भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

१९० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * सम्पूर्ण त्रिलोकीको क्षोभग्रस्त देख दैत्यगण अपनी समस्त सेनाको कवच आदिसे सुसज्जित कर, हाथोंमें हथियार ले सहसा उठकर खड़े हो गये। उस समय महिषासुरने बड़े क्रोधमें आकर कहा- 'आः! यह क्या हो रहा है।' फिर वह सम्पूर्ण असुरोंसे घिरकर उस सिंहनादकी ओर लक्ष्य करके दौड़ा और आगे पहुँचकर उसने देवीको देखा, जो अपनी प्रभासे तीनों लोकोंको प्रकाशित कर रही थीं ॥ ३५-३७॥ उनके चरणोंके भारसे पृथ्वी दबी जा रही थी। माथेके मुकुटसे आकाशमें रेखा-सी खिंच रही थी तथा वे अपने धनुषकी टङ्कारसे सातों पातालोंको क्षुब्ध किये देती थीं ॥ ३८ ॥ देवी अपनी हजारों भुजाओंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करके खड़ी थीं। तदनन्तर उनके साथ दैत्योंका युद्ध छिड़ गया ॥ ३९॥ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारसे सम्पूर्ण असुर महिषासुरका सेनानायक था ॥ ४०॥ वह देवीके साथ युद्ध करने लगा। अन्य दैत्योंकी चतुरङ्गिणी सेना साथ लेकर चामर भी लड़ने लगा। साठ हजार रथियोंके साथ आकर उदग्र नामक महादैत्यने लोहा लिया ॥ ४१ ॥ एक करोड़ रथियोंको साथ लेकर महाहनु नामक दैत्य युद्ध करने लगा। जिसके रोएँ तलवारके समान तीखे थे, वह असिलोमा नामक महादैत्य पाँच करोड़ रथी सैनिकोंसहित युद्धमें आ डटा ॥ ४२ ॥ साठ लाख रथियोंसे घिरा हुआ बाष्कल नामक दैत्य भी उस युद्धभूमिमें लड़ने लगा ॥ ४३ ॥ परिवारित १ नामक राक्षस हाथीसवार और घुड़सवारोंके अनेक दलों तथा एक करोड़ रथियोंकी सेना लेकर युद्ध करने लगा। बिडाल नामक दैत्य पाँच अरब रथियोंसे घिरकर लोहा लेने लगा। इनके अतिरिक्त और भी हजारों महादैत्य रथ, हाथी और घोड़ोंकी सेना साथ लेकर वहाँ देवीके साथ युद्ध करने लगे। स्वयं महिषासुर उस रणभूमिमें कोटि-कोटि सहस्र रथ, हाथी और घोड़ोंकी सेनासे घिरा हुआ खड़ा था। वे दैत्य देवीके साथ तोमर, भिन्दिपाल, शक्ति, मूसल, खड्ग, परशु और पट्टिश आदि अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए युद्ध कर रहे थे। कुछ दैत्योंने उनपर शक्तिका प्रहार किया, कुछ लोगोंने पाश फेंके ॥ ४४-४८ ॥ तथा कुछ दूसरे दैत्योंने खड्गप्रहार करके देवीको मार डालनेका उद्योग किया। देवीने भी क्रोधमें भरकर खेल- खेलमें ही अपने अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करके दैत्योंके वे समस्त अस्त्र-शस्त्र काट डाले। उनके मुखपर परिश्रम या थकावटका रंचमात्र भी चिह्न नहीं था, देवता और ऋषि उनकी स्तुति करते थे और वे भगवती परमेश्वरी दैत्योंके शरीरोंपर दिशाएँ उद्भासित होने लगीं। चिक्षुर नामक महान् अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करती रहीं। १. परितो वारयति शत्रूनिति व्युत्पत्तिः।

• देवताओंके तेजसे देवीका प्रादुर्भाव और महिषासुरकी सेनाका वध • १९१ सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेसरी ॥ ५१ ॥ चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः । निःश्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका ॥ ५२ ॥ त एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्रशः । युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः ॥ ५३ ॥ नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्त्युपबृंहिताः । अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्खांस्तथापरे ॥ ५४ ॥ मृदङ्गांश्च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे । ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तितृष्टिभिः ॥ ५५ ॥ खड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान् । पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान् ॥ ५६ ॥ असुरान् भुवि पाशेन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत् । केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खड्गपातैस्तथापरे ॥ ५७ ॥ विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते । वेमुश्च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हताः ॥ ५८ ॥ केचिन्निपतिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि । निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे ॥ ५९ ॥ श्येनानुकारिणः प्राणाम् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः । केषांचिद् बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे ॥ ६० ॥ शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः । विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः ॥ ६१ ॥ एकबाह्वक्षिकरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः । छित्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः ॥ ६२ ॥ कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः । ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः ॥ ६३ ॥ कवन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः । तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः ॥ ६४ ॥ पातितै रथनागाश्वैरसुरैश्च वसुंधरा । अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत्स महारणः ॥ ६५ ॥ शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवुः । मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम् ॥ ६६ ॥ क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका । निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम् ॥ ६७ ॥ स च सिंहो महानादमत्सृजन्धुतकेसरः । शरीरेभ्योऽपरारीणामसूनिव विचिन्वति ॥ ६८ ॥ देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं महासुरैः । यथैषां तुतुषुद्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि ॥ ॐ ॥ ६९ ॥ देवीका वाहन वह सिंह भी क्रोधमें भरकर गर्दैनके बालोंको हिलाता हुआ असुरोंकी सेनामें इस प्रकार विचरने लगा, मानो वनोंमें दावानल फैल रहा हो। रणभूमिमें दैत्योंके साथ युद्ध करती हुई अम्बिका देवीने जितने निःश्वास छोड़े, वे सभी तत्काल सैकड़ों-हजारों गणोंके रूपमें प्रकट हो गये और परशु, भिन्दिपाल, खङ्ग तथा पट्टिश आदि अस्त्रोंद्वारा असुरोंका सामना करने लगे ॥ ४९-५३॥ देवीकी शक्तिसे बढ़े हुए वे गण असुरोंका नाश करते हुए नगाड़ा और शङ्ख आदि बाजे बजाने लगे ॥ ५४॥ उस संग्राम- १. पा०-शरदृष्टिभिः। २. पा०- सेनानु०, शल्य।नु०, सेनान्युः। ३. किसी किसी प्रतिमें इसके बाद 'सर्वोपधिविलुप्ताङ्गाः संग्रामे लोभहर्षणे।' इतना पाठ अधिक है। ४. पा०-दर्पिनाः। ५. पा०-तुष्टुवुर्देवाः।

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  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * महोत्सवमें कितने ही गण मृदङ्ग बजा रहे थे। तदनन्तर देवीने त्रिशूलसे, गदासे, शक्तिकी वर्षासे और खड्ग आदिसे सैकड़ों महादैत्योंका संहार कर डाला। कितनोंको घंटेके भयङ्कर नादसे मूच्छित करके मार गिराया ॥ ५५-५६ ॥ बहुतेरे दैत्योंको पाशसे बाँधकर धरतीपर घसीटा; कितने ही दैत्य उनकी तीखी तलवारकी मारसे दो-दो टुकड़े हो गये ॥ ५७ ॥ कितने ही गदाकी चोटसे घायल हो धरतीपर सो गये। कितने ही मूसलकी मारसे अत्यन्त आहत होकर रक्त वमन करने लगे। कुछ दैत्य शूलसे छाती फट जानेके कारण पृथ्वीपर ढेर हो गये। उस रणाङ्गणमें बाणसमूहोंकी वृष्टिसे कितने ही असुरोंकी कमर टूट गयी ॥ ५८-५९ ॥ बाजकी तरह झपटनेवाले देवीभक्त दैत्यगण अपने प्राणोंसे हाथ धोने लगे। किन्हींकी बाँहें छिन्न-भिन्न हो गयीं, कितनोंकी गर्दन कट गयीं। कितने ही दैत्योंके मस्तक कट-कटकर गिरने लगे। कुछ लोगोंके शरीर मध्यभागमें ही विदीर्ण हो गये। कितने ही महादैत्य जाँघें कट जानेसे पृथ्वीपर गिर पड़े। कितनोंको ही देवीने एक बाँह, एक पैर और एक नेत्रवाले करके दो टुकड़ोंमें चीर डाला। कितने ही दैत्य मस्तक कट जानेपर भी गिरकर फिर उठ जाते और केवल धड़के ही रूपमें अच्छे-अच्छे हथियार हाथमें ले देवीके साथ युद्ध करने लगते थे। दूसरे कबन्ध युद्धके बाजोंकी लयपर नाचते थे ॥ ६०-६३॥ कितने ही बिना सिरके धड़ हाथोंमें खड्ग, शक्ति और ऋष्टि लिये दौड़ते थे तथा दूसरे-दूसरे महादैत्य 'ठहरो ! ठहरो !!' यह कहते हुए देवीको युद्धके लिये ललकारते थे। जहाँ वह घोर संग्राम हुआ था, वहाँकी धरती देवीके गिराये हुए रथ, हाथी, घोड़े और असुरोंकी लाशोंसे ऐसी पट गयी थी कि वहाँ चलना-फिरना असम्भव हो गया था ॥ ६४-६५ ॥ दैत्योंकी सेनामें हाथी, घोड़े और असुरोंके शरीरोंसे इतनी अधिक मात्रामें रक्तपात हुआ था कि थोड़ी ही देरमें वहाँ खूनकी बड़ी- बड़ी नदियाँ बहने लगीं ॥ ६६ ॥ जगदम्बाने असुरोंकी विशाल सेनाको क्षणभरमें नष्ट कर दिया-ठीक उसी तरह, जैसे तृण और काठके भारी ढेरको आग कुछ ही क्षणोंमें भस्म कर देती है ॥ ६७ ॥ और वह सिंह भी गर्दनके बालोंको हिला-हिलाकर जोर- जोरसे गर्जना करता हुआ दैत्योंके शरीरोंसे मानो उनके प्राण चूसे लेता था ॥ ६८ ॥ वहाँ देवीके गणोंने भी उन महादैत्योंके साथ ऐसा युद्ध किया, जिससे देवतागण उनपर आकाशसे फूल बरसाने लगे और उन सबसे बहुत सन्तुष्ट हुए ॥ ६९ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये महिषासुरसैन्यवधो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ उवाच १, श्लोकाः ६८, एवम् ६९, एवमादितः ॥ १७३ ॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवी-माहात्म्यमें 'महिषासुरकी सेनाका वध' नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
  • सेनापतियोंसहित महिषासुरका वध * १९३ तृतीयोऽध्यायः सेनापतियोंसहित महिषासुरका वध ध्यान ( ॐ उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्। हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं देवीं बद्धहिमांशुरात्ममुकुटां वन्डेऽरविन्दस्थिताम्॥ जगदम्बाके श्रीअङ्गोंकी कान्ति उदयकालके सहस्रों सूर्योंके समान है। वे लाल रंगकी रेशमी साड़ी पहने हुए हैं। उनके गलेमें मुण्डमाला शोभा पा रही है। दोनों स्तनोंपर रक्तचन्दनका लेप लगा है। वे अपने कर-कमलोंमें जपमालिका, विद्या, अभय तथा वर-मुद्राएँ धारण किये हुए हैं। तीन नेत्रोंसे सुशोभित मुखारविन्दकी बड़ी शोभा हो रही है। उनके मस्तकपर चन्द्रमाके साथ ही रत्नमय मुकुट बँधा है तथा वे कमलके आसनपर विराजमान हैं। ऐसी देवीको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ।) तस्याः खड्गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन। ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः ॥ ८ ॥ चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः। जाज्वल्यमानं तेजोभी रविविम्बमिवाम्बरात् ॥ ९ ॥ दृष्ट्वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत। तच्छूलं१ शतधा तेन नीतं स च महासुरः ॥ १० ॥ ऋषि कहते हैं- ॥ १ ॥ दैत्योंकी सेनाको इस प्रकार तहस-नहस होते देख महादैत्य सेनापति चिक्षुर क्रोधमें भरकर अम्बिका देवीसे युद्ध करनेको आगे बढ़ा ॥ २ ॥ वह असुर रणभूमिमें देवीके ऊपर इस प्रकार बाणोंकी वर्षा करने लगा, जैसे बादल मेरुगिरिके शिखरपर पानीकी धार बरसा रहा हो ॥ ३ ॥ तब देवीने अपने बाणोंसे उसके बाण-समूहको अनायास ही काटकर उसके घोड़ों और सारथिको भी मार डाला ॥ ४ ॥ साथ ही उसके धनुष तथा अत्यन्त ऊँची ध्वजाको भी तत्काल काट गिराया। धनुष कट जानेपर उसके अङ्गोंको अपने बाणोंसे बींध डाला ॥ ५ ॥ धनुष, रथ, घोड़े और सारथिके नष्ट हो जानेपर वह असुर ढाल और तलवार लेकर देवीकी ओर दौड़ा ॥ ६ ॥ उसने तीखी धारवाली तलवारसे सिंहके मस्तकपर चोट करके देवीकी भी बायीं भुजामें बड़े वेगसे प्रहार किया ॥७॥ राजन्! देवीकी बाँहपर पहुँचते ही वह तलवार टूट गयी, फिर तो क्रोधसे लाल आँखें करके उस राक्षसने शूल हाथमें लिया ॥८॥ और उसे उस महादैत्यने भगवती भद्रकालीके ऊपर चलाया। वह शूल आकाशसे गिरते हुए सूर्यमण्डलकी भाँति अपने तेजसे प्रज्वलित हो उठा ॥ ९॥ उस शूलको अपनी ऋषिरुवाच ॥ १ ॥ 'ॐ' निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः। सेनानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्धुमथाम्बिकाम् ॥ २ ॥ स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः। यथा मेरुगिरेः शृङ्गं तोयवर्षेण तोयदः ॥ ३ ॥ तस्यच्छित्त्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान्। जघान तुरगान् बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम् ॥ ४ ॥ चिच्छेद च धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छ्रितम्। विव्याध चैव गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः ॥ ५ ॥ सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः। अभ्यधावत तां देवीं खड्गचर्मधरोऽसुरः ॥ ६ ॥ सिंहमाहत्य खड्गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि। आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान् ॥ ७ ॥ १. पा०-तेन तच्छतधा नीतं।
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ओर आते देख देवीने भी शूलका प्रहार किया। उससे राक्षसके शूलके सैकड़ों टुकड़े हो गये,

साथ ही महादैत्य चिक्षुरकी भी धज्जियाँ उड़ गयीं। वह प्राणोंसे हाथ धो बैठा॥ १०॥
इते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ।
आजगाम गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः ॥ ११॥
सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम्।
हुंकाराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम् ॥ १२ ॥
भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः।
चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत् ॥ १३॥
ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः।
बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा ॥ १४॥
युद्ध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ।
युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः ॥ १५॥
ततो वेगात्खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा।
करप्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक्कृतम् ॥ १६ ॥
उदग्रश्च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः।
दन्तमुष्टितलैश्चैव करालश्च निपातितः ॥ १७॥
देवी क्रुद्धा गदापातैश्चूर्णयामास चोद्धतम्।
वाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्तामं तथान्धकम् ॥ १८ ॥
उग्रास्यमुग्रवीर्यं च तथैव च महाहनुम्।
त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी ॥ १९॥
बिडालस्यासिना कायात्पातयामास वै शिरः।
दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥ २०॥

महिषासुरके सेनापति उस महापराक्रमी चिक्षुरके मारे जानेपर देवताओंको पीड़ा देनेवाला चामर हाथीपर चढ़कर आया। उसने भी देवीके ऊपर शक्तिका प्रहार किया, किन्तु जगदम्बाने उसे अपने हुंकारसे ही आहत एवं निष्प्रभ करके तत्काल पृथ्वीपर गिरा दिया॥ ११-१२॥ शक्तिको टूटकर गिरी हुई देख चामरको बड़ा क्रोध हुआ। अब उसने शूल चलाया, किन्तु देवीने उसे भी अपने बाणोंद्वारा काट डाला ॥ १३॥ इतनेमें ही देवीका सिंह उछलकर हाथीके मस्तकपर चढ़ बैठा और उस दैत्यके साथ खूब जोर लगाकर बाहुयुद्ध करने लगा ॥ १४॥ वे दोनों लड़ते-लड़ते हाथीसे पृथ्वीपर आ गये और अत्यन्त क्रोधमें भरकर एक दूसरेपर बड़े भयंकर प्रहार करते हुए लड़ने लगे ॥ १५॥ तदनन्तर सिंह बड़े वेगसे आकाशकी ओर उछला और उधरसे गिरते समय उसने पंजोंकी मारसे चामरका


१. इसके बाद किसी-किसी प्रतिमें—
'कालं च कालदण्डेन कालरात्रिर्महाहवे। उग्रदर्शननृत्यैः खड्गपातैरताडयत्॥
अरेर्गात्रात्समादाय मान्त्रान्कण्ठे समालभत्। ततोऽपरे रणेऽनेकाः सिंहेन देव्या च नानाखेडाकृतास्तथा॥'
—ये दो श्लोक अधिक हैं।

  • सेनापतियोंसहित महिषासुरका वध * | ६९५ ---|---

सिर धड़से अलग कर दिया॥ १६॥ इसी प्रकार

उदग्र भी शिला और वृक्ष आदिकी मार खाकर रणभूमिमें देवीके हाथसे मारा गया तथा कराल भी दाँतों, मुक्कों और थप्पड़ोंकी चोटसे धराशायी हो गया॥ १७॥ क्रोधमें भरी हुई देवीने गदाकी चोटसे उद्धतका कचूमर निकाल डाला। भिन्दिपालसे बाष्कलको तथा बाणोंसे ताम्र और अन्धकको मौतके घाट उतार दिया॥ १८॥ तीन नेत्रोंवाली परमेश्वरीने त्रिशूलसे उग्रास्य, उग्रवीर्य तथा महाहनु नामक दैत्यको मार डाला॥ १९॥ तलवारकी चोटसे बिडालके मस्तकको धड़से काट गिराया। दुर्धर और दुर्मुख—इन दोनोंको भी अपने बाणोंसे यमलोक भेज दिया॥ २०॥

एवं संक्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः।
माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान् ॥ २१ ॥

कांश्चित्तुण्डप्रहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान्।
लाङ्गूलताडितांश्चान्याञ्छृङ्गाभ्यां च विदारितान् ॥ २२ ॥
वेगेन कांश्चिदपरान्नादेन भ्रमणेन च।
निःश्वासपवनेनान्यान् पातयामास भूतले ॥ २३ ॥
निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः।
सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका ॥ २४॥
सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः।
शृङ्गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप च ननाद च ॥ २५ ॥
वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत।
लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः ॥ २६ ॥
धुतशृङ्गविभिन्नाश्च खण्डं<sup></sup> खण्डं ययुर्घनाः।
श्वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः ॥ २७॥
इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम्।
दृष्ट्वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत् ॥ २८ ॥
सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम्।
तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे ॥ २९ ॥
ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः।
छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत ॥ ३० ॥
तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः।
तं खड्गचर्मणा सार्द्धं ततः सोऽभून्महागजः ॥ ३१ ॥
करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च।
कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत ॥ ३२॥
ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः।
तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ३३॥
ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम्।
पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना ॥ ३४॥
ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः।
विषाणाभ्यां च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान् ॥ ३५ ॥
सा च तान् प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः।
उवाच तं मदोद्धूतमुखरागाकुलाक्षरम् ॥ ३६ ॥
इस प्रकार अपनी सेनाका संहार होता देख


१. पा०—खण्डखण्डं।

१९६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * महिषासुरने भैंसेका रूप धारण करके देवीके गणोंको त्रास देना आरम्भ किया ॥ २१ ॥ किन्हींको थूथुनसे मारकर, किन्हींके ऊपर खुरोंका प्रहार करके, किन्हीं-किन्हींको पूँछसे चोट पहुँचाकर, कुछको सींगोंसे विदीर्ण करके, कुछ गणोंको वेगसे, किन्हींको सिंहनादसे, कुछको चक्कर देकर और कितनोंको निःश्वास वायुके झोंकेसे धराशायी कर दिया ॥ २२-२३ ॥ इस प्रकार गणोंकी सेनाको गिराकर वह असुर महादेवीके सिंहको मारनेके लिये झपटा। इससे जगदम्बाको बड़ा क्रोध हुआ ॥ २४ ॥ उधर महापराक्रमी महिषासुर भी क्रोधमें भरकर धरतीको खुरोंसे खोदने लगा तथा अपने सींगोंसे ऊँचे-ऊँचे पर्वतोंको उठाकर फेंकने और गर्जने लगा ॥ २५ ॥ उसके वेगसे चक्कर देनेके कारण पृथ्वी क्षुब्ध होकर फटने लगी। उसकी पूँछसे टकराकर समुद्र सब ओरसे धरतीको डुबोने लगा ॥ २६ ॥ हिलते हुए सींगोंके आघातसे विदीर्ण होकर बादलोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये। उसके श्वासकी प्रचण्ड वायुके वेगसे उड़े हुए सैकड़ों पर्वत आकाशसे गिरने लगे ॥ २७॥ इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए उस महादैत्यको अपनी ओर आते देख चण्डिकाने उसका वध करनेके लिये महान् क्रोध किया ॥ २८ ॥ उन्होंने पाश फेंककर उस महान् असुरको बाँध लिया। उस महासंग्राममें बँध जानेपर उसने भैंसेका रूप त्याग दिया ॥ २९ ॥ और तत्काल सिंहके रूपमें वह प्रकट हो गया। उस अवस्थामें जगदम्बा ज्यों ही उसका मस्तक काटनेको उद्यत हुईं, त्यों ही वह खड्गधारी पुरुषके रूपमें दिखायी देने लगा ॥ ३० ॥ तब देवीने तुरंत ही बाणोंकी वर्षा करके ढाल और तलवारके साथ उस पुरुषको भी बींध डाला। इतनेमें ही वह महान् गजराजके रूपमें परिणत हो गया ॥ ३१ ॥ तथा अपनी सूँड़से देवीके विशाल सिंहको खींचने और गर्जने लगा। खींचते समय देवीने तलवारसे उसकी सूँड़ काट डाली ॥ ३२ ॥ तब उस महादैत्यने पुनः भैंसेका शरीर धारण कर लिया और पहलेकी ही भाँति चराचर प्राणियोंसहित

  • सेनापतियोंसहित महिषासुरका वध * | १९७ ---|---

तीनों लोकोंको व्याकुल करने लगा ॥ ३३ ॥ तब क्रोधमें भरी हुई जगन्माता चण्डिका बारंबार उत्तम मधुका पान करने और लाल आँखें करके हँसने लगीं ॥ ३४ ॥ उधर वह बल और पराक्रमके मदसे उन्मत्त हुआ राक्षस अपने सींगोंसे चण्डीके ऊपर पर्वतोंको फेंकने लगा और डकारने लगा ॥ ३५ ॥ उस समय देवी अपने बाणोंके समूहोंसे उसके फेंके हुए पर्वतोंको चूर्ण करती हुई बोलीं। बोलते समय उनका मुख मधुके मदसे लाल हो रहा था और वाणी लड़खड़ा रही थी ॥ ३६ ॥

देव्युवाच ॥ ३७ ॥ गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम्। मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः॥ ३८ ॥

देवीने कहा— ॥ ३७ ॥ ओ मूढ़ ! मैं जबतक मधु पीती हूँ तबतक तू क्षणभरके लिये खूब गर्ज ले। मेरे हाथसे यहीं तेरी मृत्यु हो जानेपर अब शीघ्र ही देवता भी गर्जना करेंगे ॥ ३८ ॥

ऋषिरुवाच ॥ ३९ ॥ एवमुक्त्वा समुत्पत्य साऽऽरूढा तं महासुरम्। पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत् ॥ ४० ॥ ततः सोऽपि पदाऽऽक्रान्तस्तया निजमुखात्ततः। अर्धनिष्क्रान्त एवासीद्देव्या^१ वीर्येण संवृतः ॥ ४१ ॥ अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः। तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः ॥ ४२ ॥ ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत्। प्रहर्षं च परं जग्मुः सकला देवतागणाः ॥ ४३ ॥ तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सह दिव्यैर्महर्षिभिः। जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ४४ ॥

उछलीं और उस महादैत्यके ऊपर चढ़ गयीं। फिर अपने पैरसे उसे दबाकर उन्होंने शूलसे उसके कण्ठमें आघात किया। [उनके पैरसे दबा होनेपर भी महिषासुर अपने मुखसे दूसरे रूपमें बाहर होने लगा] ॥ ४० ॥ अभी आधे शरीरसे ही वह बाहर निकलने पाया था कि देवीने अपने प्रभावसे उसे रोक दिया ॥ ४१ ॥ आधा निकला होनेपर भी वह महादैत्य देवीसे युद्ध करने लगा। तब देवी बहुत बड़ी तलवारसे उसका मस्तक काट गिराया ॥ ४२ ॥

फिर तो हाहाकार करती हुई दैत्योंकी सारी सेना भाग गयी तथा सम्पूर्ण देवता अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ ४३ ॥ देवताओंने दिव्य महर्षियोंके साथ दुर्गादेवीका स्तवन किया। गन्धर्वराज गान करने लगे तथा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ ४४ ॥

ऋषि कहते हैं— ॥ ३९ ॥ यों कहकर देवी


इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये महिषासुरवधो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ उवाच २, श्लोकाः ४१, एवम् ४४, एवमादितः ॥ २१७ ॥

इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवी-माहात्म्यमें 'महिषासुर वध' नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥


^१. पा०—एवाति देव्या। ^२. किसी-किसी प्रतिमें इसके बाद—
'एवं तं महिषो नाथ रक्षौघैः समुद्गदन्। त्रैलोक्यं मोहयित्वा तु तया दैत्यो विनाशितः ॥
त्रैलोक्यस्थैस्तदा भूतैर्महिषे विनिपातिते। जयेत्युक्तं ततः सर्वैः सदेवासुरमानवैः ॥'—इतना अधिक पाठ है।

१९८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


चतुर्थोऽध्यायः

इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवीकी स्तुति

ध्यानया श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः
( ॐ कज्जलाभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखांपापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः।
शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्।श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तींतां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम्॥ ५ ॥
ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः॥किं वर्णयाम तव रूपमचिन्त्यमेतत्
सिद्धि की इच्छा रखनेवाले पुरुष जिनकी सेवाकिं चातिवीर्यमसुरक्षयकारि भूरि।
करते हैं तथा देवता जिन्हें सब ओरसे घेरे रहतेकिं चाहवेषु चरितानि तवाद्भुतानि
हैं, उन 'जया' नामवाली दुर्गादेवीका ध्यान करे।सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु ॥ ६ ॥
उनके श्रीअङ्गोंकी आभा काले मेघके समानहेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषै-
श्याम है। वे अपने कटाक्षोंसे शत्रुसमूहको भयर्न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा।
प्रदान करती हैं। उनके मस्तकपर आबद्ध चन्द्रमाकीसर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत-
रेखा शोभा पाती है। वे अपने हाथोंमें शङ्ख, चक्र,मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या॥ ७ ॥
कृपाण और त्रिशूल धारण करती हैं। उनके तीनयस्याः समस्तसुरता समुदीरणेन
नेत्र हैं। वे सिंहके कंधेपर चढ़ी हुई हैं और अपनेतृप्तिं प्रयाति सकलेषु मखेषु देवि।
तेजसे तीनों लोकोंको परिपूर्ण कर रही हैं।)स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतु-
ऋषिरुवाच^१॥ १ ॥रुच्चार्यसे त्वमत एव जनैः स्वधा च ॥ ८ ॥
'ॐ' शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्येया मुक्तिहेतुरविचिन्त्यमहाव्रता त्वं-
तस्मिन्दुरातत्मनि सुरारिबले च देव्या।मभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः।
तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसामोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै-
वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्गमचारुदेहाः॥ २ ॥र्विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि॥ ९ ॥
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्याशब्दात्मिका सुविमलगर्यजुषां निधान-
निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या ।मुद्गीथरम्यपदपाठवतां च साम्नाम्।
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यांदेवी त्रयी भगवती भवभावनाय
भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥ ३ ॥वार्त्ता च सर्वजगतां परमार्त्तिहन्त्री॥ १०॥
यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तोमेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा
ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तुमलं बलं च।दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्गा।
सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनायश्रीः कैटभारिहृदयैककृताधिवासा
नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु॥ ४॥गौरी त्वमेव शशिकृतप्रतिष्ठा॥ ११॥

१. 'किनो-विंसी प्रतियों' 'ऋषिरुवाच' के बाद 'ततः सुरगणाः सर्वे देवा इन्द्रपुरोगमाः। स्तुतिमारभिरं कर्तुं निहते महिषासुरे।' इतना पाठ अधिक है।
२. पा०- च अङ्गाः।

• इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवीकी स्तुति • १९९ ईषत्सहासममलं परिपूर्णचन्द्र- खड्गप्रभानिकरविस्फुरणैस्तथोग्रैः बिम्बानुकारि कनकोत्तमकान्तिकान्तम्। शूलाग्रकान्तिनिवहेन दृशोऽसुराणाम्। अत्यद्भुतं प्रहृतमात्तरुषा तथापि यन्नागता विलयमंशुमदिन्दुखण्ड- वक्त्रं विलोक्य सहसा महिषासुरेण ॥१२॥ योग्याननं तव विलोकयतां तदेतत् ॥ २० ॥ दृष्ट्वा तु देवि कुपितं भ्रुकुटीकराल- दुर्वृत्तवृत्तशमनं तव देवि शीलं मुद्यच्छशाङ्कसदृशच्छवि यन्न सद्यः। रूपं तथैतदविचिन्त्यमतुल्यमन्यैः। प्राणान्मुमोच महिषस्तदतीव चित्रं वीर्यं च हन्तृ हृतदेवपराक्रमाणां कैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन ॥ १३ ॥ वैरिष्वपि प्रकटितैव दया त्वयेत्थम् ॥ २१॥ देवि प्रसीद परमा भवती भवाय केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य सद्यो विनाशयसि कोपवती कुलानि। रूपं च शत्रुभयकार्यतिहारि कुत्र। विज्ञातमेतदधुनैव यदस्तमेत- चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा न्नीतं बलं सुविपुलं महिषासुरस्य ॥ १४ ॥ त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि ॥ २२ ॥ ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः। त्रातं त्वया समरमूर्धनि तेऽपि हत्वा। धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्त येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना ॥ १५ ॥ मस्माकमून्मदसुरारिभवं नमस्ते ॥ २३ ॥ धर्म्याणि देवि सकलानि सदैव कर्मा- शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके। ण्यत्यादृतः प्रतिदिनं सुकृती करोति। घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥ २४ ॥ स्वर्गं प्रयाति च ततो भवतीप्रसादा- प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे। ल्लोकत्रयेऽपि फलदा ननु देवि तेन ॥ १६ ॥ भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि ॥ २५ ॥ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते। स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि। यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम् ॥ २६ ॥ दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके। सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता ॥ १७॥ करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः ॥ २७ ॥ एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते ऋषि कहते हैं- ॥ १॥ अत्यन्त पराक्रमी कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम्। दुरात्मा महिषासुर तथा उसकी दैत्य-सेनाके देवीके संग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु हाथसे मारे जानेपर इन्द्र आदि देवता प्रणामके मत्वेति नूनमहितान् विनिहंसि देवि ॥ १८ ॥ लिये गर्दन तथा कंधे झुकाकर उन भगवती दृष्ट्वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म दुर्गाका उत्तम वचनोंद्वारा स्तवन करने लगे। उस सर्वासुरानरिषु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम्। समय उनके सुन्दर अङ्गोंमें अत्यन्त हर्षके कारण लोकान् प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता रोमाञ्च हो आया था ॥ २ ॥ [देवता बोले-]'सम्पूर्ण इत्थं मतिर्भवति तेष्वपि तेऽतिसाध्वी ॥ १९ ॥ देवताओंकी शक्तिका समुदाय ही जिनका स्वरूप

२०० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * है तथा जिन देवीने अपनी शक्तिसे सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है, समस्त देवताओं और महर्षियोंकी पूजनीया उन जगदम्बाको हम भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं। वे हमलोगोंका कल्याण करें ॥ २॥ जिनके अनुपम प्रभाव और बलका वर्णन करनेमें भगवान् शेषनाग, ब्रह्माजी तथा महादेवजी भी समर्थ नहीं हैं, वे भगवती चण्डिका सम्पूर्ण जगत्‌का पालन एवं अशुभ भयका नाश करनेका विचार करें ॥ ४॥ जो पुण्यात्माओंके घरोंमें स्वयं ही लक्ष्मीरूपसे, पापियोंके यहाँ दरिद्रतारूपसे, शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुषोंके हृदयमें बुद्धिरूपसे, सत्पुरुषोंमें श्रद्धारूपसे तथा कुलीन मनुष्यमें लज्जारूपसे निवास करती हैं, उन आप भगवती दुर्गाको हम नमस्कार करते हैं। देवि ! सम्पूर्ण विश्वका पालन कीजिये ॥ ५ ॥ देवि ! आपके इन अचिन्त्य रूपका, असुरोंका नाश करनेवाले भारी पराक्रमका तथा समस्त देवताओं और दैत्योंके समक्ष युद्धमें प्रकट किये हुए आपके अद्भुत चरित्रोंका हम किस प्रकार वर्णन करें ॥ ६ ॥ आप सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्तिमें कारण हैं। आपमें सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण-ये तीनों गुण मौजूद हैं; तो भी दोषोंके साथ आपका संसर्ग नहीं जान पड़ता। भगवान् विष्णु और महादेवजी आदि देवता भी आपका पार नहीं पाते। आप ही सबका आश्रय हैं। यह समस्त जगत् आपका अंशभूत है; क्योंकि आप सबकी आदिभूत अव्याकृता परा प्रकृति हैं ॥ ७॥ देवि ! सम्पूर्ण यज्ञोंमें जिसके उच्चारणसे सब देवता तृप्ति लाभ करते हैं, वह स्वाहा आप ही हैं। इसके अतिरिक्त आप पितरोंकी भी तृप्तिका कारण हैं, अतएव सब लोग आपको स्वधा भी कहते हैं ॥ ८ ॥ देवि ! जो मोक्षकी प्राप्तिका साधन है, अचिन्त्य महाव्रतस्वरूपा है, समस्त दोषोंसे रहित, जितेन्द्रिय, तत्त्वको ही सार वस्तु माननेवाले तथा मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले मुनिजन जिसका अभ्यास करते हैं, वह भगवती परा विद्या आप ही हैं ॥ ९ ॥ आप शब्दस्वरूपा हैं, अत्यन्त निर्मल ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा उद्गीथके मनोहर पदोंके पाठसे युक्त सामवेदका भी आधार आप ही हैं। आप देवी, त्रयी (तीनों वेद) और भगवती (छहों ऐश्वर्योंसे युक्त) हैं। इस विश्वकी उत्पत्ति एवं पालनके लिये आप ही वार्ता (खेती एवं आजीविका)-के रूपमें प्रकट हुई हैं। आप सम्पूर्ण जगत्‌की घोर पीड़ाका नाश करनेवाली हैं ॥ १० ॥ देवि ! जिससे समस्त शास्त्रोंके सारका ज्ञान होता है, वह मेधाशक्ति आप ही हैं। दुर्गम भवसागरसे पार उतारनेवाली नौकारूप दुर्गादेवी भी आप ही हैं। आपकी कहीं भी आसक्ति नहीं है। कैटभके शत्रु भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें एकमात्र निवास करनेवाली भगवती लक्ष्मी तथा भगवान् चन्द्रशेखरद्वारा सम्मानित गौरीदेवी भी आप ही हैं ॥ ११॥ आपका मुख मन्द मुसकानसे

  • इन्द्रादि देवताओं‌द्वारा देवीकी स्तुति - २०१ सुशोभित, निर्मल, पूर्ण चन्द्रमाके बिम्बका अनुकरण करनेवाला और उत्तम सुवर्णकी मनोहर कान्तिसे कमनीय है; तो भी उसे देखकर महिषासुरको क्रोध हुआ और सहसा उसने उसपर प्रहार कर दिया, यह बड़े आश्चर्यकी बात है ॥१२॥ देवि ! वही मुख जब क्रोधसे युक्त होनेपर उदयकालके चन्द्रमाकी भाँति लाल और तनी हुई भौंहोंके कारण विकराल हो उठा, तब उसे देखकर जो महिषासुरके प्राण तुरंत नहीं निकल गये, यह उससे भी बढ़कर आश्चर्यकी बात है; क्योंकि क्रोधमें भरे हुए यमराजको देखकर भला, कौन जीवित रह सकता है ॥ १३ ॥ देवि ! आप प्रसन्न हों। परमात्मस्वरूपा आपके प्रसन्न होनेपर जगत्‌का अभ्युदय होता है और क्रोधमें भर जानेपर आप तत्काल ही कितने कुलोंका सर्वनाश कर डालती हैं, यह बात अभी अनुभवमें आयी है; क्योंकि महिषासुरकी यह विशाल सेना क्षणभरमें आपके कोपसे नष्ट हो गयी है ॥१४॥ सदा अभ्युदय प्रदान करनेवाली आप जिनपर प्रसन्न रहती हैं, वे ही देशमें सम्मानित हैं, उन्हींको धन और यशकी प्राप्ति होती है, उन्हींका धर्म कभी शिथिल नहीं होता तथा वे ही अपने हृष्ट-पुष्ट स्त्री, पुत्र और भृत्योंके साथ धन्य माने जाते हैं ॥१५॥ देवि ! आपकी ही कृपासे पुण्यात्मा पुरुष प्रतिदिन अत्यन्त श्रद्धापूर्वक सदा सब प्रकारके धर्मानुकूल कर्म करता है और उसके प्रभावसे स्वर्गलोकमें जाता है; इसलिये आप तीनों लोकोंमें निश्चय ही मनोवाञ्छित फल देनेवाली हैं ॥ १६ ॥ मा दुर्गे ! आप स्मरण करनेपर सब प्राणियोंका भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषोंद्वारा चिन्तन करनेपर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। दुःख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवि! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करनेके लिये सदा ही दयार्द्र रहता हो ॥१७॥ देवि ! इन राक्षसोंके मारनेसे संसारको सुख मिले तथा ये राक्षस चिरकालतक नरकमें रहनेके लिये भले ही पाप करते रहे हों, इस समय संग्राममें मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गलोकमें जायँ-निश्चय ही यही सोचकर आप शत्रुओंका वध करती हैं ॥ १८ ॥ आप शत्रुओंपर शस्त्रोंका प्रहार क्यों करती हैं ? समस्त असुरोंको दृष्टिपात- मात्रसे ही भस्म क्यों नहीं कर देतीं ? इसमें एक रहस्य है। 'ये शत्रु भी हमारे शस्त्रोंसे पवित्र होकर उत्तम लोकोंमें जायँ' - इस प्रकार उनके प्रति भी आपका विचार अत्यन्त उत्तम रहता है ॥१९॥ खड्गके तेजःपुञ्जकी भयङ्कर दीप्तिसे तथा आपके त्रिशूलके अग्रभागकी घनीभूत प्रभासे चौंधियाकर जो असुरोंकी आँखें फूट नहीं गयीं, उसमें कारण यही था कि वे मनोहर रश्मियोंसे युक्त चन्द्रमाके समान आनन्द प्रदान करनेवाले आपके इस सुन्दर मुखका दर्शन करते थे॥२०॥ देवि! आपका शील दुराचारियोंके बुरे बर्तावको दूर करनेवाला है। साथ ही यह रूप ऐसा है, जो कभी चिन्तनमें भी नहीं आ सकता और जिसकी कभी दूसरोंसे तुलना भी नहीं हो सकती; तथा आपका बल और पराक्रम तो उन दैत्योंका भी नाश करनेवाला है, जो कभी देवताओंके पराक्रमको भी नष्ट कर चुके थे। इस प्रकार आपने शत्रुओंपर भी अपनी दया ही प्रकट की है ॥ २१ ॥ वरदायिनी देवि ! आपके इस पराक्रमकी किसके साथ तुलना हो सकती है। तथा शत्रुओंको भय देनेवाला एवं अत्यन्त मनोहर ऐसा रूप भी आपके सिवा और कहाँ है !

२०२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * हृदयमें कृपा और युद्धमें निष्ठुरता-ये दोनों बातें तीनों लोकोंके भीतर केवल आपमें ही देखी गयी हैं ॥२२॥ मातः! आपने शत्रुओंका नाश करके इस समस्त त्रिलोकीकी रक्षा की है। उन शत्रुओंको भी युद्धभूमिमें मारकर स्वर्गलोकमें पहुँचाया है तथा उन्मत्त दैत्योंसे प्राप्त होनेवाले हमलोगोंके भयको भी दूर कर दिया है, आपको हमारा नमस्कार है ॥२३॥ देवि! आप शूलसे हमारी रक्षा करें। अम्बिके ! खड्गसे भी हमारी रक्षा करें तथा घण्टाकी ध्वनि और धनुषकी टंकारसे भी आप हमलोगोंकी रक्षा करें ॥ २४ ॥ चण्डिके! पूर्व, पश्चिम और दक्षिण दिशामें आप हमारी रक्षा करें तथा ईश्वरि ! अपने त्रिशूलको घुमाकर आप उत्तर दिशामें भी हमारी रक्षा करें ॥ २५ ॥ तीनों लोकोंमें आपके जो परम सुन्दर एवं अत्यन्त भयङ्कर रूप विचरते रहते हैं, उनके द्वारा भी आप हमारी तथा इस भूलोककी रक्षा करें ॥ २६ ॥ अम्बिके ! आपके कर पल्लवोंमें शोभा पानेवाले खड्ग, शूल और गदा आदि जो जो अस्त्र हों, उन सबके द्वारा आप सब ओरसे हमलोगोंकी रक्षा करें ॥ २७ ॥ ऋषिरुवाच ॥ २८ ॥ एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैर्नन्दनोद्भवैः । अर्चिता जगतां धात्री तथा गन्धानुलेपनैः ॥ २९ ॥ भक्त्या समस्तैस्त्रिदशैर्दिव्यैर्धूपैस्तु धूपिता। प्राह प्रसादसुमुखी समस्तान् प्रणतान् सुरान् ॥ ३० ॥ ऋषि कहते हैं- ॥ २८ ॥ इस प्रकार जब देवताओंद्वारा उनका पूजन किया, फिर सबने मिलकर जब भक्तिपूर्वक दिव्य धूपोंकी सुगन्ध निवेदन की, तब देवीने प्रसन्नवदन होकर प्रणाम करते हुए सब देवताओंसे कहा - ॥ २९-३० ॥ देव्युवाच ॥ ३१ ॥ ब्रियतां त्रिदशाः सर्वे यदस्मत्तोऽभिवाञ्छितम् ॥ ३२ ॥ देवी बोलीं- ॥ ३१ ॥ देवताओ! तुम सब लोग मुझसे जिस वस्तुकी अभिलाषा रखते हो, उसे माँगो ॥ ३२ ॥ देवा ऊचुः ॥ ३३ ॥ भगवत्या कृतं सर्वं न किंचिदवशिष्यते ॥ ३४ ॥ यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः । यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्वरि ॥ ३५ ॥ संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः । यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने ॥ ३६॥ तस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम् । वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके ॥ ३७ ॥ देवता बोले- ॥ ३३ ॥ भगवतीने हमारी सब इच्छा पूर्ण कर दी, अब कुछ भी बाकी नहीं है ॥ ३४ ॥ क्योंकि हमारा यह शत्रु महिषासुर मारा गया। महेश्वरि ! इतनेपर भी यदि आप हमें और वर देना चाहती हैं ॥ ३५ ॥ तो हम जब-जब आपका स्मरण करें, तब-तब आप दर्शन देकर हमलोगोंके महान् संकट दूर कर दिया करें तथा प्रसन्नमुखी अम्बिके! जो मनुष्य इन स्तोत्रोंद्वारा आपकी स्तुति करे, उसे वित्त, समृद्धि और वैभव देनेके साथ ही उसकी धन और स्त्री आदि सम्पत्तिको भी बढ़ानेके लिये आप सदा हमपर प्रसन्न रहें ॥ ३६-३७ ॥ देवताओोंने जगन्माता दुर्गाकी स्तुति की और नन्दनवनके दिव्य पुष्पों एवं गन्ध-चन्दन आदिके १. पा०-पैः सूर्यंधेता २. मार्कण्डेयपुराणकी आधुनिक प्रतियोंमें - 'ददाम्यहम्पतिप्रीत्या सर्वैरभिः सुपूजिता ।'- इतना पाठ अधिक है। किसी-किसी प्रतिमें- 'कर्त्तव्यमपरं यच्च दुष्करं तन्न विद्यमहे । इत्याकर्ण्य वचो देव्याः प्रत्युचुस्ते दिवौकसः ।।' - इतना और अधिक पाठ है।

इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवीकी स्तुति २०६ ऋषिरुवाच ॥ ३८ ॥ इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथाऽऽत्मनः। तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप ॥ ३९ ॥ इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा। देवी देवशरीरेभ्यो जगत्त्रयहितैषिणी ॥ ४० ॥ पुनश्च गौरीदेहात्सा समुद्भूता यथाभवत् । वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः ॥ ४१ ॥ रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी। तच्छृणुष्व मयाऽऽख्यातं यथावत्कथयामि ते ॥ ह्रीँ ॐ ॥ ४२ ॥ ऋषि कहते हैं- ॥ ३८ ॥ राजन् ! देवताओंने जब अपने तथा जगत्‌के कल्याणके लिये भद्रकाली देवीको इस प्रकार प्रसन्न किया, तब वे 'तथास्तु' कहकर वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥ ३९ ॥ भूपाल ! इस प्रकार पूर्वकालमें तीनों लोकोंका हित चाहनेवाली देवी जिस प्रकार देवताओंके शरीरोंसे प्रकट हुई थीं, वह सब कथा मैंने कह सुनायी ॥ ४० ॥ अब पुनः देवताओंका उपकार करनेवाली वे देवी दुष्ट दैत्यों तथा शुम्भ-निशुम्भका वध करने एवं सब लोकोंकी रक्षा करनेके लिये गौरीदेवीके शरीरसे जिस प्रकार प्रकट हुई थीं, वह सब प्रसङ्ग मेरे मुँहसे सुनो। मैं उसका तुमसे यथावत् वर्णन करता हूँ ॥ ४१-४२ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शक्रादिस्तुतिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ उवाच ५, अर्धश्लोकौ २, श्लोकाः ३५, एवम् ४२, एवमादितः ॥ २५९ ॥ इस प्रकार श्रीमार्केण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'शक्रादिस्तुति' नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥ १. किसी-किसी प्रतिमें 'गौरीदेहा सा' 'गौरी देहात्सा' इत्यादि पाठ भी उपलब्ध होते हैं।

२०४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

पञ्चमोऽध्यायः

देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति, चण्ड-मुण्डके मुखसे अम्बिकाके रूपकी प्रशंसा सुनकर शुम्भका उनके पास दूत भेजना और दूतका निराश लौटना

विनियोग
[ ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य रुद्रऋषिः, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप् छन्दः, भीमा शक्तिः, भ्रामरी बीजम्, सूर्यस्तत्त्वम्, सामवेदः स्वरूपम्, महासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः।
ॐ इस उत्तर चरित्रके रुद्र ऋषि हैं, महासरस्वती देवता हैं, अनुष्टुप् छन्द है, भीमा शक्ति है, भ्रामरी बीज है, सूर्य तत्त्व है और सामवेद स्वरूप है। महासरस्वतीकी प्रसन्नताके लिये उत्तर चरित्रके पाठमें इसका विनियोग किया जाता है।

ध्यान
ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥
जो अपने करकमलोंमें घण्टा, शूल, हल, शङ्ख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, शरद्-ऋतुके शोभासम्पन्न चन्द्रमाके समान जिनकी मनोहर कान्ति है, जो तीनों लोकोंकी आधारभूता और शुम्भ आदि दैत्योंका नाश करनेवाली हैं तथा गौरीके शरीरसे जिनका प्राकट्य हुआ है, उन महासरस्वती देवीका मैं निरन्तर भजन करता हूँ।]

'ॐ क्लीं' ऋषिरुवाच ॥ १ ॥
पुरा शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः।
त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृता मदबलाश्रयात् ॥ २ ॥
तावेव सूर्यतां तद्वदधिकारं तथैन्दवम्।
कौबेरमथ याम्यं च चक्राते वरुणस्य च॥ ३॥
तावेव पवनर्द्धिं च चक्रतुर्वह्निकर्म च<sup></sup>
ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः ॥ ४ ॥
हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः।
महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजिताम्॥ ५॥
तयास्माकं वरो दत्तो यथाऽऽपत्सु स्मृताखिलाः।
भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापदः ॥ ६ ॥
इति कृत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्वरम्।
जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः ॥ ७ ॥

ऋषि कहते हैं—॥ १॥ पूर्वकालमें शुम्भ और निशुम्भ नामक असुरोंने अपने बलके घमंडमें आकर शचीपति इन्द्रके हाथसे तीनों लोकोंका राज्य और यज्ञभाग छीन लिये॥ २॥ वे ही दोनों सूर्य, चन्द्रमा, कुबेर, यम और वरुणके अधिकारका भी उपयोग करने लगे। वायु और अग्निका कार्य भी वे ही करने लगे। उन दोनोंने सब देवताओंको अपमानित, राज्यभ्रष्ट, पराजित तथा अधिकारहीन करके स्वर्गसे निकाल दिया। उन दोनों महान् असुरोंसे तिरस्कृत देवताओंने अपराजिता देवीका स्मरण किया और सोचा 'जगदम्बाने हमलोगोंको वर दिया था कि आपत्तिकालमें स्मरण करनेपर मैं तुम्हारी सब आपत्तियोंका तत्काल नाश कर दूँगी'॥ ३—६॥ यह विचारकर देवता गिरिराज हिमालयपर गये और वहाँ भगवती विष्णुमायाकी स्तुति करने लगे॥ ७॥

देवा ऊचुः ॥ ८॥
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥ ९॥


१. किसी-किसी प्रतिमें इसके बाद 'अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति' इतना पाठ अधिक है।

• देवताओं द्वारा देवीकी स्तुति •२०५

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः।<br>ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥ १०॥<br>कल्याण्यै प्रणतां<sup></sup> वृद्धयै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः।<br>नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥ ११॥<br>दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै ।<br>ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥ १२॥<br>अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।<br>नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ॥ १३॥<br>या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।<br>नमस्तस्यै ॥ १४॥ नमस्तस्यै ॥ १५॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १६॥<br>या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते ।<br>नमस्तस्यै ॥ १७॥ नमस्तस्यै ॥ १८॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १९॥<br>या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ २०॥ नमस्तस्यै ॥ २१॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २२॥<br>या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ २३॥ नमस्तस्यै ॥ २४॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २५॥<br>या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ २६ ॥ नमस्तस्यै ॥ २७ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २८॥<br>या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ २९॥ नमस्तस्यै ॥ ३० ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ३१ ॥<br>या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ३२ ॥ नमस्तस्यै ॥ ३३ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ३४॥<br>या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ३५॥ नमस्तस्यै ॥ ३६ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ३७॥<br>या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ३८ ॥ नमस्तस्यै ॥ ३९ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ४० ॥<br>या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ४१ ॥ नमस्तस्यै ॥ ४२ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ४३॥<br>या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ४४ ॥ नमस्तस्यै ॥ ४५ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ४६ ॥<br>या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ४७॥ नमस्तस्यै ॥ ४८ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ४९॥या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ५०॥ नमस्तस्यै ॥ ५१॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५२॥<br>या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ५३ ॥ नमस्तस्यै ॥ ५४ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५५॥<br>या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ५६ ॥ नमस्तस्यै ॥ ५७ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५८॥<br>या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ५९ ॥ नमस्तस्यै ॥ ६० ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ६१ ॥<br>या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ६२ ॥ नमस्तस्यै ॥ ६३ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ६४॥<br>या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ६५ ॥ नमस्तस्यै ॥ ६६ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ६७॥<br>या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ६८ ॥ नमस्तस्यै ॥ ६९ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ७० ॥<br>या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ७१ ॥ नमस्तस्यै ॥ ७२ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ७३ ॥<br>या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।<br>नमस्तस्यै ॥ ७४ ॥ नमस्तस्यै ॥ ७५ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ७६॥<br>इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।<br>भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः ॥ ७७॥<br>चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत्।<br>नमस्तस्यै ॥ ७८ ॥ नमस्तस्यै ॥ ७९ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ८० ॥<br>स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रया-<br>त्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।<br>करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी<br>शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ॥ ८१ ॥<br>या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै-<br>रस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते ।<br>या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः<br>सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः ॥ ८२ ॥<br>देवता बोले— ॥८॥ देवीको नमस्कार है,<br>महादेवी शिवाको सर्वदा नमस्कार है। प्रकृति एवं

१. वृद्धयै सिद्ध्यै च प्रणतां देवीं प्रति नमः नतिं कुर्म इत्यन्वयः। यद् वा प्रणमन्तीति प्रणन्तः, तेषां प्रणतामिति षष्ठीबहुवचनान्तं बोध्यम्। इति शान्तनव्यां टीकायां स्पष्टम्। 'प्रणताः' इति पाठान्तरम्।

२०६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * भद्राको प्रणाम है। हमलोग नियमपूर्वक जगदम्बाको नमस्कार करते हैं ॥ ९ ॥ रौद्राको नमस्कार है। नित्या, गौरी एवं धात्रीको बारंबार नमस्कार है। ज्योत्स्नामयी, चन्द्ररूपिणी एवं सुखस्वरूपा देवीको सतत प्रणाम है ॥ १०॥ शरणागतोंका कल्याण करनेवाली वृद्धि एवं सिद्धिरूपा देवीको हम बारंबार नमस्कार करते हैं। नैर्ऋती (राक्षसोंकी लक्ष्मी), राजाओंकी लक्ष्मी तथा शर्वाणी (शिवपत्नी)-स्वरूपा आप जगदम्बाको बार-बार नमस्कार है ॥ ११॥ दुर्गा, दुर्गपारा (दुर्गम संकटसे पार उतारनेवाली), सारा (सबकी सारभूता), सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा और धूम्रादेवीको सर्वदा नमस्कार है ॥ १२ ॥ अत्यन्त सौम्य तथा अत्यन्त रौद्ररूपा देवीको हम नमस्कार करते हैं, उन्हें हमारा बारंबार प्रणाम है। जगत्की आधारभूता कृति देवीको बारंबार नमस्कार है ॥ १३ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें विष्णुमायाके नामसे कही जाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ १४-१६ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ १७- १९॥ जो देवी सब प्राणियोंमें बुद्धिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ २०-२२॥ जो देवी सब प्राणियोंमें निद्रारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ २३-२५ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें क्षुधारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ २६-२८ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें छायारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ २९-३१॥ जो देवी सब प्राणियोंमें शक्तिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ३२-३४॥ जो देवी सब प्राणियोंमें तृष्णारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ३५-३७ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें क्षान्ति (क्षमा)-रूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ३८-४० ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें जातिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ४१-४३॥ जो देवी सब प्राणियोंमें लज्जारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ४४-४६ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें शान्तिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ४७-४९ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें श्रद्धारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ५०-५२ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें कान्तिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ५३-५५ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें लक्ष्मीरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ५६-५८ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें वृत्तिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ५९-६१ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें स्मृतिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ६२-६४ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें दयारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ६५-६७ ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें तुष्टिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥ ६८-७० ॥ जो देवी सब प्राणियोंमें मातारूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार

  • देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति * २०७

है॥७१—७३॥ जो देवी सब प्राणियोंमें भ्रान्तिरूपसे स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है॥७४—७६॥ जो जीवोंके इन्द्रियवर्गकी अधिष्ठात्री देवी एवं सब प्राणियोंमें सदा व्याप्त रहनेवाली हैं, उन व्याप्तिदेवीको बारंबार नमस्कार है॥७७॥ जो देवी चैतन्यरूपसे इस सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त करके स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है॥७८—८०॥ पूर्वकालमें अपने अभीष्टकी प्राप्ति होनेसे देवताओंने जिनकी स्तुति की तथा देवराज इन्द्रने बहुत दिनोंतक जिनका सेवन किया, वह कल्याणकी साधनभूता ईश्वरी हमारा कल्याण और मङ्गल करे तथा सारी आपत्तियोंका नाश कर डाले॥८१॥ उद्दण्ड दैत्योंसे सताये हुए हम सभी देवता जिन परमेश्वरीको इस समय नमस्कार करते हैं तथा जो भक्तिसे विनम्र पुरुषोंद्वारा स्मरण की जानेपर तत्काल ही सम्पूर्ण विपत्तियोंका नाश कर देती हैं, वे जगदम्बा हमारा संकट दूर करें॥८२॥

ऋषिरुवाच ॥८३॥

एवं स्तवाभियुक्तानां देवानां तत्र पार्वती।
स्नातुमभ्याययौ तोये जाह्नव्या नृपनन्दन ॥८४॥
साब्रवीत्तान् सुरान् सुभ्रूर्भवद्भिः स्तूयतेऽत्र का।
शरीरकोशतश्चास्याः समुद्भूताब्रवीच्छिवा ॥८५॥
स्तोत्रं ममैतत् क्रियते शुम्भदैत्यनिराकृतैः।
देवैः समेतैः समरे निशुम्भेन पराजितैः ॥८६॥
शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका।
कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते ॥८७॥
तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती।
कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया ॥८८॥
ततोऽम्बिकां परं रूपं बिभ्राणां सुमनोहरम्।
ददर्श चण्डो मुण्डश्च भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः ॥८९॥
ताभ्यां शुम्भाय चाख्याता अतीव सुमनोहरा।
काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयन्ती हिमाचलम् ॥९०॥
नैव तादृक् क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदुत्तमम्।
ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चासुरेश्वर ॥९१॥
स्त्रीरत्नमतिचार्वङ्गी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा।
सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति ॥९२॥
यानि रत्नानि मणयो गजाश्वादीनि वै प्रभो।
त्रैलोक्ये तु समस्तानि साम्प्रतं भान्ति ते गृहे ॥९३॥
ऐरावतः समानीतो गजरत्नं पुरन्दरात्।
पारिजाततरुश्चायं तथैवोच्चैःश्रवा हयः ॥९४॥
विमानं हंससंयुक्तमेतत्तिष्ठति तेऽङ्गणे।
रत्नभूतमिहानीतं यदासीद्वेधसोऽद्भुतम् ॥९५॥
निधिरेष महापद्मः समानीतो धनेश्वरात्।
किञ्जल्किनीं ददौ चाब्धिर्मालामम्लानपङ्कजाम् ॥९६॥
छत्रं ते वारुणं गेहे काञ्चनस्रावि तिष्ठति।
तथायं स्यन्दनवरो यः पुराऽऽसीत्प्रजापतेः ॥९७॥
मृत्योरुत्क्रान्तिदा नाम शक्तिरीश त्वया हृता।
पाशः सलिलराजस्य भ्रातुस्तव परिग्रहे ॥९८॥
निशुम्भस्याब्धिजाताश्च समस्ता रत्नजातयः।
वह्निरपि ददौ तुभ्यमग्निशौचे च वाससी ॥९९॥
एवं दैत्येन्द्र रत्नानि समस्तान्याहृतानि ते।
स्त्रीरत्नमेषा कल्याणी त्वया कस्मान्न गृह्यते ॥१००॥

ऋषि कहते हैं— ॥८३॥ राजन्! इस प्रकार जब देवता स्तुति कर रहे थे, उस समय पार्वती देवी गङ्गाजीके जलमें स्नान करनेके लिये वहाँ आयीं ॥८४॥ उन सुन्दर भौंहोंवाली भगवतीने देवताओंसे पूछा—‘आपलोग यहाँ किसकी स्तुति करते हैं?’ तब उन्हींके शरीरकोशसे प्रकट हुई शिवादेवी बोलीं— ॥८५॥ ‘शुम्भदैत्यसे तिरस्कृत और युद्धमें निशुम्भसे पराजित हो यहाँ एकत्रित हुए ये समस्त देवता यह मेरी ही स्तुति


१. पा०—समतैः। २. पा०—कोषा। ३. पा०—कौषिकी। ४. पा०—र्द्धापि।

२०८ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण • कर रहे हैं' ॥८६॥ पार्वतीजीके शरीरकोशसे अम्बिकाका प्रादुर्भाव हुआ था, इसलिये वे समस्त लोकोंमें 'कौशिकी' कही जाती हैं ॥ ८७ ॥ कौशिकीके प्रकट होनेके बाद पार्वतीदेवीका शरीर काले रंगका हो गया, अतः वे हिमालयपर रहनेवाली कालिकादेवीके नामसे विख्यात हुई ॥८८॥ तदनन्तर शुम्भ निशुम्भके भृत्य चण्ड-मुण्ड वहाँ आये और उन्होंने परम मनोहर रूप धारण करनेवाली अम्बिकादेवीको देखा ॥८९॥ फिर वे शुम्भके पास जाकर बोले-'महाराज! एक अत्यन्त मनोहर स्त्री है, जो अपनी दिव्य कान्तिसे हिमालयको प्रकाशित कर रही है ॥ ९० ॥ वैसा उत्तम रूप कहीं किसीने भी नहीं देखा होगा। असुरेश्वर ! पता लगाइये, वह देवी कौन है और उसे पकड़ लीजिये ॥ ९१ ॥ स्त्रियोंमें तो वह रत्न है, उसका प्रत्येक अङ्ग बहुत ही सुन्दर है तथा वह अपने श्रीअङ्गोंकी प्रभासे सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाश फैला रही है। दैत्यराज ! अभी वह हिमालयपर ही मौजूद है, आप उसे देख सकते हैं ॥९२॥ प्रभो ! तीनों लोकोंमें मणि, हाथी और घोड़े आदि जितने भी रत्न हैं, वे सब इस समय आपके घरमें शोभा पाते हैं ॥९३॥ हाथियोंमें रत्नभूत ऐरावत, यह पारिजातका वृक्ष और यह उच्चैःश्रवा घोड़ा-यह सब आपने इन्द्रसे ले लिया है ॥ ९४ ॥ हंसोंसे जुता हुआ यह विमान भी आपके आँगनमें शोभा पाता है। यह रत्नभूत अद्भुत विमान, जो पहले ब्रह्माजीके पास था, अब आपके यहाँ लाया गया है ॥९५ ॥ यह महापद्म नामक निधि आप कुबेरसे छीन लाये हैं। समुद्रने भी आपको किञ्जल्किनी नामकी माला भेंट की है, जो केसरोंसे सुशोभित है और जिसके कमल कभी कुम्हलाते नहीं ॥ ९६ ॥ सुवर्णकी वर्षा करनेवाला वरुणका छत्र भी आपके घरमें शोभा पाता है तथा यह श्रेष्ठ रथ, जो पहले प्रजापतिके अधिकारमें था, अब आपके पास मौजूद है ॥९७॥ दैत्येश्वर ! मृत्युकी उत्क्रान्तिदा नामवाली शक्ति भी आपने छीन ली है तथा वरुणका पाश और समुद्रमें होनेवाले सब प्रकारके रत्न आपके भाई निशुम्भके अधिकारमें हैं। अग्निने भी स्वतः शुद्ध किये हुए दो वस्त्र आपकी सेवामें अर्पित किये हैं ॥९८-९९ ॥ दैत्यराज ! इस प्रकार सभी रत्न आपने एकत्र कर लिये हैं। फिर जो यह स्त्रियोंमें रत्नरूप कल्याणमयी देवी है, इसे आप क्यों नहीं अपने अधिकारमें कर लेते ?॥ १००॥ ऋषिरुवाच ॥ १०१ ॥ निशम्येति वचः शुम्भः स तदा चण्डमुण्डयोः । प्रेषयामास सुग्रीवं दूतं देव्या महासुरम् ॥ १०२ ॥ इति चेति च वक्तव्या सा गत्वा वचनान्मम । यथा चाभ्येति सम्प्रीत्या तथा कार्य त्वया लघु ॥ १०३॥ स तत्र गत्वा यत्रास्ते शैलोद्देशेऽतिशोभने । सां देवी तां ततः प्राह श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ॥ १०४॥ ऋषि कहते हैं- ॥१०१॥ चण्ड-मुण्डका यह वचन सुनकर शुम्भने महादैत्य सुग्रीवको दूत बनाकर देवीके पास भेजा और कहा- 'तुम मेरी आज्ञासे उसके सामने ये-ये बातें कहना और ऐसा उपाय करना जिससे प्रसन्न होकर वह शीघ्र ही यहाँ आ जाय' ॥ १०२-१०३ ॥ वह दूत पर्वतके अत्यन्त रमणीय प्रदेशमें, जहाँ देवी मौजूद थीं, गया और मधुर वाणीमें कोमल वचन बोला ॥ १०४॥ दूत उवाच ॥ १०५ ॥ देवि दैत्येश्वरः शुम्भस्त्रैलोक्ये परमेश्वरः। दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः ॥१०६ ॥ अव्याहताज्ञः सर्वासु यः सदा देवयोनिषु । निर्जिताखिलदैत्यारिः स यदाह शृणुष्व तत् ॥ १०७ ॥ १. पा०-इसके बाद कहीं-कहीं 'शुम्भ उवाच' इतना अधिक पाठ है। २. पा०-तां च देवीं ततः।

  • देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति * २०१ मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः । यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक् पृथक् ॥ १०८ ॥ त्रैलोक्ये वररत्नानि मम वश्यान्यशेषतः । तथैव गजरत्नं १ च हृत्वा देवेन्द्रवाहनम् ॥ १०९ ॥ क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः । उच्चैःश्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम् ॥ ११० ॥ यानि चान्यानि देवेषु गन्धर्वेषूरगेषु च । रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने ॥ १११ ॥ स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम् । सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम् ॥ ११२ ॥ मां वा ममानुजं वापि निशुम्भमुरुविक्रमम् । भज त्वं चञ्चलापाङ्गि रत्नभूतासि वै यतः ॥ ११३ ॥ परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यसे मत्परिग्रहात् । एतद् बुद्ध्या समालोच्य मत्परिग्रहतां व्रज ॥ ११४ ॥ दूत बोला- ॥१०५॥ देवि ! दैत्यराज शुम्भ थे, वे सब मेरे ही पास आ गये हैं ॥१११॥ देवि ! इस समय तीनों लोकोंके परमेश्वर हैं। मैं उन्हींका हमलोग तुम्हें संसारकी स्त्रियोंमें रत्न मानते हैं, भेजा हुआ दूत हूँ और यहाँ तुम्हारे ही पास आया अतः तुम हमारे पास आ जाओ; क्योंकि रत्नोंका हूँ ॥ १०६ ॥ उनकी आज्ञा सदा सब देवता एक उपभोग करनेवाले हम ही हैं ॥११२॥ चञ्चल स्वरसे मानते हैं। कोई उसका उल्लङ्घन नहीं कर कटाक्षोंवाली सुन्दरी ! तुम मेरी या मेरे भाई सकता। वे सम्पूर्ण देवताओंको परास्त कर चुके महापराक्रमी निशुम्भकी सेवामें आ जाओ; क्योंकि हैं। उन्होंने तुम्हारे लिये जो संदेश दिया है, उसे तुम रत्नस्वरूपा हो ॥११३ ॥ मेरा वरण करनेसे सुनो ॥ १०७ ॥ 'सम्पूर्ण त्रिलोकी मेरे अधिकारमें तुम्हें तुलनारहित महान् ऐश्वर्यकी प्राप्ति होगी। है। देवता भी मेरी आज्ञाके अधीन चलते हैं। अपनी बुद्धिसे यह विचार कर तुम मेरी पत्नी बन सम्पूर्ण यज्ञोंके भागोंको मैं ही पृथक्-पृथक् जाओ' ॥११४ ॥ भोगता हूँ ॥ १०८ ॥ तीनों लोकोंमें जितने श्रेष्ठ रत्न ऋषिरुवाच ॥ ११५ ॥ हैं, वे सब मेरे अधिकारमें हैं। देवराज इन्द्रका इत्युक्ता सा तदा देवी गम्भीरान्तःस्मिता जगौ । वाहन ऐरावत, जो हाथियोंमें रत्नके समान है, मैंने दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत् ॥ ११६ ॥ छीन लिया है ॥ १०९ ॥ क्षीरसागरका मन्थन करनेसे ऋषि कहते हैं- ॥ ११५ ॥ दूतके यों जो अश्वरत्न उच्चैःश्रवा प्रकट हुआ था, उसे कहनेपर कल्याणमयी भगवती दुर्गादेवी, जो देवताओंने मेरे पैरोंपर पड़कर समर्पित किया इस जगत्को धारण करती हैं, मन-ही-मन है ॥११० ॥ सुन्दरी ! उनके सिवा और भी जितने गम्भीर भावसे मुसकरायीं और इस प्रकार रत्नभूत पदार्थ देवताओं, गन्धर्वों और नागोंके पास बोलीं- ॥ ११६ ॥ १. पा०-गजरत्नं हत्वा । २. पा०-हृदं