संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
आपका चलाया हुआ बाण मुझे समस्त दुःखोंसे मुक्त कर देगा।'
**स्वरोचिष्ने कहा—**मुझे तेरे शरीरमें कोई रोग नहीं दिखायी देता; फिर क्या कारण है कि तू अपने प्राणोंको त्याग देना चाहती है?
**मृगी बोली—**जिस पुरुषमें मेरा चित्त लगा हुआ है, उसका मन दूसरी स्त्रियोंमें आसक्त है, अतः उसके बिना मेरी मृत्यु निश्चित है। ऐसी दशामें बाणोंकी चोट सहनेके सिवा मेरे लिये यहाँ दूसरी कौन-सी दवा है।
**स्वरोचिष्ने कहा—**भीरु! वह कौन-सा पुरुष है, जो तुझे नहीं चाहता? अथवा किसके प्रति तेरा अनुराग है, जिसे न पानेके कारण तू अपने प्राण त्याग देनेको तैयार हो गयी है?
**मृगी बोली—**आर्य! आपका कल्याण हो। मैं आपको ही प्राप्त करना चाहती हूँ। आपने ही मेरा चित्त चुराया है। इसीलिये मैं स्वेच्छासे मृत्युका वरण करती हूँ। आप मुझको बाण मारिये।
**स्वरोचिष्ने कहा—**देवि! तू चञ्चल कटाक्षवाली मृगी है और मैं मनुष्यरूपधारी जीव हूँ; फिर मेरे-जैसे पुरुषका तेरे साथ किस प्रकार संयोग होगा?
**मृगी बोली—**यदि मुझमें आपका चित्त अनुरक्त हो तो मेरा आलिङ्गन कीजिये। यदि आपका हृदय शुद्ध होगा तो मैं आपकी इच्छाके अनुसार कार्य करूँगी और इतनेसे ही मैं यह समझूँगी कि आपने मेरा बड़ा आदर किया।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**तब स्वरोचिष्ने उस हरिणीका आलिङ्गन किया। फिर तो वह तत्काल दिव्यरूपधारिणी देवीके रूपमें प्रकट हो गयी। यह देख स्वरोचिष्को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने पूछा—'तुम कौन हो?' वह प्रेम और लज्जासे कुण्ठित वाणीमें बोली—'महामते! मैं इस वनकी देवी हूँ। देवताओंके प्रार्थना करनेपर मैं आपकी सेवामें आयी हूँ, आप मेरे गर्भसे मनुको उत्पन्न कीजिये।'
वनदेवीके यों कहनेपर स्वरोचिष्ने उसके गर्भसे तत्काल ही अपने-जैसा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न किया, जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित था। उसके जन्म लेते ही देवताओंके यहाँ बाजे बजने लगे। गन्धर्वराज गाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं। नाग और तपस्वी ऋषि जलके छींटोंसे उस बालकका अभिषेक करने लगे। देवताओंने उसके ऊपर चारों ओरसे फूलोंकी वृष्टि की। उसके तेजको देखकर पिताने उसका नाम द्युतिमान् रखा, क्योंकि उसकी द्युतिसे सम्पूर्ण दिशाएँ प्रकाशित हो रही थीं! वह महान् बलवान् और अत्यन्त पराक्रमी था। स्वरोचिषका पुत्र होनेके कारण स्वारोचिषके नामसे उसकी प्रसिद्धि हुई। तदनन्तर स्वरोचिष् अपनी स्त्रियोंको साथ ले तपस्या करनेके लिये दूसरे तपोवनमें चले गये।