भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 173
  • वैवस्वत मन्वन्तरकी कथा तथा सावर्णिक मन्वन्तरका संक्षिप्त परिचय * १७३

अपनी दृष्टि चञ्चल की है, इसलिये चञ्चल लहरोंसे युक्त नदी तेरी कन्याके रूपमें उत्पन्न होगी। तदनन्तर पतिके शापसे संज्ञाने एक पुत्र और पुत्रीको जन्म दिया। पुत्रका नाम यम हुआ और पुत्री यमुना नामसे विख्यात महानदी हुई। संज्ञा सूर्यके तेजको बड़े कष्टसे सहन करती थी। वह उसके लिये असह्य था। उसने सोचा—‘क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कहाँ जानेसे मुझे शान्ति मिलेगी और मेरे स्वामी मुझपर कुपित भी नहीं होंगे?’ इस तरह अनेक प्रकारसे विचार करके प्रजापतिकुमारी संज्ञाने पिताके घरका आश्रय लेना ही ठीक समझा। वहाँ जानेके लिये उद्यत होकर उसने अपनी छायाको ही सूर्यदेवकी पत्नी बनाया और उससे कहा—‘तू इस घरमें रह और मेरी ही तरह सब संतानों तथा भगवान् सूर्यके प्रति भी उत्तम बर्ताव करना।’

यों कहकर संज्ञादेवी अपने पिताके घर चली गयीं। वहाँ उन्होंने त्वष्टा प्रजापतिका दर्शन किया, उन्होंने भी बड़े आदरके साथ पुत्रीका स्वागत-सत्कार किया। वे कुछ कालतक वहाँ रहीं। इसके बाद पिताने उन्हें प्रेमपूर्वक समझाते हुए कहा—‘बेटी! तुम तीनों लोकके स्वामी भगवान् सूर्यकी पत्नी हो। अतः तुम्हें अधिक समयतक पिताके घरमें नहीं ठहरना चाहिये। अब तुम स्वामीके घर जाओ। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ।’

पिताके यों कहनेपर संज्ञाने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और उन्हें प्रणाम करके वहाँसे चली गयीं। वे सूर्यके तेजसे बहुत डरती थीं और उनके तापका सामना करना नहीं चाहती थीं; इसलिये उत्तरकुरुमें जाकर घोड़ीके रूपमें रहने और तपस्या करने लगीं। उधर छायासंज्ञाको ही संज्ञा समझकर भगवान् सूर्यने उससे दो पुत्र और एक मनोहर कन्या उत्पन्न की। छायासंज्ञा अपनी संतानोंको जितना प्यार करती थी, उतना संज्ञाके पुत्र-पुत्रीको नहीं। मनु तो उसके इस बर्तावको सह लेते थे, किन्तु यमसे सहन नहीं हुआ। उन्होंने क्रोधमें आकर उसे मारनेके लिये लात उठायी, किन्तु फिर क्षमा-भावका आश्रय ले उसके शरीरपर लात नहीं लगायी। तब छायासंज्ञाने कुपित हो यमको शाप दिया—‘मैं तुम्हारे पिताकी पत्नी हूँ, किन्तु तुम मर्यादाका उल्लङ्घन करके मुझे मारनेके लिये लात उठा रहे हो; इसलिये तुम्हारा यह पैर आज ही पृथ्वीपर गिर पड़ेगा।’

माताका दिया हुआ शाप सुनकर यम भयसे व्याकुल हो उठे और अपने पिताके पास जा उन्हें प्रणाम करके बोले—‘पिताजी! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है; ऐसा तो कभी किसीने भी नहीं देखा होगा कि माता वात्सल्य छोड़कर अपने पुत्रको शाप दे डाले। दुर्गुणी पुत्रोंके प्रति भी माताका दुर्भाव नहीं होता।' यमराजकी यह बात सुनकर भगवान् सूर्यने छायासंज्ञाको बुलाकर पूछा—'संज्ञा कहाँ गयी?' वह बोली—'नाथ! मैं ही तो त्वष्टा प्रजापतिकी कन्या और आपकी पत्नी संज्ञा हूँ। आपने मुझसे ही ये संतान उत्पन्न किये हैं।' सूर्यने कई बार घुमा-फिराकर पूछा, किन्तु उसने सच्ची बात नहीं बतायी। तब सूर्यदेव उसे शाप देनेको उद्यत हुए, यह देख उसने सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। असली बातका पता लगनेपर भगवान् सूर्य विश्वकर्माके घर गये। विश्वकर्माने अपने घर पधारे हुए त्रिलोकपूजित सूर्यदेवका बड़ी भक्तिके साथ पूजन किया। फिर संज्ञाका पता पूछनेपर उन्होंने कहा—‘भगवन्! वह मेरे घरपर आयी अवश्य थी, किन्तु मैंने पुनः उसे