भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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१८८• संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •
तेजसे दोनों स्तनोंका और इन्द्रके तेजसे मध्यभाग (कटिप्रदेश)-का प्रादुर्भाव हुआ। वरुणके तेजसे जङ्घा और पिंडली तथा पृथ्वीके तेजसे नितम्बभाग प्रकट हुआ ॥ १५ ॥ ब्रह्माके तेजसे दोनों चरण और सूर्यके तेजसे उनकी अंगुलियाँ हुईं। वसुओंके तेजसे हाथोंकी अंगुलियाँ और कुबेरके तेजसे नासिका प्रकट हुई ॥ १६ ॥ उस देवीके दाँत प्रजापतिके तेजसे और तीनों नेत्र अग्निके तेजसे प्रकट हुए थे ॥ १७ ॥ उसकी भौंहें संध्याके और कान वायुके तेजसे उत्पन्न हुए थे। इसी प्रकार अन्यान्य देवताओंके तेजसे भी उस कल्याणमयी देवीका आविर्भाव हुआ ॥ १८ ॥अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम् ।<br>हिमवान् वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च ॥ २९ ॥<br>ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः ।<br>शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम् ॥ ३० ॥<br>नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम्।<br>अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा ॥ ३१ ॥<br>सम्मानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः ।<br>तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः ॥ ३२ ॥<br>अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत् ।<br>चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्च चकम्पिरे ॥ ३३ ॥<br>चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः ।<br>जयेति देवाश्च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम् ॥ ३४ ॥<br>तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः ।
ततः समस्तदेवानां तेजोरशिसमुद्भवाम् ।<br>तां विलोक्य मुदं प्रापुरामरा महिषार्दिताः ॥ १९ ॥<br>शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक् ।<br>चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाद्य स्वचक्रतः ॥ २० ॥<br>शङ्खं च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः ।<br>मारुतो दत्तवांश्चापं बाणपूर्णे तथेषुधी ॥ २१ ॥<br>वज्रमिन्द्रः समुत्पाद्य कुलिशादमराधिपः ।<br>ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात् ॥ २२ ॥<br>कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ ।<br>प्रजापतिश्चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम् ॥ २३ ॥<br>समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः ।<br>कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्याश्चर्म च निर्मलम् ॥ २४ ॥<br>क्षीरोदश्चामलं हारमजरे च तथाम्बरे ।<br>चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च ॥ २५ ॥<br>अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु ।<br>नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम् ॥ २६ ॥<br>अङ्गुलीयकरत्नानि समस्तास्वङ्गुलीषु च।<br>विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम् ॥ २७ ॥<br>अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम्।<br>अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम् ॥ २८ ॥तदनन्तर समस्त देवताओंके तेजःपुञ्जसे प्रकट हुई देवीको देखकर महिषासुरके सताये हुए देवता बहुत प्रसन्न हुए ॥ १९ ॥ पिनाकधारी भगवान् शङ्करने अपने शूलसे एक शूल निकालकर उन्हें दिया; फिर भगवान् विष्णुने भी अपने चक्रसे चक्र उत्पन्न करके भगवतीको अर्पण किया ॥ २० ॥ वरुणने भी शङ्ख भेंट किया, अग्निने उन्हें शक्ति दी और वायुने धनुष तथा बाणसे भरे हुए दो तरकस प्रदान किये ॥ २१ ॥ सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्रने अपने वज्रसे वज्र उत्पन्न करके दिया और ऐरावत हाथीसे उतारकर एक घण्टा भी प्रदान किया ॥ २२ ॥ यमराजने कालदण्डसे दण्ड, वरुणने पाश, प्रजापतिने स्फटिकाक्षकी माला तथा ब्रह्माने कमण्डलु भेंट किया ॥ २३ ॥ सूर्यने देवीके समस्त रोम-कूपोंमें अपनी किरणोंका तेज भर दिया। कालने उन्हें चमकती हुई ढाल और तलवार दी ॥ २४ ॥ क्षीरसमुद्रने उज्ज्वल हार तथा कभी जीर्ण न होनेवाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये। साथ

१. कई प्रतियोंमें इसके बाद 'ततो देवा ददुस्तस्यै स्थानि स्वान्यायुधानि च। उच्चैरनद्यंश्चोद्युक्तास्ते जयैषिणः।' इतना पाठ अधिक है। २. पा०—क्ता। ३. पा०—दद्वा। ४. पा०—तस्यै धारि। ५. पा०—वाहनान्।