संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१९८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
चतुर्थोऽध्यायः
इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवीकी स्तुति
| ध्यान | या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः |
|---|---|
| ( ॐ कज्जलाभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां | पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः। |
| शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्। | श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा |
| सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं | तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम्॥ ५ ॥ |
| ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः॥ | किं वर्णयाम तव रूपमचिन्त्यमेतत् |
| सिद्धि की इच्छा रखनेवाले पुरुष जिनकी सेवा | किं चातिवीर्यमसुरक्षयकारि भूरि। |
| करते हैं तथा देवता जिन्हें सब ओरसे घेरे रहते | किं चाहवेषु चरितानि तवाद्भुतानि |
| हैं, उन 'जया' नामवाली दुर्गादेवीका ध्यान करे। | सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु ॥ ६ ॥ |
| उनके श्रीअङ्गोंकी आभा काले मेघके समान | हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषै- |
| श्याम है। वे अपने कटाक्षोंसे शत्रुसमूहको भय | र्न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा। |
| प्रदान करती हैं। उनके मस्तकपर आबद्ध चन्द्रमाकी | सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत- |
| रेखा शोभा पाती है। वे अपने हाथोंमें शङ्ख, चक्र, | मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या॥ ७ ॥ |
| कृपाण और त्रिशूल धारण करती हैं। उनके तीन | यस्याः समस्तसुरता समुदीरणेन |
| नेत्र हैं। वे सिंहके कंधेपर चढ़ी हुई हैं और अपने | तृप्तिं प्रयाति सकलेषु मखेषु देवि। |
| तेजसे तीनों लोकोंको परिपूर्ण कर रही हैं।) | स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतु- |
| ऋषिरुवाच^१॥ १ ॥ | रुच्चार्यसे त्वमत एव जनैः स्वधा च ॥ ८ ॥ |
| 'ॐ' शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये | या मुक्तिहेतुरविचिन्त्यमहाव्रता त्वं- |
| तस्मिन्दुरातत्मनि सुरारिबले च देव्या। | मभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः। |
| तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा | मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै- |
| वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्गमचारुदेहाः॥ २ ॥ | र्विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि॥ ९ ॥ |
| देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या | शब्दात्मिका सुविमलगर्यजुषां निधान- |
| निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या । | मुद्गीथरम्यपदपाठवतां च साम्नाम्। |
| तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां | देवी त्रयी भगवती भवभावनाय |
| भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥ ३ ॥ | वार्त्ता च सर्वजगतां परमार्त्तिहन्त्री॥ १०॥ |
| यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो | मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा |
| ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तुमलं बलं च। | दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्गा। |
| सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय | श्रीः कैटभारिहृदयैककृताधिवासा |
| नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु॥ ४॥ | गौरी त्वमेव शशिकृतप्रतिष्ठा॥ ११॥ |
१. 'किनो-विंसी प्रतियों' 'ऋषिरुवाच' के बाद 'ततः सुरगणाः सर्वे देवा इन्द्रपुरोगमाः। स्तुतिमारभिरं कर्तुं निहते महिषासुरे।' इतना पाठ अधिक है।
२. पा०- च अङ्गाः।