भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 296 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 168

१६८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


कुपुत्रका आश्रय लेनेवाला मेरा यह अधम जन्म केवल नरकमें ले जानेवाला है, उत्तम गतिकी प्राप्ति करानेवाला नहीं।'

इस प्रकार अत्यन्त दुष्ट पुत्रके दुराचारोंसे ऋतवाक् मुनिका हृदय जलने लगा। उन्होंने गर्गमुनिसे इसका कारण पूछा।

ऋतवाक् बोले—महामुने! पूर्वकालमें उत्तम ऋतका पालन करते हुए मैंने सब वेदोंका विधिपूर्वक अध्ययन किया और उन्हें समाप्त करके वैदिक विधिके अनुसार स्त्रीके साथ विवाह किया; फिर स्त्रीको साथ रखकर वेदों और स्मृतियोंमें बताये हुए सभी कर्तव्य कर्मोंका अनुष्ठान किया। आजतक किसी भी क्रियाके अनुष्ठानमें न्यूनता नहीं आने दी। मुने! 'पुम्' नामके नरकसे डरते हुए मैंने गर्भाधानकी विधिसे पुत्रोत्पत्तिके उद्देश्य रखकर स्त्रीके साथ समागम किया है, कामोपभोगके लिये नहीं। वह सब होनेपर भी ऐसे कुपुत्रका जन्म क्यों हुआ? क्या वह मेरे दोषसे अथवा अपने दोषसे उत्पन्न हुआ है, जो अपनी दुष्टतासे हमारे लिये दुःखदायी और बन्धुजनोंके लिये शोककारक हो गया है?

गर्गने कहा—मुनिश्रेष्ठ! तुम्हारा यह पुत्र रेवती नक्षत्रके अन्तिम चरणमें उत्पन्न हुआ है, अतः दूषित समयमें जन्म ग्रहण करनेके कारण यह तुम्हारे लिये दुःखदायी हो गया है।

ऋतवाक् बोले—मेरे एक ही पुत्र था तो भी रेवती नक्षत्रके अन्तिम भागमें उत्पन्न होनेके कारण इसमें ऐसी दुष्टता आ गयी; इसलिये रेवतीका शीघ्र ही पतन हो जाय।

मुनिके इस प्रकार शाप देते ही रेवती नक्षत्र आकाशसे गिरा। सारा संसार चकितचित्त होकर यह दृश्य देख रहा था। वह नक्षत्र कुमुदगिरिके चारों ओर गिर पड़ा। वहाँके वन, गुफाएँ तथा झरने आदि सहसा उद्भासित हो उठे। रेवती नक्षत्रके गिरनेसे कुमुदगिरिका नाम रैवतक पर्वत हो गया। उस नक्षत्रकी जो कान्ति थी, वह कमलमण्डित सरोवरके रूपमें प्रकट हुई। उस समय उस सरोवरसे एक अत्यन्त सुन्दरी कन्याका प्रादुर्भाव हुआ। वह रेवतीकी कान्तिसे प्रकट हुई थी, इसलिये प्रमुच मुनिने उसे देखकर उसका नाम रेवती रख दिया। वह उनके आश्रमके पास ही प्रकट हुई थी, इसलिये वे ही पिताकी भाँति उसका पालन-पोषण करने लगे। जब कन्या यौवनावस्थामें पदार्पण कर चुकी, तब प्रमुच मुनि उसके लिये योग्य वर पूछनेके विचारसे अग्निशालामें गये। उनके प्रश्न करनेपर अग्निदेवने उत्तर दिया—'इस कन्याके स्वामी राजा दुर्गम होंगे, जो महाबली, महापराक्रमी, प्रियवक्ता और धर्मवत्सल हैं।'

इसी बीचमें मृगयाके प्रसङ्गसे राजा दुर्गम मुनिके आश्रमपर आ पहुँचे। वे प्रियव्रतके वंशमें उत्पन्न अत्यन्त बलवान् और पराक्रमी थे। उनके