भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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१५० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


प्रकाशित कर रहा हो। वह बालक भगवान् भास्करकी भाँति स्वरोचिष् (अपनी किरणों)-से सुशोभित हो रहा था; इसलिये वह स्वरोचिष् नामसे ही विख्यात हुआ। वह महान् भाग्यशाली शिशु अपनी अवस्था और सद्गुणोंके साथ-ही-साथ प्रतिदिन उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे चन्द्रमा अपनी कलाओंके साथ शुक्ल पक्षमें दिनोंदिन बढ़ता रहता है। महाभाग स्वरोचिष्ने क्रमशः वेद, धनुर्वेद तथा अन्यान्य विद्याओंको ग्रहण किया। धीरे-धीरे उसकी तरुण अवस्था आ गयी। एक दिन वह मन्दराचल पर्वतपर विचर रहा था। इतनेमें ही उसकी दृष्टि एक सुन्दरी कन्यापर पड़ी, जो भयसे व्याकुल हो रही थी। कन्याने भी उसे देखा और घबराकर कहा—'मेरी रक्षा करो, रक्षा करो।' उसके नेत्र भयसे कातर हो रहे थे। स्वरोचिष्ने आश्वासन देते हुए कहा—'डरो मत; बताओ, क्या बात है?' स्वरोचित वाणीमें उसके इस प्रकार पूछनेपर उस कन्याने बारंबार लंबी साँसें खींचते हुए अपना सारा हाल कह सुनाया।

कन्या बोली—वीरवर! मैं इन्दीवराक्ष नामक विद्याधरकी पुत्री हूँ। मेरा नाम मनोरमा है। मरुधन्वाकी पुत्री मेरी माता हैं। मन्दार विद्याधरकी कन्या विभावरी मेरी एक सखी है और पार मुनिकी पुत्री कलावती मेरी दूसरी सखी है। एक दिन मैं उन दोनोंके साथ परम उत्तम कैलास पर्वतके तटपर गयी। वहाँ मुझे एक मुनि दिखायी दिये, जिनका शरीर तपस्याके कारण अत्यन्त दुर्बल हो रहा था। भूखसे उनका कण्ठ सूख गया था। शरीरमें कान्तिका अभाव था और आँखोंकी पुतली भीतर धँसी हुई थी। यह देखकर मैंने उनका उपहास किया। इससे कुपित होकर उन्होंने मुझे शाप देते हुए कहा—'ओ नीच! अरी दुष्ट तपस्विनी! तूने मेरी हँसी उड़ायी है, इसलिये शीघ्र ही एक राक्षस तुझपर आक्रमण करेगा।' इस प्रकार शाप देनेपर मेरी सखियोंने मुनिको बहुत फटकारा और कहा—'तुम्हारी ब्राह्मणताको धिक्कार है। तुममें क्षमा न होनेके कारण तुम्हारी की हुई सारी तपस्या व्यर्थ है। जान पड़ता है, तुम क्रोधसे ही अत्यन्त दुर्बल हो रहे हो, तपस्यासे नहीं। ब्राह्मणका स्वभाव तो क्षमाशील होता है। क्रोधको काबूमें रखना ही तपस्या है।'

सखियोंकी ये बातें सुनकर उन अमिततेजस्वी साधुने उन दोनोंको भी शाप दे दिया—'एकके सब अङ्गोंमें कोढ़ हो जायगी और दूसरी क्षयरोगसे ग्रस्त होगी।' मुनिकी बात सच हुई, मेरी सखियोंको तत्काल वैसा ही रोग हो गया। इसी प्रकार मेरे पीछे-पीछे एक महान् राक्षस दौड़ा चला आ रहा है। वह पास ही तो गरज रहा है, क्या आपको उसकी भयंकर आवाज नहीं सुनायी देती। आज तीसरा दिन बीत रहा है, किन्तु वह मेरा पीछा नहीं छोड़ता। महामते! मैं सम्पूर्ण अस्त्र शस्त्रोंका हृदय (रहस्य) जानती हूँ और वह सब आपको