भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२९० • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •


देव्युवाच ॥ ११७॥सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः।
सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चित्त्वयोदितम्।केशाकर्षणनिर्धूतगौरवा मा गमिष्यसि ॥ १२६ ॥
त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भो निशुम्भश्चापि तादृशः ॥ ११८ ॥दूत बोला— ॥ १२२ ॥ देवि! तुम घमंडमें
किं त्वत्र यत्प्रतिज्ञातं मिथ्या तत्क्रियते कथम्।भरी हो, मेरे सामने ऐसी बातें न करो। तीनों
श्रूयतामल्पबुद्धित्वात्प्रतिज्ञा या कृता पुरा ॥ ११९ ॥लोकोंमें कौन ऐसा पुरुष है, जो शुम्भ-
यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति ।निशुम्भके सामने खड़ा हो सके ॥ १२३॥ देवि।
यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति ॥ १२० ॥अन्य दैत्योंके सामने भी सारे देवता युद्धमें
तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महासुरः।नहीं ठहर सकते, फिर तुम अकेली स्त्री
मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु ॥ १२१ ॥होकर कैसे ठहर सकती हो ॥ १२४ ॥ जिन
देवीने कहा— ॥ ११७॥ दूत ! तुमने सत्यशुम्भ आदि दैत्योंके सामने इन्द्र आदि देवता
कहा है, इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है। शुम्भभी युद्धमें खड़े नहीं हुए, उनके सामने तुम
तीनों लोकोंका स्वामी है और निशुम्भ भी उसीकेस्त्री होकर कैसे जाओगी ॥ १२५ ॥ इसलिये
समान पराक्रमी है ॥ ११८ ॥ किंतु इस विषयमें मैंनेतुम मेरे ही कहनेसे शुम्भ-निशुम्भके पास
जो प्रतिज्ञा कर ली है, उसे मिथ्या कैसे करूँ। मैंनेचली चलो। ऐसा करनेसे तुम्हारे गौरवकी रक्षा
अपनी अल्पबुद्धिके कारण पहलेसे जो प्रतिज्ञाहोगी; अन्यथा जब वे केश पकड़कर घसीटेंगे,
कर रखी है, उसको सुनो ॥ ११९ ॥ 'जो मुझेतब तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा खोकर जाना
संग्राममें जीत लेगा, जो मेरे अभिमानको चूर्ण करपड़ेगा ॥ १२६ ॥
देगा तथा संसारमें जो मेरे समान बलवान् होगा,देव्युवाच ॥ १२७॥
वही मेरा स्वामी होगा' ॥ १२० ॥ इसलिये शुम्भएवमेतद् बली शुम्भो निशुम्भश्चातिवीर्यवान् ।
अथवा महादैत्य निशुम्भ स्वयं ही यहाँ पधारें औरकिं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा ॥ १२८ ॥
मुझे जीतकर शीघ्र ही मेरा पाणिग्रहण कर लें,स त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमादृतः।
इसमें विलम्बकी क्या आवश्यकता है ॥ १२१ ॥तदाचक्ष्वासुरेन्द्राय स च युक्तं करोतु तत्॥ ॐ ॥ १२९ ॥
दूत उवाच ॥ १२२ ॥देवीने कहा— ॥ १२७ ॥ तुम्हारा कहना ठीक
अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः।है, शुम्भ बलवान् हैं और निशुम्भ भी बड़े
त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भनिशुम्भयोः ॥ १२३ ॥पराक्रमी हैं; किंतु क्या करूँ। मैंने पहले बिना
अन्येषामपि दैत्यानां सर्वे देवा न वै युधि।सोचे-समझे प्रतिज्ञा कर ली है ॥ १२८ ॥ अतः अब
तिष्ठन्ति सम्मुखे देवि किं पुनः स्त्री त्वमेकिका ॥ १२४॥तुम जाओ; मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सब
इन्द्राद्याः सकला देवास्तस्थुर्येषां न संयुगे ।दैत्यराजसे आदरपूर्वक कहना। फिर वे जो उचित
शुम्भादीनां कथं तेषां स्त्री प्रयास्यसि सम्मुखम् ॥ १२५ ॥जान पड़े, करें ॥ १२९ ॥

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये देव्या दूतसंवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ उवाच ९, त्रिपन्मन्त्राः ६६, श्लोकाः ५४, एवम् १२९, एवमादितः ॥ ३८८ ॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'देवी-दूत-संवाद' नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥


१. पाठ०—यत्।

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