भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 169
  • रैवत मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन * १६९

पिताका नाम विक्रमशील था और वे कालिन्दीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। आश्रममें पहुँचनेपर जब उन्हें ऋषि नहीं दिखायी दिये, तब उन्होंने रेवतीको 'प्रिये' कहकर सम्बोधित किया और पूछा—'सुन्दरी! बताओ तो सही, मुनिश्रेष्ठ प्रमुच इस आश्रमसे कहाँ गये हैं? मैं उन्हें प्रणाम करना चाहता हूँ।'

मुनि अग्निशालामें बैठे हुए थे, वहींसे राजाका वार्तालाप और 'प्रिये' सम्बोधन सुनकर वे तुरंत ही बाहर निकले। उन्होंने देखा, राजोचित चिह्नोंसे युक्त महात्मा राजा दुर्गम विनीत भावसे सामने खड़े हैं। उन्हें देखकर मुनिने गौतम नामक शिष्यसे कहा—'गौतम! इन महाराजके लिये अर्घ्य लाओ।' राजा अर्घ्य स्वीकार करके जब आसनपर विराजमान हुए, तब महामुनि प्रमुचने स्वागतपूर्वक पूछा—'राजन्! आपके घर, सेना, खजाना, मित्र, भृत्य, मन्त्री तथा शरीरकी कुशल तो है न?'

राजाने कहा—सुव्रत! आपकी कृपासे मेरे यहाँ सब कुशलसे हैं, कहीं भी कुशलका अभाव नहीं है।

ऋषि बोले—राजन्! मेरे यहाँ एक कन्या है। इसके लिये वर ढूँढ़नेकी इच्छासे मैंने अग्निदेवसे पूछा था—'इसका पति कौन होगा?' अग्निदेवने कहा—'राजा दुर्गम ही इसके स्वामी होंगे।' इसलिये अब आप मेरी दी हुई इस कन्याको ग्रहण करें। आपने भी 'प्रिये' कहकर इसको सम्बोधित किया है, अतः अब क्यों विचार करते हैं।

मुनिकी बात सुनकर राजा दुर्गम मौन रह गये। तब महर्षि प्रमुच अपनी कन्याका वैवाहिक कार्य सम्पन्न करनेको उद्यत हुए। अपने विवाहके लिये पिताको उद्यत देख कन्याने विनयसे मस्तक झुकाकर कहा—'पिताजी! यदि आपका मुझपर प्रेम है तो कृपा करके मेरा विवाह रेवती नक्षत्रमें ही कीजिये।'

ऋषि बोले—भद्रे! ऋतवाक् नामसे विख्यात तपस्वी मुनिने रेवती नक्षत्रपर क्रोध करके उसे नक्षत्रमण्डलसे नीचे गिरा दिया है।

कन्याने कहा—पिताजी! क्या ऋतवाक् मुनिने ही ऐसी तपस्या की है, आपने नहीं? यदि आप भी तपस्वी हैं तो रेवती नक्षत्रको पुनः आकाशमें स्थापित कीजिये। आप उसी नक्षत्रमें मेरा विवाह क्यों नहीं करते?

ऋषि बोले—भद्रे! तेरा कल्याण हो, अब तू प्रसन्न हो जा। मैं तेरे लिये रेवती नक्षत्रको पुनः चन्द्रमाके मार्गमें स्थापित करता हूँ।

तदनन्तर महामुनि प्रमुचने अपनी तपस्याके प्रभावसे रेवती नक्षत्रको पुनः पहलेकी ही भाँति चन्द्रमण्डलसे संयुक्त कर दिया। फिर उसी नक्षत्रमें वैदिक मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए कन्याका विधिपूर्वक विवाह किया और प्रसन्न होकर अपने