भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 296 में से

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पृष्ठ 153

स्वरोचिष् तथा स्वरोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन • १५३

छोड़कर चली गयी। फिर एक महात्मा गन्धर्वने मुझे ले लिया और स्नेहपूर्वक लालन-पालन किया। एक बार देव-शत्रु अलिने मेरे पालक पितासे मुझे माँगा, किन्तु उन्होंने देनेसे इन्कार कर दिया। तब उस राक्षसने सोये हुए मेरे पिताको मार डाला। इस दुर्घटनासे मुझे बड़ा दुःख हुआ और मैं आत्महत्या करनेको तैयार हो गयी। उस समय भगवान् शङ्करकी धर्मपत्नी सत्यवादिनी सतीदेवीने मुझे ऐसा करनेसे रोका और कहा—'सुन्दरी ! तू शोक मत कर। महाभाग स्वरोचिष् तेरे पति होंगे। उनका पुत्र मनु होगा। सब प्रकारकी निधियाँ आदरपूर्वक तेरी आज्ञाका पालन करेंगी और तुझे इच्छानुसार धन देंगी। वत्से ! जिस विद्याके प्रभावसे तुझे वे निधियाँ प्राप्त होंगी, उसे तू मुझसे ग्रहण कर। यह महापद्मपूजित पद्मिनी नामकी विद्या है।' सत्यपरायणा दक्षकन्या सतीने मुझसे ऐसा ही कहा था। निश्चय ही आप स्वरोचिष् हैं। आज मैं अपने प्राणदाताको वह विद्या और यह शरीर अर्पण करती हूँ। आप प्रसन्न होकर मुझे स्वीकार करें।'

कलावतीकी यह प्रार्थना सुनकर स्वरोचिष्ने 'एवमस्तु' कहा। विभावरी और कलावतीकी स्नेहपूर्ण दृष्टिसे विवाहका अनुमोदन पाकर उन्होंने उन दोनोंका पाणिग्रहण किया। फिर अपनी तीनों पत्नियोंके साथ वे रमणीय वनों तथा झरनोंसे सुशोभित गिरिराजके शिखरपर विहार करने लगे। स्वरोचिष्ने छः सौ वर्षोंतक उन स्त्रियोंके साथ रमण किया। वे धर्मका विरोध न करते हुए सम्पूर्ण धार्मिक क्रियाओंका अनुष्ठान करते और विषयोंको भी भोगते थे। तदनन्तर स्वरोचिष्के विजय, मेरुमन्द तथा महाबली प्रभाव—ये तीन पुत्र हुए। इन्दीवरकी पुत्री मनोरमाने विजयको जन्म दिया था, विभावरीके गर्भसे मेरुमन्द और कलावतीके गर्भसे प्रभाव उत्पन्न हुए थे। सम्पूर्ण भोगोंकी प्राप्ति करानेवाली जो पद्मिनी नामकी विद्या थी, उसके प्रभावसे स्वरोचिष्ने अपने तीनों पुत्रोंके लिये तीन नगर बनवाये। पूर्व दिशामें कामरूप नामक पर्वतके ऊपर विजय नामका नगर बसाया और उसे अपने पुत्र विजयके अधिकारमें दे दिया। उत्तर दिशामें मेरुमन्दके लिये नन्दवती नामकी पुरी बनवायी, जिसकी चहारदीवारी बहुत ऊँची थी। कलावतीके पुत्र प्रभावके लिये दक्षिण देशमें उन्होंने ताल नामक नगर बसाया। इस प्रकार तीन नगरोंमें तीनों पुत्रोंको रखकर पुरुषश्रेष्ठ स्वरोचिष् अपनी पत्नियोंके साथ अत्यन्त मनोहर प्रदेशोंमें विहार करने लगे। एक दिन वे हाथमें धनुष लिये वनमें घूम रहे थे। उस समय उन्हें बहुत दूरपर एक सूअर दिखायी दिया। उसे देखकर उन्होंने धनुष खींचा, इतनेमें ही एक हरिणी उनके पास आकर बोली—'वीरवर ! आप कृपा करके मुझपर ही बाण मारिये। इस सूअरको मारनेसे क्या लाभ। मुझको ही तुरंत मार गिराइये।

[ 539 ] सं० मा० पु०—६

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