संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- सेनापतियोंसहित महिषासुरका वध * | १९७ ---|---
तीनों लोकोंको व्याकुल करने लगा ॥ ३३ ॥ तब क्रोधमें भरी हुई जगन्माता चण्डिका बारंबार उत्तम मधुका पान करने और लाल आँखें करके हँसने लगीं ॥ ३४ ॥ उधर वह बल और पराक्रमके मदसे उन्मत्त हुआ राक्षस अपने सींगोंसे चण्डीके ऊपर पर्वतोंको फेंकने लगा और डकारने लगा ॥ ३५ ॥ उस समय देवी अपने बाणोंके समूहोंसे उसके फेंके हुए पर्वतोंको चूर्ण करती हुई बोलीं। बोलते समय उनका मुख मधुके मदसे लाल हो रहा था और वाणी लड़खड़ा रही थी ॥ ३६ ॥
देव्युवाच ॥ ३७ ॥ गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम्। मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः॥ ३८ ॥
देवीने कहा— ॥ ३७ ॥ ओ मूढ़ ! मैं जबतक मधु पीती हूँ तबतक तू क्षणभरके लिये खूब गर्ज ले। मेरे हाथसे यहीं तेरी मृत्यु हो जानेपर अब शीघ्र ही देवता भी गर्जना करेंगे ॥ ३८ ॥
ऋषिरुवाच ॥ ३९ ॥ एवमुक्त्वा समुत्पत्य साऽऽरूढा तं महासुरम्। पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत् ॥ ४० ॥ ततः सोऽपि पदाऽऽक्रान्तस्तया निजमुखात्ततः। अर्धनिष्क्रान्त एवासीद्देव्या^१ वीर्येण संवृतः ॥ ४१ ॥ अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः। तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः ॥ ४२ ॥ ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत्। प्रहर्षं च परं जग्मुः सकला देवतागणाः ॥ ४३ ॥ तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सह दिव्यैर्महर्षिभिः। जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ४४ ॥
उछलीं और उस महादैत्यके ऊपर चढ़ गयीं। फिर अपने पैरसे उसे दबाकर उन्होंने शूलसे उसके कण्ठमें आघात किया। [उनके पैरसे दबा होनेपर भी महिषासुर अपने मुखसे दूसरे रूपमें बाहर होने लगा] ॥ ४० ॥ अभी आधे शरीरसे ही वह बाहर निकलने पाया था कि देवीने अपने प्रभावसे उसे रोक दिया ॥ ४१ ॥ आधा निकला होनेपर भी वह महादैत्य देवीसे युद्ध करने लगा। तब देवी बहुत बड़ी तलवारसे उसका मस्तक काट गिराया ॥ ४२ ॥
फिर तो हाहाकार करती हुई दैत्योंकी सारी सेना भाग गयी तथा सम्पूर्ण देवता अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ ४३ ॥ देवताओंने दिव्य महर्षियोंके साथ दुर्गादेवीका स्तवन किया। गन्धर्वराज गान करने लगे तथा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ ४४ ॥
ऋषि कहते हैं— ॥ ३९ ॥ यों कहकर देवी
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये महिषासुरवधो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ उवाच २, श्लोकाः ४१, एवम् ४४, एवमादितः ॥ २१७ ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवी-माहात्म्यमें 'महिषासुर वध' नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
^१. पा०—एवाति देव्या।
^२. किसी-किसी प्रतिमें इसके बाद—
'एवं तं महिषो नाथ रक्षौघैः समुद्गदन्। त्रैलोक्यं मोहयित्वा तु तया दैत्यो विनाशितः ॥
त्रैलोक्यस्थैस्तदा भूतैर्महिषे विनिपातिते। जयेत्युक्तं ततः सर्वैः सदेवासुरमानवैः ॥'—इतना अधिक पाठ है।