संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- पद्मिनी विद्याके अधीन रहनेवाली आठ निधियोंका वर्णन - | १५५
वहाँ उनके साथ घोर तपस्या करके समस्त पापोंसे रहित हो वे निर्मल लोकोंको प्राप्त हुए। तत्पश्चात् भगवान् प्रजापतिने स्वरोचिषके पुत्र द्युतिमान्को मनुके पदपर प्रतिष्ठित किया। अब उनके मन्वन्तरका वर्णन सुनो—स्वरोचिष मन्वन्तरमें पारावत और तुषित नामके देवता तथा विपश्चित् नामक इन्द्र हुए। ऊर्ज, स्तम्ब, प्राण, दत्तोत्ति, ऋषभ, निश्चर तथा अर्ववीर—ये ही उस समयके सप्तर्षि थे। महात्मा स्वरोचिषके चैत्र और किम्पुरुष आदि सात पुत्र हुए, जो महान् पराक्रमी और पृथ्वीके पालक थे। जबतक स्वरोचिष मन्वन्तर था, तबतक उन्हींके वंशमें उत्पन्न हुए राजाओंने सारी पृथ्वीका राज्य भोगा। उनका मन्वन्तर द्वितीय कहलाता है। स्वरोचिष् और स्वरोचिषके जन्म और चरित्रका श्रवण करके श्रद्धालु मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
पद्मिनी विद्याके अधीन रहनेवाली आठ निधियोंका वर्णन
**क्रौष्टुकिने कहा—**भगवन्! आपने स्वरोचिष् तथा स्वरोचिषके जन्म एवं चरित्रका सब वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कह सुनाया। अब सम्पूर्ण भोगोंकी प्राप्ति करानेवाली पद्मिनी विद्याके अधीन जो-जो निधियाँ हैं, उनका विस्तारके साथ वर्णन कीजिये।
**मार्कण्डेयजी बोले—**ब्रह्मन्! पद्मिनी नामकी जो विद्या है, उसकी अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मीजी हैं। वे सम्पूर्ण निधियोंकी आधार हैं। पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, मुकुन्द, नन्दक, नील तथा शङ्ख—ये आठ निधियाँ हैं। देवताओंकी कृपा तथा साधु-महात्माओंकी सेवासे प्रसन्न होकर जब ये निधियाँ कृपा-दृष्टि करती हैं तो मनुष्यको सदा धन प्राप्त होता है। अब इनके स्वरूपका वर्णन सुनो। पद्म नामक जो प्रथम निधि है, वह सत्त्वगुणका आधार है। उसके प्रभावसे मनुष्य सोने, चाँदी और ताँबे आदि धातुओंका अधिक मात्रामें संग्रह एवं क्रय-विक्रय करता है। इतना ही नहीं, वह यज्ञोंका अनुष्ठान करता, दक्षिणा देता तथा सभामण्डप एवं देवमन्दिर बनवाता है। महापद्म नामकी जो दूसरी निधि है, वह भी सात्त्विक है। उसके आश्रित हुए मनुष्यमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होती है। वह पद्मराग आदि मणि, मोती और मूँगा आदिका संग्रह एवं क्रय-विक्रय करता है। योगी पुरुषोंको दान देता और उनके लिये आश्रम बनवाता है तथा स्वयं भी उन्हींके स्वभावका हो जाता है। उसके पुत्र-पौत्र आदि भी उसी स्वभावके होते हैं। महापद्मनिधि मनुष्यकी सात पीढ़ियोंतक उसका त्याग नहीं करती। मकर नामकी तीसरी निधि तमोगुणी होती है। उसकी दृष्टि पड़नेपर सुशील मनुष्य भी प्रायः तमोगुणी बन जाता है। वह बाण, खड्ग, ऋष्टि, धनुष, ढाल तथा दंशन करनेवाली वस्तुओंका संग्रह करता, राजाओंके साथ मैत्री जोड़ता, शौर्यसे जीविका चलानेवाले क्षत्रियों तथा उनके प्रेषियोंको धन देता है। अस्त्र-शस्त्रोंके सिवा और किसी वस्तुके क्रय-विक्रयमें उसका मन नहीं लगता। यह निधि एक ही मनुष्यतक सीमित रहती है। उसके पुत्रोंका साथ नहीं देती। वह मनुष्य धनके कारण लुटेरोंके हाथसे अथवा संग्राममें मारा जाता है। कच्छप नामकी जो निधि है, उसकी दृष्टि पड़नेपर भी मनुष्यमें तमोगुणकी प्रधानता होती है। क्योंकि वह भी तामसी निधि है। वह मनुष्य सब व्यवहार पुण्यात्माओंके साथ