संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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यों कहनेपर मैंने प्रणाम आदिके द्वारा उन्हें प्रसन्न किया। तब वे कोमल हृदयवाले ब्राह्मण मुझसे इस प्रकार बोले—'विद्याधर! मैंने जो बात कही है, वह अवश्य होगी, टल नहीं सकती। किन्तु तुम राक्षस होकर पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त कर लोगे। निशान्तरावस्थामें स्मरण शक्तिके नष्ट हो जानेपर क्रोधके वशीभूत हो जब तुम अपनी ही संतानको खा डालनेकी इच्छा करोगे, उस समय प्रचण्ड अस्त्रके तेजसे संतप्त होनेपर तुम्हें फिरसे चेत हो जायगा और पूर्ववत् अपने शरीरको धारण करके गन्धर्वलोकमें निवास करोगे।' महाभाग! मैं वही हूँ, आपने महान् भयदायी राक्षस-देहसे मेरा उद्धार किया है, अतः मेरी एक प्रार्थना स्वीकार कीजिये। मैं अपनी पुत्री मनोरमाको आपकी सेवामें दे रहा हूँ। इसे पत्नीरूपमें ग्रहण करें। महामते! ब्रह्मर्षिपुत्र मुनिसे सम्पूर्ण अष्टाङ्ग आयुर्वेदका जो मैंने अध्ययन किया है, वह सब आपको देता हूँ, स्वीकार करें।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— यों कहकर विद्याधरने अपने पूर्व रूपको धारण कर लिया। दिव्य वस्त्र, दिव्य माला और दिव्य आभूषण उसकी शोभा बढ़ाने लगे। फिर उसने स्वरोचिष्को आयुर्वेद-विद्या प्रदान की और उसकी सेवामें अपनी कन्या सौंप दी। तदनन्तर स्वरोचिष्ने पिताद्वारा दी हुई मनोरमाके साथ विधिपूर्वक विवाह किया। इसके बाद इन्दीवराक्ष पुत्रोंको सान्त्वना दे दिव्य गतिसे अपने लोकको चला गया। फिर स्वरोचिष् अपनी सुन्दरी पत्नीके साथ उस उद्यानमें गया, जहाँ उसकी दोनों सखियाँ मुनिके शापवश रोगसे व्याकुल थीं। अब वह आयुर्वेदके तत्त्वोंका ज्ञाता हो चुका था; अतः रोगनाशक औषधों और रसोंका प्रयोग करके उसने उन दोनोंको रोगमुक्त कर दिया। व्याधिसे छुटकारा पानेपर वे दोनों सुन्दरी कन्याएँ अपने शरीरकी दिव्य कान्तिसे हिमालय पर्वतके उस रम्य प्रदेशको प्रकाशित करने लगीं।
इस प्रकार रोग-मुक्त हुई कन्याओंमेंसे एकने स्वरोचिष्से प्रसन्नतापूर्वक कहा—'प्रभो! मेरी बात सुनिये। मैं मन्दार विद्याधरकी पुत्री हूँ। मेरा नाम विभावरी है। उपकारी पुरुष! मैं अपनेको आपकी सेवामें दे रही हूँ, स्वीकार कीजिये। साथ ही आपको एक ऐसी विद्या दूँगी, जिससे सब जीवोंकी बोली आपकी समझमें आने लगेगी; अतः आप मुझपर कृपा करें।' धर्मज्ञ स्वरोचिष्ने 'एवमस्तु' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तब दूसरी कन्या इस प्रकार बोली—'आर्य! वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् ब्रह्मर्षि पार मेरे पिता हैं। कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचर्यका पालन करनेके कारण उन्होंने विवाह नहीं किया था। एक बार पुञ्जिकस्थला नामक अप्सरासे उनका सम्पर्क हो गया। इससे मेरा जन्म हुआ। मेरी माता इस निर्जन वनमें मुझे धरतीपर सुला अकेली