भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति * २०१ मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः । यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक् पृथक् ॥ १०८ ॥ त्रैलोक्ये वररत्नानि मम वश्यान्यशेषतः । तथैव गजरत्नं १ च हृत्वा देवेन्द्रवाहनम् ॥ १०९ ॥ क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः । उच्चैःश्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम् ॥ ११० ॥ यानि चान्यानि देवेषु गन्धर्वेषूरगेषु च । रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने ॥ १११ ॥ स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम् । सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम् ॥ ११२ ॥ मां वा ममानुजं वापि निशुम्भमुरुविक्रमम् । भज त्वं चञ्चलापाङ्गि रत्नभूतासि वै यतः ॥ ११३ ॥ परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यसे मत्परिग्रहात् । एतद् बुद्ध्या समालोच्य मत्परिग्रहतां व्रज ॥ ११४ ॥ दूत बोला- ॥१०५॥ देवि ! दैत्यराज शुम्भ थे, वे सब मेरे ही पास आ गये हैं ॥१११॥ देवि ! इस समय तीनों लोकोंके परमेश्वर हैं। मैं उन्हींका हमलोग तुम्हें संसारकी स्त्रियोंमें रत्न मानते हैं, भेजा हुआ दूत हूँ और यहाँ तुम्हारे ही पास आया अतः तुम हमारे पास आ जाओ; क्योंकि रत्नोंका हूँ ॥ १०६ ॥ उनकी आज्ञा सदा सब देवता एक उपभोग करनेवाले हम ही हैं ॥११२॥ चञ्चल स्वरसे मानते हैं। कोई उसका उल्लङ्घन नहीं कर कटाक्षोंवाली सुन्दरी ! तुम मेरी या मेरे भाई सकता। वे सम्पूर्ण देवताओंको परास्त कर चुके महापराक्रमी निशुम्भकी सेवामें आ जाओ; क्योंकि हैं। उन्होंने तुम्हारे लिये जो संदेश दिया है, उसे तुम रत्नस्वरूपा हो ॥११३ ॥ मेरा वरण करनेसे सुनो ॥ १०७ ॥ 'सम्पूर्ण त्रिलोकी मेरे अधिकारमें तुम्हें तुलनारहित महान् ऐश्वर्यकी प्राप्ति होगी। है। देवता भी मेरी आज्ञाके अधीन चलते हैं। अपनी बुद्धिसे यह विचार कर तुम मेरी पत्नी बन सम्पूर्ण यज्ञोंके भागोंको मैं ही पृथक्-पृथक् जाओ' ॥११४ ॥ भोगता हूँ ॥ १०८ ॥ तीनों लोकोंमें जितने श्रेष्ठ रत्न ऋषिरुवाच ॥ ११५ ॥ हैं, वे सब मेरे अधिकारमें हैं। देवराज इन्द्रका इत्युक्ता सा तदा देवी गम्भीरान्तःस्मिता जगौ । वाहन ऐरावत, जो हाथियोंमें रत्नके समान है, मैंने दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत् ॥ ११६ ॥ छीन लिया है ॥ १०९ ॥ क्षीरसागरका मन्थन करनेसे ऋषि कहते हैं- ॥ ११५ ॥ दूतके यों जो अश्वरत्न उच्चैःश्रवा प्रकट हुआ था, उसे कहनेपर कल्याणमयी भगवती दुर्गादेवी, जो देवताओंने मेरे पैरोंपर पड़कर समर्पित किया इस जगत्को धारण करती हैं, मन-ही-मन है ॥११० ॥ सुन्दरी ! उनके सिवा और भी जितने गम्भीर भावसे मुसकरायीं और इस प्रकार रत्नभूत पदार्थ देवताओं, गन्धर्वों और नागोंके पास बोलीं- ॥ ११६ ॥ १. पा०-गजरत्नं हत्वा । २. पा०-हृदं