भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 296 में से

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पृष्ठ 175
  • वैवस्वत मन्वन्तरकी कथा तथा सावर्णिंक मन्वन्तरका संक्षिप्त परिचय * १७५

प्रसीद स्वेच्छया रूपं स्वतेजःशमने कुरु॥

ऋग्वेदकी ये सम्पूर्ण ऋचाएँ, दूसरी ओर यजुर्वेदके ये सब मन्त्र तथा सामवेदकी सम्पूर्ण श्रुतियाँ आपके ही अङ्गोंसे प्रकट होती हैं। जगन्नाथ! आप ऋग्वैदमय हैं, आप ही यजुर्वेदमय हैं तथा आप ही सामवेदमय हैं। नाथ! इस प्रकार आप त्रयीमय हैं—तीनों वेद आपके ही स्वरूप हैं। आप ही ब्रह्मके पर और अपर रूप हैं। मूर्त्त, अमूर्त्त, स्थूल और सूक्ष्म सभी रूपोंमें आपकी ही स्थिति है। निमेष, काष्ठा आदि जो कालके छोटे-छोटे विभाग हैं, वे सब आपके ही स्वरूप हैं। आप ही क्षणात्मक (प्रतिक्षण बीतनेवाला) कालरूप हैं। भगवन्! आप प्रसन्न होइये और अपनी इच्छासे ही अपने प्रचण्ड तेजको शान्त कीजिये।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—देवताओं और देवर्षियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर तेजोराशि अविनाशी भगवान् सूर्यने विश्वकर्माके द्वारा अपने तेजको कम कर दिया। उनका जो ऋग्वेदद्मय तेज था, उससे पृथ्वीका निर्माण हुआ। यजुर्वेदमय तेजसे द्युलोककी रचना हुई और सामवेदमय तेज ही स्वर्गलोकके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ। विश्वकर्माने सूर्यके तेजके सोलह भागोंमेंसे पंद्रह भाग छाँट दिये और उनके द्वारा शंकरजीका त्रिशूल, भगवान् विष्णुका चक्र, वसुगणोंके भयंकर शङ्कु, अग्निकी शक्ति, कुबेरकी शिविका तथा अन्यान्य देवता, यक्ष एवं विद्याधरोंके लिये भयंकर अस्त्र शस्त्र बनाये। भगवान् सूर्य तबसे अपने तेजके सोलहवें भागको धारण करते हैं। तेज कम होनेके बाद वे अश्वका रूप धारण करके उत्तरकुरु नामक देशमें गये और वहाँ उन्होंने घोड़ीके रूपमें संज्ञाको देखा। उन्हें आते देख संज्ञाको पराये पुरुषकी आशङ्का हुई, इसलिये वह अपने पृष्ठभागकी रक्षा करती हुई सामनेकी ओरसे उनके सम्मुख गयी; फिर वहाँ उनके मिलनेपर पहले दोनोंकी नासिकाका संयोग हुआ। इससे अश्वरूपधारिणी संज्ञाके मुखसे दो पुत्र प्रकट हुए, जो नासत्य और दस्र नामसे प्रसिद्ध हुए। फिर वीर्यपातके अनन्तर रेवन्त नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो ढाल, तलवार और कवच धारण किये, बाण और तरकससे सुसज्जित हो घोड़ेपर चढ़ा हुआ ही प्रकट हुआ था।

तत्पश्चात् भगवान् सूर्यने संज्ञाको अपने अनुपम स्वरूपका दर्शन कराया। उनके इस रूपको देखकर संज्ञाको बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर उसने भी अपना रूप धारण कर लिया। तब सूर्यदेव अपनी प्रीतिमती पत्नी संज्ञाको साथ ले अपने निवास-स्थानपर आये। भगवान् सूर्यके जो प्रथम पुत्र थे, उनकी वैवस्वत नामसे प्रसिद्धि हुई। दूसरे पुत्रका नाम यम था। ये माताके शापसे ग्रस्त थे। पिताने इनके शापका अन्त इस प्रकार किया था—‘कीड़े यमके पैरका मांस लेकर पृथ्वीपर गिर पड़ेंगे। फिर इनका पैर ठीक हो जायगा।’ यम धर्मपर दृष्टि रखते थे और मित्र तथा शत्रुके प्रति उनका समान भाव था। अतः सूर्यने प्रजाओंके धर्माधर्मका फल देनेके लिये उन्हें यमराजके पदपर प्रतिष्ठित किया। यमुना कलिन्दपर्वतके बीचसे बहनेवाली नदी हो गयी। दोनों अश्विनीकुमार देवताओंके वैद्य नियुक्त किये गये। रेवन्तको भी गुह्यकोंका स्वामी बनाया गया। अब छायासंज्ञाके पुत्रोंकी जहाँ नियुक्ति हुई, उसका हाल सुनो। छायासंज्ञाके ज्येष्ठ पुत्रका वर्ण (रूप-रंग) वैवस्वत मनुके ही समान था, अतः वे सावर्णिंक नामसे प्रसिद्ध हुए। वे ही आठवें मनु होंगे। उस समय राजा बलि इन्द्रके पदपर प्रतिष्ठित रहेंगे। छायाके दूसरे पुत्र शनैश्चरको पिताने ग्रहोंके

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