संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 16, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ें९६ • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण •
तो मैंने आपको दे ही दिया, अब तो मेरे पास ये तीन शरीर ही शेष बचे हैं।
विश्वामित्रने कहा—तो भी तुम्हें मुझे यज्ञकी दक्षिणा तो देनी ही चाहिये। विशेषतः ब्राह्मणोंको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके यदि न दिया जाय तो वह प्रतिज्ञा-भङ्गका दोष उस व्यक्तिका नाश कर डालता है। राजन्! राजसूय-यज्ञमें ब्राह्मणोंको जितनेसे सन्तोष हो, उस यज्ञकी उतनी ही दक्षिणा देनी चाहिये। तुमने ही पहले प्रतिज्ञा की है कि देनेकी घोषणा कर देनेपर अवश्य देना चाहिये, आततायियोंसे युद्ध करना चाहिये तथा आर्तजनोंकी रक्षा करनी चाहिये।
हरिश्चन्द्र बोले—भगवन्! इस समय मेरे पास कुछ भी नहीं है। समयानुसार अवश्य आपको दूँगा।
विश्वामित्रने कहा—राजन् ! इसके लिये मुझे कितने समयतक प्रतीक्षा करनी होगी, शीघ्र बताओ।
हरिश्चन्द्र बोले—ब्रह्मर्षे ! मैं एक महीनेमें आपको दक्षिणाके लिये धन दूँगा। इस समय मेरे पास धन नहीं है, अतः मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये।
विश्वामित्रने कहा—नृपश्रेष्ठ ! जाओ, जाओ! अपने धर्मका पालन करो। तुम्हारा मार्ग कल्याणमय हो।
पक्षी कहते हैं—विश्वामित्रने जब 'जाओ' कहकर जानेकी आज्ञा दी, तब राजा हरिश्चन्द्र नगरसे चले। उनके पीछे उनकी प्यारी पत्नी शैब्या भी चली, जो पैदल चलनेके योग्य कदापि नहीं थी। रानी और राजकुमारसहित राजा हरिश्चन्द्रको नगरसे निकलते देख उनके अनुयायी सेवकगण तथा पुरवासी मनुष्य विलाप करने लगे—'हा नाथ! हम पीड़ितोंका आप क्यों परित्याग कर रहे हैं? राजन् ! आप धर्ममें तत्पर रहनेवाले तथा पुरवासियोंपर कृपा रखनेवाले हैं। राजर्षे ! यदि आप धर्म समझें तो हमें भी अपने साथ ले चलें। महाराज ! दो घड़ी तो ठहर जाइये। हमारे नेत्ररूपी भ्रमर आपके मुखारविन्दकी रूपसुधाका पान कर लें। फिर हमें कब आपके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त होगा। हाय! जिन महाराजके आगे-आगे चलनेपर पीछेसे कितने ही राजा चला करते थे, आज उन्हींके पीछे उनकी यह रानी अपने बालक पुत्रको गोद लेकर चल रही है। यात्राके समय जिनके सेवक भी हाथियोंपर बैठकर आगे जाते थे, वे ही महाराज हरिश्चन्द्र आज पैदल चल रहे हैं! हा राजन्! मनोहर भौंहों, चिकनी त्वचा तथा ऊँची नासिकासे सुशोभित आपका सुकुमार मुख मार्गमें धूलिसे धूसरित एवं क्लेशयुक्त होकर न जाने कैसी दशाको प्राप्त होगा। नृपश्रेष्ठ ! ठहर जाइये, ठहर जाइये; यहाँ अपने धर्मका पालन कीजिये। क्रूरताका परित्याग ही सबसे बड़ा धर्म है। विशेषतः क्षत्रियोंके लिये तो यही सबसे उत्तम है। नाथ ! अब हमें स्त्री, पुत्र, धन धान्य आदिसे क्या लेना है। यह सब छोड़कर हमलोग आपके साथ छायाकी भाँति रहेंगे। हा नाथ! हा महाराज !!