भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 17
  • राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * १७

हा स्वामिन् ! ! ! आप हमें क्यों त्याग रहे हैं ? जहाँ आप रहेंगे, वहीं हम भी रहेंगे। जहाँ आप हैं, वहीं सुख है। जहाँ आप हैं, वहीं नगर है और जहाँ हमारे महाराज आप हैं, वहीं हमारे लिये स्वर्ग है !'

पुरवासियोंकी ये बातें सुनकर राजा हरिश्चन्द्र शोकमग्न हो उनपर दया करनेके लिये ही मार्गमें उस समय ठहर गये। विश्वामित्रने देखा, राजाका चित्त पुरवासियोंके वचनोंसे व्याकुल हो उठा है; तब वे उनके पास आ पहुँचे और रोष तथा अमर्षसे आँखें फाड़कर बोले—'अरे ! तू तो बड़ा दुराचारी, झूठा और कपटपूर्ण बातें करनेवाला है। धिक्कार है तुझे, जो मुझे राज्य देकर फिर उसे वापस ले लेना चाहता है।' विश्वामित्रका यह कठोर वचन सुनकर राजा काँप उठे और 'जाता हूँ, जाता हूँ' कहकर अपनी पत्नीका हाथ पकड़कर खींचते हुए शीघ्रतापूर्वक चले। राजा अपनी पत्नीको खींच रहे थे। वह सुकुमारी अबला चलनेके परिश्रमसे थककर व्याकुल हो रही थी तो भी विश्वामित्रने सहसा उसकी पीठपर डंडेसे प्रहार किया। महारानीको इस प्रकार मार खाते देख महाराज हरिश्चन्द्र दुःखसे आतुर होकर केवल इतना ही कह सके, 'भगवन् ! जाता हूँ।' उनके मुखसे और कोई बात नहीं निकल सकी। उस समय परम दयालु पाँच विश्वेदेव आपसमें इस प्रकार कहने लगे—'ओह ! यह विश्वामित्र तो बड़ा पापी है। न जाने किन लोकोंमें जायगा। इसने यज्ञकर्ताओंमें श्रेष्ठ इन महाराजको अपने राज्यसे नीचे उतार दिया है।'

विश्वेदेवोंकी यह बात सुनकर विश्वामित्रको बड़ा रोष हुआ। उन्होंने उन सबको शाप देते हुए कहा—'तुम सब लोग मनुष्य हो जाओ।' फिर उनके अनुनय-विनयसे प्रसन्न होकर उन महामुनिने कहा—'मनुष्य होनेपर भी तुम्हारे कोई सन्तान नहीं होगी, तुम विवाह भी नहीं करोगे। तुम्हारे मनमें किसीके प्रति ईर्ष्या और द्वेष भी नहीं होगा। तुम पुनः काम-क्रोधसे मुक्त होकर देवत्वको प्राप्त कर लोगे।' तदनन्तर वे विश्वेदेव अपने अंशसे कुरुवंशियोंके घरमें अवतीर्ण हुए। वे ही द्रौपदीके गर्भसे उत्पन्न पाँचों पाण्डवकुमार थे। महामुनि विश्वामित्रके शापसे ही उनका विवाह नहीं हुआ। जैमिनि ! इस प्रकार हमने पाण्डवकुमारोंकी कथासे सम्बन्ध रखनेवाली बातें तुम्हें बतला दीं। अब और क्या सुनना चाहते हो ?

**जैमिनि बोले—**आपलोगोंने क्रमशः मेरे प्रश्नोंके उत्तरमें ये सारी बातें बतायीं। अब मुझे हरिश्चन्द्रकी शेष कथा सुननेके लिये बड़ा कौतूहल हो रहा है। अहो, उन महात्माने बहुत बड़ा कष्ट उठाया। श्रेष्ठ पक्षियो! क्या उन्हें इस दुःखके अनुरूप ही कोई सुख भी कभी प्राप्त हुआ?

**पक्षियोंने कहा—**विश्वामित्रकी बात सुनकर राजा दुःखी हो धीरे-धीरे आगे बढ़े। उनके पीछे नन्हें-से पुत्रको गोद लिये रानी शैव्या चल रही थीं। दिव्य वाराणसीपुरीके पास पहुँचकर राजाने विचार किया कि यह काशी मनुष्योंको भोग्य भूमि