भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 15
  • राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * १५

क्रोध नहीं करना चाहिये। धर्मज्ञ राजाको तो यह उचित ही है कि वह धर्मशास्त्रके अनुसार दान दे, रक्षा करे और धनुष उठाकर युद्ध करे।'

विश्वामित्र बोले- 'राजन्! यदि तुम्हें अधर्मका डर है, तो शीघ्र बताओ—किसको दान देना चाहिये? किनकी रक्षा करनी चाहिये और किनके साथ युद्ध करना चाहिये?

हरिश्चन्द्रने कहा- श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तथा जिनकी जीविका नष्ट हो गयी हो, ऐसा अन्य मनुष्योंको भी दान देना चाहिये। भयभीत प्राणियोंकी रक्षा करनी चाहिये और शत्रुओंके साथ सदा युद्ध करना चाहिये।*

विश्वामित्र बोले-यदि तुम राजा हो और राजधर्मको भलीभाँति जानते हो तो मैं प्रतिग्रहकी इच्छा रखनेवाला ब्राह्मण हूँ, मुझे इच्छानुसार दक्षिणा दो।

पक्षीगण कहते हैं- महर्षिकी यह बात सुनकर राजाने अपना नया जन्म हुआ माना और प्रसन्नचित्तसे कहा।

हरिश्चन्द्र बोले— भगवन्! आपको मैं क्या दूँ, आप निःशङ्क होकर कहिये। यदि कोई दुर्लभ-से-दुर्लभ वस्तु हो तो उसे भी दी हुई ही समझें।

विश्वामित्रने कहा— वीरवर! तुम समुद्र, पर्वत, ग्राम और नगरोंसहित यह सारी पृथ्वी मुझे दे दो। रथ, घोड़े, हाथी, कोठार और खजानेसहित सारा राज्य भी मुझे समर्पित कर दो। इसके अतिरिक्त भी जो कुछ तुम्हारे पास है, वह मुझे दे दो। केवल अपनी स्त्री, पुत्र और शरीरको अपने पास रख लो। साथ ही अपने धर्मको भी तुम्हीं रखो; क्योंकि वह सदा कर्ताके ही साथ रहता है, परलोकमें जानेपर भी वह साथ जाता है।

मुनिका यह वचन सुनकर राजाने प्रसन्नचित्तसे 'तथास्तु' कहा। हाथ जोड़कर उनकी आज्ञा स्वीकार की। उस समय उनके मुखपर शोक या चिन्ताका कोई चिह्न नहीं था।

विश्वामित्र बोले- राजर्षे! यदि तुमने अपना राज्य, पृथ्वी, सेना और धन आदि सर्वस्व मुझे समर्पित कर दिया तो मुझ तपस्वीके इस राज्यमें रहते किसका प्रभुत्व रहा?

हरिश्चन्द्रने कहा— 'ब्रह्मन्! मैंने जिस समय यह पृथ्वी दी है, उसी समय आप मेरे भी स्वामी हो गये। फिर आपके इस पृथ्वीके राजा होनेकी तो बात ही क्या है।

विश्वामित्र बोले— राजन्! यदि तुमने यह सारी पृथ्वी मुझे दान कर दी तो जहाँ-जहाँ मेरा प्रभुत्व हो, वहाँसे तुम्हें निकल जाना चाहिये। करधनी आदि समस्त आभूषणोंका संग्रह यहीं छोड़कर तुम वल्कलका वस्त्र लपेट लो और अपनी पत्नी तथा पुत्रके साथ चले जाओ।

'बहुत अच्छा' कहकर राजा हरिश्चन्द्र अपनी पत्नी शैव्या तथा पुत्र रोहिताश्वको साथ ले वहाँसे जाने लगे। उस समय विश्वामित्रने उनका मार्ग रोककर कहा—'मुझे राजसूय-यज्ञकी दक्षिणा दिये बिना ही तुम कहाँ जा रहे हो?'

हरिश्चन्द्र बोले— भगवन्! यह अकण्टक राज्य


* दातव्यं विप्रमुख्येभ्यो ये चान्ये कृशवृत्तयः। रक्ष्या भीताः सदा युद्धं कर्तव्यं परिपन्थिभिः ॥ (७। २७)