ति, रक्तदन्तिका बीज, अग्नि तत्त्व और ऋग्वेद स्वरूप है। श्रीमहाकाली देवताकी प्रसन्नताके लिये प्रथम चरित्रके जपमें विनियोग किया जाता है। ध्यान खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम् । नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ॥ भगवान् विष्णुके सो जानेपर मधु और कैटभको मारनेके लिये कमलजन्मा ब्रह्माजीने जिनका स्तवन किया था, उन महाकाली देवीका मैं सेवन करता हूँ। वे अपने दस हाथोंमें खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शङ्ख धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे समस्त अङ्गोंमें दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके शरीरकी कान्ति नीलमणिके समान है तथा वे दस मुख और दस पैरोंसे युक्त हैं।] ॐ नमश्चण्डिकायै ॥ 'ॐ ऐं' मार्कण्डेय उवाच ॥ १ ॥ सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः । निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम ॥ २ ॥ महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः । स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः ॥ ३ ॥ स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः । सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले ॥ ४ ॥ तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान् । बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा ॥ ५ ॥ तस्य तैरभवद्युद्धमतिप्रबलदण्डिनः । न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः ॥ ६ ॥ ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत् । आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः ॥ ७ ॥ मार्कण्डेयजी बोले- ॥ १ ॥ सूर्यके पुत्र सावर्णि जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्तिकी कथा विस्तारपूर्वक कहता हूँ, सुनो ॥ २ ॥ सूर्यकुमार महाभाग सावर्णि भगवती महामायाके अनुग्रहसे जिस प्रकार मन्वन्तरके स्वामी हुए, वही प्रसङ्ग सुनाता हूँ ॥ ३ ॥ पूर्वकालकी बात है, स्वारोचिष मन्वन्तरमें सुरथ नामके एक राजा थे, जो चैत्रवंशमें उत्पन्न हुए थे। उनका समस्त भूमण्डलपर अधिकार था ॥ ४ ॥ वे प्रजाका अपने औरस पुत्रोंकी भाँति धर्मपूर्वक पालन करते थे; फिर भी उस समय कोलाविध्वंसी२ नामके क्षत्रिय उनके शत्रु हो १. ॐ चण्डीदेवीको नमस्कार है। २. 'कोलाविध्वंसी' यह किसी विशेष कुलके क्षत्रियोंकी संज्ञा है। दक्षिणमें 'कोला' नगरी प्रसिद्ध है, वह प्राचीन कालमें राजधानी थी। जिन क्षत्रियोंने उसपर आक्रमण करके उसको विध्वस्त किया, वे 'कोलाविध्वंसी' कहलाये।
१७८ « संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * गये॥५॥ राजा सुरथकी दण्डनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओंके साथ संग्राम हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्यामें कम थे तो भी राजा सुरथ युद्धमें उनसे परास्त हो गये ॥ ६ ॥ तब वे युद्धभूमिसे अपने नगरको लौट आये और केवल अपने देशके राजा होकर रहने लगे (समूची पृथ्वीसे अब उनका अधिकार जाता रहा) किंतु वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओंने उस समय महाभाग राजा सुरथपर आक्रमण कर दिया ॥७॥ प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम् ॥१९॥ राजाका बल क्षीण हो चला था; इसलिये उनके दुष्ट, बलवान् एवं दुरात्मा मन्त्रियोंने वहाँ उनकी राजधानीमें भी राजकीय सेना और खजानेको वहाँसे हथिया लिया ॥ ८ ॥ सुरथका प्रभुत्व नष्ट हो चुका था, इसलिये वे शिकार खेलनेके बहाने घोड़ेपर सवार हो वहाँसे अकेले ही एक घने अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः। कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः॥८ ॥ ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः। एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम् ॥ ९ ॥ स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः। प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम् ॥ १० ॥ तस्थौ कंचित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः। इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे ॥ ११ ॥ सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः। १ मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत् ॥ १२ ॥ मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा। न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः ॥ १३ ॥ मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते । ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः ॥ १४ ॥ अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् । असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम् ॥ १५ ॥ संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति । एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः ॥ १६ ॥ तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः । स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्चागमनेऽत्र कः ॥ १७ ॥ सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम् ॥ १८ ॥ जङ्गलमें चले गये ॥ ९ ॥ वहाँ उन्होंने विप्रवर मेधा मुनिका आश्रम देखा, जहाँ कितने ही हिंसक जीव [अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर] परम शान्तभावसे रहते थे। मुनिके बहुत-से शिष्य उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १० ॥ वहाँ जानेपर मुनिने उनका सत्कार किया और वे उन मुनिश्रेष्ठके आश्रमपर इधर उधर विचरते हुए कुछ कालतक वहाँ रहे ॥ ११ ॥ फिर ममतासे आकृष्टचित्त होकर उस आश्रममें इस प्रकार चिन्ता करने लगे- १. पाठान्तर-ममत्वाकृष्टमानसः ।
• मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना • १७९
'पूर्वकालमें मेरे पूर्वजोंने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मदकी वर्षा करनेवाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओंके अधीन होकर न जाने किन भोगोंको भोगता होगा ? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पानेसे सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओंका अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगोंके द्वारा सदा खर्च होते रहनेके कारण अत्यन्त कष्टसे जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और भी कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधाके आश्रमके निकट एक वैश्यको देखा और उससे पूछा—'भाई! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने-से दिखायी देते हो?' राजा सुरथका यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्यने विनीत-भावसे उन्हें प्रणाम करके कहा—॥ १२–१९ ॥
वैश्य उवाच ॥ २० ॥
समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले ॥ २१ ॥
पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ।
विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम् ॥ २२ ॥
वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः ।
सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम् ॥ २३ ॥
प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः ।
किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् ॥ २४ ॥
कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः ॥ २५ ॥
वैश्य बोला— ॥ २० ॥ राजन्! मैं धनियोंके कुलमें उत्पन्न एक वैश्य हूँ। मेरा नाम समाधि है॥ २१॥ मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रोंने धनके लोभसे मुझे घरसे बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्रसे वञ्चित हूँ। मेरे विश्वसनीय बन्धुओंने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसलिये दुखी होकर मैं वनमें चला आया हूँ। यहाँ रहकर मैं इस बातको नहीं जानता कि मेरे पुत्रोंकी, स्त्रीकी और स्वजनोंकी कुशल है या नहीं। इस समय घरमें वे कुशलसे रहते हैं अथवा उन्हें कोई कष्ट है ? ॥ २२—२४॥ वे मेरे पुत्र कैसे हैं? क्या वे सदाचारी हैं अथवा दुराचारी हो गये हैं ॥ २५ ॥
राजोवाच ॥ २६ ॥
यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः ॥ २७॥
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम् ॥ २८ ॥
राजाने पूछा— ॥ २६ ॥ जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदिने धनके कारण तुम्हें घरसे निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारे चित्तमें इतना स्नेह क्यों है? ॥ २७–२८ ॥
वैश्य उवाच ॥ २९ ॥
एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः ॥ ३० ॥
किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः ।
यैः संत्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः ॥ ३१ ॥
१८० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः । राजोवाच ॥ ३९ ॥ किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ॥ ३२ ॥ भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत् ॥ ४० ॥ यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु । दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां बिना। तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥ ३३ ॥ ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि ॥ ४१ ॥ करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥ ३४ ॥ जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम। वैश्य बोला- ॥ २९ ॥ आप मेरे विषयमें जो अयं च निकृतः १ पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥ ४२ ॥ बात कहते हैं, वह सब ठीक है ॥ ३० ॥ किंतु क्या स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति । करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ ॥ ४३ ॥ जिन्होंने धनके लोभमें पड़कर पिताके प्रति स्नेह, दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ । पत्तिके प्रति प्रेम तथा आत्मीय जनके प्रति अनुरागको तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥ ४४ ॥ तिलाञ्जलि दे मुझे घरसे निकाल दिया है, उन्हींके ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता ॥ ४५ ॥ प्रति मेरे हृदयमें इतना स्नेह है। महामते ! गुणहीन राजा ने कहा - ॥ ३९ ॥ भगवन् ! मैं आपसे बन्धुओंके प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये ॥ ४० ॥ प्रेममग्न हो रहा है, यह क्या है- इस बातको मैं मेरा चित्त अपने अधीन न होनेके कारण वह बात जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी मेरे मनको बहुत दुःख देती है। मुनिश्रेष्ठ ! जो साँसें ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित राज्य मेरे हाथसे चला गया है, उसमें और उसके हो रहा है॥ ३१-३३॥ उन लोगोंमें प्रेमका सम्पूर्ण अङ्गोंमें मेरी ममता हो रही है ॥ ४१ ॥ यह सर्वथा अभाव है तो भी उनके प्रति जो मेरा मन जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है, निष्ठुर नहीं हो पाता, इसके लिये क्या करूँ ॥ ३४ ॥ अज्ञानीकी भाँति मुझे उसके लिये दुःख होता है; मार्कण्डेय उवाच ॥ ३५ ॥ यह क्या है ? इधर यह वैश्य भी घरसे अपमानित ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ ॥ ३६॥ होकर आया है। इसके पुत्र, स्त्री और भृत्योंने समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः । इसको छोड़ दिया है ॥ ४२ ॥ स्वजनोंने भी इसका कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथाई तेन संविदम् ॥ ३७॥ परित्याग कर दिया है, तो भी इसके हृदयमें उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ ॥ ३८ ॥ उनके प्रति अत्यन्त स्नेह है। इस प्रकार यह तथा 'मार्कण्डेयजी कहते हैं- ॥ ३५ ॥ ब्रह्मन् ! मैं दोनों ही बहुत दुखी हैं ॥ ४३ ॥ जिसमें प्रत्यक्ष तदनन्तर राजाओंमें श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि दोष देखा गया है, उस विषयके लिये भी हमारे नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनिकी मनमें ममताजनित आकर्षण पैदा हो रहा है। सेवामें उपस्थित हुए और उनके साथ यथायोग्य महाभाग ! हम दोनों समझदार हैं; तो भी हममें न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात् जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है ? विवेकशून्य वैश्य और राजाने कुछ वार्तालाप आरम्भ पुरुषकी भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता किया ॥ ३६-३८ ॥ प्रत्यक्ष दिखायी देती है ॥ ४४-४५ ॥ १. पा०- निष्कृतः । २. पा०- तत्किमेतन् ।
मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना < १८१
| (चित्र) | बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।<br>तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्॥ ५६ ॥<br>सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये।<br>सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥ ५७ ॥<br>संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी॥ ५८ ॥<br>ऋषि बोले— ॥ ४६ ॥ महाभाग! विषयमार्गका ज्ञान सब जीवोंको है॥ ४७ ॥ इसी प्रकार विषय भी सबके लिये अलग-अलग हैं। कुछ प्राणी दिनमें नहीं देखते और दूसरे रातमें ही नहीं देखते॥ ४८ ॥ तथा कुछ जीव ऐसे हैं, जो दिन और रात्रिमें भी बराबर ही देखते हैं। यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं; किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते॥ ४९ ॥ पशु-पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। मनुष्योंकी समझ भी वैसी ही होती है, जैसी उन मृग और पक्षियोंकी होती है॥ ५० ॥ तथा जैसी मनुष्योंकी होती है, वैसी ही उन मृग-पक्षी आदिकी होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्रायः दोनोंमें समान ही हैं। समझ होनेपर भी इन पक्षियोंको तो देखो, ये स्वयं भूखसे पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चोंकी चोंचमें कितने चावसे अन्नके दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ! क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकारका बदला पानेके लिये पुत्रोंकी अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझकी कमी नहीं है, तथापि वे संसारकी स्थिति (जन्म-मरणकी परम्परा) बनाये रखनेवाले भगवती महामायाके प्रभावद्वारा ममतामय भँवरसे युक्त मोहके गहरे गर्तमें गिराये जाते हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हींसे यह जगत् मोहित हो रहा है। वे भगवती महामाया |
| ऋषिरुवाच॥ ४६ ॥<br>ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे॥ ४७ ॥<br>विषयश्चै<sup>१</sup> महाभाग यांति<sup>२</sup> चैवं पृथक् पृथक्।<br>दिवाऽन्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे॥ ४८ ॥<br>केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः।<br>ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किंतु ते<sup>३</sup> न हि केवलम्॥ ४९ ॥<br>यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः।<br>ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम्॥ ५० ॥<br>मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः।<br>ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु॥ ५१ ॥<br>कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा।<br>मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति॥ ५२ ॥<br>लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान्<sup>४</sup> किं न पश्यसि।<br>तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः॥ ५३ ॥<br>महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणौ<sup>५</sup>।<br>तन्नात्र विस्मयः कार्यों योगनिद्रा जगत्पतेः॥ ५४ ॥<br>महामाया हरेश्चैषा<sup>६</sup> तया संमोह्यते जगत्।<br>ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ ५५ ॥ |
१. पा०—याश्च। २. पा०—यान्ति। ३. पा०—किंतु ते। ४. पा०—नन्वेते। ५. पा०—रिणः। ६. पा०—चैतत्।
१८२ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण • देवी ज्ञानियोंके भी चित्तको बलपूर्वक खींचकर मोहमें डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्की सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको मुक्तिके लिये वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या, संसार-बन्धन और मोक्षकी हेतुभूता सनातनी देवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरोंकी भी अधीश्वरी हैं॥ ५१-५८ ॥ राजोवाच ॥ ५९ ॥ भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान् ॥ ६० ॥ ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कमांस्याश्च किं द्विज। यत्प्रभावा' च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा ॥ ६१ ॥ तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ॥ ६२ ॥ राजाने पूछा - ॥ ५९॥ भगवन्! जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं? ब्रह्मन्! उनका आविर्भाव कैसे हुआ? तथा उनके चरित्र कौन-कौन हैं? ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! उन देवीका जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६०-६२ ॥ ऋषिरुवाच ॥ ६३ ॥ नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम् ॥ ६४ ॥ तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम । देवानां कार्यसिद्धयर्थमाविर्भवति सा यदा ॥ ६५ ॥ उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते। योगनिद्रां यदा विष्णोर्जगत्येकार्णवीकृते ॥ ६६ ॥ आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान् प्रभुः। तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ॥ ६७ ॥ विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ । स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः ॥ ६८ ॥ दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम् । तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः ॥ ६९ ॥ विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम् । विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ॥ ७० ॥ निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥ ७१ ॥ ऋषि बोले- ॥ ६३ ॥ राजन् ! वास्तवमें तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत् उन्हींका रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्वको व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकारसे होता है। वह मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोकमें उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्पके अन्तमें जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णवमें निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान् विष्णु शेषनागकी शय्या बिछाकर योगनिद्राका आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानोंकी मैलसे दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभके नामसे विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्माजीका वध करनेको तैयार हो गये। भगवान् विष्णुके नाभिकमलमें विराजमान प्रजापति १. पा०-कर्म चास्याश्च। २. पा०- यत्स्वभावा। ३. किसी किसी प्रतिमें इसके बाद ही 'ब्रह्मोवाच' है तथा 'निद्रां भगवतीम्' इस श्लोकार्धके स्थानमें-'स्तौति निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलतेजसः॥' ऐसा पाठ है।
• मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना • १८३
| ब्रह्माजीने जब उन दोनों भयानक असुरोंको अपने पास आया और भगवान्को सोया हुआ देखा तो एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान् विष्णुको जगानेके लिये उनके नेत्रोंमें निवास करनेवाली योगनिद्राका स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्वकी अधीश्वरी, जगत्को धारण करनेवाली, संसारका पालन और संहार करनेवाली तथा तेजःस्वरूप भगवान् विष्णुकी अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवीकी भगवान् ब्रह्मा स्तुति करने लगे ॥६४-७१॥<br><br>ब्रह्मोवाच ॥७२॥<br>त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका ॥७३॥<br>सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता।<br>अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः ॥७४॥<br>त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा।<br>त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सूज्यते जगत् ॥७५॥<br>त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा।<br>विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ॥७६॥<br>तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये।<br>महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ॥७७॥<br>महामोहा च भवती महादेवी महासुरी।<br>प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ॥७८॥<br>कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा।<br>त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ॥७९॥<br>लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च।<br>खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ॥८०॥<br>शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा।<br>सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ॥८१॥<br>परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी<sup>२</sup>।<br>यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ॥८२॥<br>तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा<sup>३</sup>।<br>यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति<sup>४</sup> यो जगत् ॥८३॥ | सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः।<br>विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ॥८४॥<br>कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत्।<br>सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ॥८५॥<br>मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ।<br>प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ॥८६॥<br>बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥८७॥<br><br>ब्रह्माजीने कहा— ॥७२॥ देवि ! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार—इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ह्री और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शङ्ख और |
१. पा०—सा त्वं। २. पा०—महेश्वरी। ३. पा०—तया। ४. पा०—पातात्ति।
१८४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ-ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो- इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर-सबसे परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्-असत्रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान्को भी जब तुमने निद्राके अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करनेमें यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान् शङ्करको तथा भगवान् विष्णुको भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति करनेकी शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावोंसे ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान् विष्णुको शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान् असुरोंको मार डालनेकी बुद्धि उत्पन्न कर दो ॥ ७३-८७॥ ऋषिरुवाच ॥ ८८ ॥ एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा ॥ ८९ ॥ विष्णोः प्रबोधनार्थाय विहन्तुं मधुकैटभौ। नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ॥ ९० ॥ निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः। उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः ॥ ९१ ॥ एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ। मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ ॥ ९२ ॥ क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ । समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः ॥ ९३ ॥ पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः। तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ ॥ ९४ ॥ १. पाठ-णी हन्तुं उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो ब्रियतामिति केशवम् ॥ ९५ ॥ ऋषि कहते हैं- ॥ ८८ ॥ राजन् ! जब ब्रह्माजीने वहाँ मधु और कैटभको मारनेके उद्देश्यसे भगवान् विष्णुको जगानेके लिये तमोगुणकी अधिष्ठात्री देवी योगनिद्राकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवान्के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्षःस्थलसे निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीकी दृष्टिके समक्ष खड़ी हो गयीं। योगनिद्रासे मुक्त होनेपर जगत्के स्वामी भगवान् जनार्दन उस एकार्णवके जलमें शेषनागकी शय्यासे जाग उठे। फिर उन्होंने उन दोनों असुरोंको देखा। वे दुरात्मा मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान् तथा पराक्रमी थे और क्रोधसे लाल आँखें किये ब्रह्माजीको खा जानेके लिये उद्योग कर रहे थे। तब भगवान् श्रीहरिने उठकर उन दोनोंके साथ पाँच हजार वर्षोंतक केवल बाहुयुद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बलके कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर
- मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना * १८५
महामायाने भी उन्हें मोहमें डाल रखा था; इसलिये वे भगवान् विष्णुसे कहने लगे—'हम तुम्हारी वीरतासे संतुष्ट हैं; तुम हमलोगोंसे कोई वर माँगो'॥ ८९–९५॥
श्रीभगवानुवाच ॥ ९६ ॥
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि ॥ ९७ ॥
किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं ममे^१ ॥ ९८ ॥
श्रीभगवान् बोले— ॥ ९६ ॥ यदि तुम दोनों मुझपर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथसे मारे जाओ। बस, इतना-सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वरसे क्या लेना है॥ ९७-९८॥
ऋषिरुवाच ॥ ९९ ॥
वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत् ॥ १०० ॥
विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः^२।
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ॥ १०१ ॥
ऋषि कहते हैं— ॥ ९९ ॥ इस प्रकार धोखेमें आ जानेपर जब उन्होंने सम्पूर्ण जगत्में जल ही-जल देखा तब कमलनयन भगवान्से कहा—'जहाँ पृथ्वी जलमें डूबी हुई न हो—जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो'॥ १००–१०१॥
ऋषिरुवाच ॥ १०२ ॥
तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता।
कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥ १०३ ॥
एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम्।
प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः शृणु वदामि ते ॥ ऐं ॐ ॥ १०४ ॥
ऋषिकहते हैं— ॥ १०२ ॥ तब 'तथास्तु' कहकर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्ने उन दोनोंके मस्तक अपनी जाँघपर रखकर चक्रसे काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया ब्रह्माजीकी स्तुति करनेपर स्वयं प्रकट हुई थीं। अब पुनः तुमसे उनके प्रभावका वर्णन करता हूँ, सुनो॥ १०३–१०४॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये मधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
उवाच १४, अर्धश्लोकाः २४, श्लोकाः ६६, एवम् ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'मधु-कैटभ-वध' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
१. पा०- मया। २. मार्कण्डेयपुराणकी कई प्रतियोंमें यहाँ 'प्रीतो स्वस्तव युद्धेन श्लाघ्यस्त्वं मृत्युरावयोः।' इतना अधिक पाठ है।
[ 539 ] सं० मा० पु०—७
१८६ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण • द्वितीयोऽध्यायः देवताओंके तेजसे देवीका प्रादुर्भाव और महिषासुरकी सेनाका वध विनियोग [ ॐ मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्ऋषिर्महालक्ष्मीर्देवता, उष्णिक् छन्दः, शाकम्भरी शक्तिः दुर्गा बीजम्, वायुस्तत्त्वम्, यजुर्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थे मध्यमचरित्रजपे विनियोगः । ॐ मध्यम चरित्रके विष्णु ऋषि, महालक्ष्मी देवता, उष्णिक् छन्द, शाकम्भरी शक्ति, दुर्गा बीज, वायु तत्त्व और यजुर्वेद स्वरूप है। श्रीमहालक्ष्मीकी प्रसन्नताके लिये मध्यम चरित्रके पाठमें इसका विनियोग है। ध्यान ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्। शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रवालप्रभां सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम् ॥ मैं कमलके आसनपर बैठी हुई महिषासुरमर्दिनी भगवती महालक्ष्मीका भजन करता हूँ, जो अपने हाथोंमें अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, पद्म, धनुष, कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शंख, घण्टा, मधुपात्र, शूल, पाश और चक्र धारण करती हैं तथा जिनके श्रीविग्रहकी कान्ति मूँगेके समान लाल है।] 'ॐ ह्रीं' ऋषिरुवाच ॥१॥ देवासुरमभूद्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा। महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरंदरे ॥२॥ तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम् । जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः ॥ ३॥ ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम् । पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ ॥ ४॥ यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम् । त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम् ॥ ५॥ सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च। अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति ॥ ६ ॥ स्वर्गान्निराकृताः सर्वे तेन देवगणा भुवि । विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना ॥ ७॥ एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम् । शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम् ॥ ८॥ ऋषि कहते हैं - ॥ १ ॥ पूर्वकालमें देवताओं और असुरोंमें पूरे सौ वर्षोंतक घोर संग्राम हुआ था। उसमें असुरोंका स्वामी महिषासुर था और देवताओंके नायक इन्द्र थे। उस युद्धमें देवताओंकी सेना महाबली असुरोंसे परास्त हो गयी। सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर महिषासुर इन्द्र बन बैठा ॥ २-३ ॥ तब पराजित देवता प्रजापति ब्रह्माजीको आगे करके उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् शंकर और विष्णु विराजमान थे ॥ ४॥ देवताओंने महिषासुरके पराक्रम तथा अपनी पराजयका यथावत् वृत्तान्त उन दोनों देवेश्वरोंसे विस्तारपूर्वक कह सुनाया ॥ ५॥ वे बोले- 'भगवन् ! महिषासुर सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण तथा अन्य देवताओंके भी अधिकार छीनकर स्वयं ही सबका अधिष्ठाता बना बैठा है ॥ ६॥ उस दुरात्मा महिषने समस्त देवताओंको स्वर्गसे निकाल दिया है। अब वे मनुष्योंकी भाँति पृथ्वीपर विचरते हैं ॥ ७॥ दैत्योंकी यह सारी करतूत हमने आपलोगोंसे कह सुनायी। अब हम आपकी ही शरणमें आये हैं। उसके वधका कोई उपाय सोचिये' ॥ ८॥
- देवताओंके तेजसे देवीका प्रादुर्भाव और महिषासुरकी सेनाका वध * १८७ अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥ १८ ॥ इस प्रकार देवताओंके वचन सुनकर भगवान् विष्णु और शिवने दैत्योंपर बड़ा क्रोध किया। उनकी भौंहें तन गयीं और मुँह टेढ़ा हो गया ॥ ९ ॥ तब अत्यन्त कोपमें भरे हुए चक्रपाणि श्रीविष्णुके मुखसे एक महान् तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार ब्रह्मा, शंकर तथा इन्द्र आदि अन्यान्य देवताओंके शरीरसे भी बड़ा भारी तेज निकला। वह सब मिलकर एक हो गया ॥ १०-११॥ महान् तेजका वह पुञ्ज जाज्वल्यमान पर्वत सा जान पड़ा। देवताओोंने देखा, वहाँ उसकी ज्वालाएँ सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त हो रही थीं ॥ १२ ॥ सम्पूर्ण देवताओंके शरीरसे प्रकट हुए उस तेजकी कहीं तुलना नहीं थी। एकत्रित होनेपर वह एक नारीके रूपमें परिणत हो गया और अपने प्रकाशसे तीनों लोकोंमें व्याप्त जान इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः । पड़ा ॥ १३ ॥ भगवान् शंकरका जो तेज था, उससे चकार कोपं शम्भुश्च भुकुटीकुटिलाननौ ॥ ९ ॥ उस देवीका मुख प्रकट हुआ। यमराजके तेजसे ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः । उसके सिरमें बाल निकल आये। श्रीविष्णुभगवान्के निष्क्रान्तं महत्तेजो ब्रह्मणः शंकरस्य च ॥ १० ॥ तेजसे उसकी भुजाएँ उत्पन्न हुईं ॥ १४॥ चन्द्रमाके अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः । निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ॥ ११ ॥ अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् । ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वाला व्याप्तदिगन्तरम् ॥ १२ ॥ अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम् । एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥ १३ ॥ यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजयत तन्मुखम् । याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥ १४ ॥ सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत् । वारुणेन च जङ्घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः ॥ १५ ॥ ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा । वसूनां च कराङ्गुल्यः कौबेरेण च नासिका ॥ १६ ॥ तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा । नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ॥ १७॥ भ्रुवौ च संध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च ।
| १८८ | • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण • |
|---|
| तेजसे दोनों स्तनोंका और इन्द्रके तेजसे मध्यभाग (कटिप्रदेश)-का प्रादुर्भाव हुआ। वरुणके तेजसे जङ्घा और पिंडली तथा पृथ्वीके तेजसे नितम्बभाग प्रकट हुआ ॥ १५ ॥ ब्रह्माके तेजसे दोनों चरण और सूर्यके तेजसे उनकी अंगुलियाँ हुईं। वसुओंके तेजसे हाथोंकी अंगुलियाँ और कुबेरके तेजसे नासिका प्रकट हुई ॥ १६ ॥ उस देवीके दाँत प्रजापतिके तेजसे और तीनों नेत्र अग्निके तेजसे प्रकट हुए थे ॥ १७ ॥ उसकी भौंहें संध्याके और कान वायुके तेजसे उत्पन्न हुए थे। इसी प्रकार अन्यान्य देवताओंके तेजसे भी उस कल्याणमयी देवीका आविर्भाव हुआ ॥ १८ ॥ | अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम् ।<br>हिमवान् वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च ॥ २९ ॥<br>ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः ।<br>शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम् ॥ ३० ॥<br>नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम्।<br>अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा ॥ ३१ ॥<br>सम्मानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः ।<br>तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः ॥ ३२ ॥<br>अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत् ।<br>चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्च चकम्पिरे ॥ ३३ ॥<br>चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः ।<br>जयेति देवाश्च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम् ॥ ३४ ॥<br>तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः । |
| ततः समस्तदेवानां तेजोरशिसमुद्भवाम् ।<br>तां विलोक्य मुदं प्रापुरामरा महिषार्दिताः ॥ १९ ॥<br>शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक् ।<br>चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाद्य स्वचक्रतः ॥ २० ॥<br>शङ्खं च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः ।<br>मारुतो दत्तवांश्चापं बाणपूर्णे तथेषुधी ॥ २१ ॥<br>वज्रमिन्द्रः समुत्पाद्य कुलिशादमराधिपः ।<br>ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात् ॥ २२ ॥<br>कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ ।<br>प्रजापतिश्चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम् ॥ २३ ॥<br>समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः ।<br>कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्याश्चर्म च निर्मलम् ॥ २४ ॥<br>क्षीरोदश्चामलं हारमजरे च तथाम्बरे ।<br>चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च ॥ २५ ॥<br>अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु ।<br>नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम् ॥ २६ ॥<br>अङ्गुलीयकरत्नानि समस्तास्वङ्गुलीषु च।<br>विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम् ॥ २७ ॥<br>अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम्।<br>अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम् ॥ २८ ॥ | तदनन्तर समस्त देवताओंके तेजःपुञ्जसे प्रकट हुई देवीको देखकर महिषासुरके सताये हुए देवता बहुत प्रसन्न हुए ॥ १९ ॥ पिनाकधारी भगवान् शङ्करने अपने शूलसे एक शूल निकालकर उन्हें दिया; फिर भगवान् विष्णुने भी अपने चक्रसे चक्र उत्पन्न करके भगवतीको अर्पण किया ॥ २० ॥ वरुणने भी शङ्ख भेंट किया, अग्निने उन्हें शक्ति दी और वायुने धनुष तथा बाणसे भरे हुए दो तरकस प्रदान किये ॥ २१ ॥ सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्रने अपने वज्रसे वज्र उत्पन्न करके दिया और ऐरावत हाथीसे उतारकर एक घण्टा भी प्रदान किया ॥ २२ ॥ यमराजने कालदण्डसे दण्ड, वरुणने पाश, प्रजापतिने स्फटिकाक्षकी माला तथा ब्रह्माने कमण्डलु भेंट किया ॥ २३ ॥ सूर्यने देवीके समस्त रोम-कूपोंमें अपनी किरणोंका तेज भर दिया। कालने उन्हें चमकती हुई ढाल और तलवार दी ॥ २४ ॥ क्षीरसमुद्रने उज्ज्वल हार तथा कभी जीर्ण न होनेवाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये। साथ |
१. कई प्रतियोंमें इसके बाद 'ततो देवा ददुस्तस्यै स्थानि स्वान्यायुधानि च। उच्चैरनद्यंश्चोद्युक्तास्ते जयैषिणः।' इतना पाठ अधिक है। २. पा०—क्ता। ३. पा०—दद्वा। ४. पा०—तस्यै धारि। ५. पा०—वाहनान्।
•देवताओंके तेजसे देवीका प्रादुर्भाव और महिषासुरकी सेनाका वध• १८९ हो उन्होंने दिव्य चूड़ामणि, दो कुण्डल, कड़े, संनद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः । उज्ज्वल अर्धचन्द्र, सब बाहुओंके लिये केयूर, आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः ॥ ३६ ॥ दोनों चरणोंके लिये निर्मल नूपुर, गलेकी सुन्दर अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः । हँसली और सब अँगुलियोंमें पहननेके लिये स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा ॥ ३७॥ रत्नोंकी बनी अँगूठियाँ भी दीं। विश्वकर्माने उन्हें पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम् । अत्यन्त निर्मल फरसा भेंट किया॥ २५-२७॥ क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिःस्वनेन ताम् ॥ ३८ ॥ साथ ही अनेक प्रकारके अस्त्र और अभेद्य कवच दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद् व्याप्य संस्थिताम्। दिये; इनके सिवा मस्तक और वक्षःस्थलपर ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम् ॥ ३९ ॥ धारण करनेके लिये कभी न कुम्हलानेवाले शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् । कमलोंकी मालाएँ दीं ॥ २८ ॥ जलधिने उन्हें सुन्दर महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः ॥४०॥ कमलका फूल भेंट किया। हिमालयने सवारीके युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरङ्गबलान्वितः । लिये सिंह तथा भाँति भाँतिके रत्न समर्पित रथानामयुतैः षड्भिरुदग्राख्यो महासुरः ॥४१ ॥ किये ॥ २९ ॥ धनाध्यक्ष कुबेरने मधुसे भरा पानपात्र अयुध्यतायुतानां च सहस्रेण महाहनुः । दिया तथा सम्पूर्ण नागोंके राजा शेषने, जो इस पञ्चाशद्भिश्श्च नियुतैरसलोमा महासुरः ॥ ४२ ॥ पृथ्वीको धारण करते हैं, उन्हें बहुमूल्य मणियोंसे अयुतानां शतैः षड्भिर्बाष्कलो युयुधे रणे । विभूषित नागहार भेंट दिया। इसी प्रकार अन्य गजवाजियस्रौधैरनेकैः परिवारितः ॥ ४३ ॥ देवताओंगने भी आभूषण और अस्त्र-शस्त्र देकर वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत । देवीका सम्मान किया। तत्पश्चात् उन्होंने बारंबार बिडालाख्योऽयुतानां च पञ्चाशद्भिरथायुतैः ॥४४॥ अट्टहासपूर्वक उच्चस्वरसे गर्जना की। उनके भयंकर युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः । नादसे सम्पूर्ण आकाश गूँज उठा ॥ ३०-३२॥ अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः ॥४५॥ देवीका वह अत्यन्त उच्चस्वरसे किया हुआ युयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः । सिंहनाद कहीं समा न सका, आकाश उनके कोटिकोटिसहस्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा ॥ ४६ ॥ सामने लघु प्रतीत होने लगा। उससे बड़े जोरकी हयानां च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः । प्रतिध्वनि हुई, जिससे सम्पूर्ण विश्वमें हलचल तोमरैर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा ॥ ४७॥ मच गयी और समुद्र काँप उठे ॥ ३३॥ पृथ्वी युयुधुः संयुगे देव्या खड्गैः परशुट्टिशैः । डोलने लगी और समस्त पर्वत हिलने लगे। उस केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित्पाशांस्तथापरे ॥ ४८ ॥ समय देवताओंने अत्यन्त प्रसन्नताके साथ सिंहवाहिनी देवीं खड्गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः । भवानीसे कहा-'देवि ! तुम्हारी जय हो' ॥ ३४॥ सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका ॥ ४९ ॥ साथ ही महर्षियोंने भक्तिभावसे विनम्र होकर लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी । उनका स्तवन किया। अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः ॥५०॥ दृष्ट्वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममराचयः ॥ ३५ ॥ मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्वरी। १. पा०- कैरूटदंशः। २. किसी-किसी प्रतिमें इसके बाद 'वृतः स्वालो रथानां च रणे गङ्गावतार्णवः। युयुधे संयुगे तत्र गजकोटिः परिवारितः ॥' इतना अधिक पाठ है।