संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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आपके ही घर भेज दिया।' तब सूर्यने समाधिस्थ होकर देखा, वह घोड़ीका रूप धारणकर उत्तरकुरु देशमें तपस्या कर रही है। उसकी तपस्याका एक ही उद्देश्य है, 'मेरे स्वामीकी आकृति सौम्य एवं शुभ हो जाय।' सूर्यको उसकी तपस्याका उद्देश्य ज्ञात हो गया; अतः उन्होंने विश्वकर्मासे कहा- 'आप मेरे तेजको छाँट दीजिये।' तब उन्होंने संवत्सररूप चक्रवाले सूर्यके तेजको छाँट दिया, उस समय देवताओने उनकी बड़ी प्रशंसा की। तदनन्तर देवताओं और ऋषियोंने सम्पूर्ण त्रिभुवनके पूजनीय भगवान् सूर्यका स्तवन आरम्भ किया-
देवा ऊचुः नमस्ते ऋक्स्वरूपाय सामरूपाय ते नमः। यजुःस्वरूपरूपाय साम्नां धामवते नमः॥ ज्ञानैकधामभूताय निर्धूततमसे नमः। शुद्धज्योतिःस्वरूपाय विशुद्धायामलात्मने॥ वरिष्ठाय वरेण्याय परस्मै परमात्मने। नमोऽखिलजगद्व्यापिस्वरूपायात्ममूर्त्तये ॥ सर्वकारणभूताय निष्ठाय ज्ञानचेतसाम्। नमः सूर्यस्वरूपाय प्रकाशात्मस्वरूपिणे॥ भास्कराय नमस्तुभ्यं तथा दिनकृते नमः। शर्वरीहेतवे चैव सन्ध्याज्योत्स्नाकृते नमः॥
देवता बोले—भगवन्! ऋग्वेदस्वरूप आपको नमस्कार है। सामवेदरूप आपको प्रणाम है। यजुर्वेदस्वरूप आपको नमस्कार है। आप ही समस्त सामोंके अधिष्ठान हैं, आपको प्रणाम है। आप ज्ञानके एकमात्र आधार एवं अन्धकारका नाश करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप शुद्ध ज्योतिर्मय है। आप स्वभावसे ही परम शुद्ध एवं निर्मलात्मा हैं, आपको प्रणाम है। आप सबसे महान्, सर्वश्रेष्ठ, सबसे परे और साक्षात् परमात्मा हैं। आपका स्वरूप सम्पूर्ण जगत्में व्यापक है। आप सबके आत्मरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप सबकी उत्पत्तिके कारण, ज्ञानका चिन्तन करनेवाले पुरुषोंके प्राप्य स्थान, सूर्यस्वरूप तथा प्रकाशात्मारूप हैं। आपको नमस्कार है। प्रभाका विस्तार करनेवाले आपको नमस्कार है। दिनकी सृष्टि करनेवाले आपको प्रणाम है। रात्रिके हेतु भी आप ही हैं तथा संध्या, और चाँदनीकी सृष्टि भी आप ही करते हैं; आपको नमस्कार है।
त्वं सर्वमेतद् भगवन् जगदुद्भ्रमता त्वया। भ्रमत्यविद्धमखिलं ब्रह्माण्डं सचराचरम्॥ त्वदंशुभिरिदं स्पृष्टं सर्वं संजायते शुचि। क्रियते त्वत्करैः स्पर्शाज्जलादीनां पवित्रता॥ होमदानादिको धर्मो नोपकाराय जायते। तावद् यावन्न संयोगि जगदेतत् त्वदंशुभिः॥
भगवन्! आप ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं। आपमें ही चराचर प्राणियोंसहित समस्त ब्रह्माण्ड ओतप्रोत है; अतएव ऊर्ध्वलोकमें जब आप भ्रमण करते हैं तो आपके साथ यह ब्रह्माण्ड भी घूमता है। आपकी किरणोंका स्पर्श पाकर ही सम्पूर्ण वस्तुएँ पवित्र होती हैं। आपकी किरणें ही अपने स्पर्शसे जल आदिको पवित्र करती हैं। जबतक इस जगत्में आपकी दिव्य रश्मियोंका संयोग नहीं होता, तबतक होम-दान आदि धर्म सफल नहीं हो पाता।
ऋचस्ते सकला होता यजूंष्येतानि चान्यतः। सकलानि च सामानि निपतन्ति त्वदङ्गतः॥ ऋङ्मयस्त्वं जगन्नाथ त्वमेव च यजुर्मयः। यतः साममयश्चैव ततो नाथ त्रयीमयः॥ त्वमेव ब्रह्मणो रूपं परं चापरमेव च। मूर्त्तामूर्त्तस्तथा सूक्ष्मः स्थूलरूपस्तथा स्थितः॥ निमेषकाष्ठादिमयः कालरूपः क्षयात्मकः।