संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * २३
स्मरण किया करते थे। अपना सर्वस्व छिन जानेके कारण राजा बहुत व्याकुल रहते थे। कुछ कालके बाद राजा हरिश्चन्द्र चाण्डालके वशमें होनेके कारण श्मशानघाटपर मुर्दोंके कपड़े (कफ़न) संग्रह करनेके काममें नियुक्त हुए। चाण्डालने उन्हें आज्ञा दी थी कि 'तुम मुर्दोंके आनेकी प्रतीक्षामें रात-दिन यहीं रहो।' वह आदेश पाकर राजा काशीपुरीके दक्षिण श्मशान-भूमिमें बने हुए शवमन्दिरमें गये। उस श्मशानमें बड़ा भयङ्कर शब्द होता था। वहाँ सैकड़ों सियारिनें भरी रहती थीं। चारों ओर मुर्दोंकी खोपड़ियाँ बिखरी पड़ी थीं। सारा श्मशान दुर्गन्धसे व्याप्त और अत्यन्त धूमसे आच्छादित था। उसमें पिशाच, भूत, वेताल, डाकिनी और यक्ष रहा करते थे। गिद्धों और गोहड़ोंसे भी वह स्थान भरा रहता था। झुंड-के-झुंड कुत्ते उसे घेरे रहते थे। यत्र-तत्र हड्डियोंके ढेर लगे हुए थे। सब ओरसे बड़ी दुर्गन्ध आती थी। अनेकों मृत व्यक्तियोंके बन्धु-बान्धवोंके करुण-क्रन्दनसे वह श्मशान-भूमि बड़ी ही भयानक और कोलाहलपूर्ण रहती थी। 'हा पुत्र! हा मित्र!
राजाको बाँध लिया और उन्हें डंडोंकी मारसे अचेत-सा करता हुआ वह अपने घरकी ओर ले चला। उस समय राजाकी इन्द्रियाँ अत्यन्त व्याकुल हो गयी थीं। तदनन्तर राजा हरिश्चन्द्र चाण्डालके घरमें रहने लगे। वे प्रतिदिन सबेरे, दोपहर और शामको निम्नाङ्कित बातें गुनगुनाया करते थे। 'हाय! मेरी दीनमुखी पत्नी अपने आगे दीनमुख बालक रोहिताश्वको देखकर अत्यन्त दुःखमें मग्न हो जाती होगी और उस समय इस आशासे कि राजा धन कमाकर हम दोनोंको छुड़ायेंगे, बारंबार मेरा स्मरण करती होगी। उसे इस बातका पता न होगा कि मैं ब्राह्मणको और भी अधिक धन देकर अत्यन्त पापमय संसर्गमें जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। राज्यका नाश, सुहृदोंका त्याग, पत्नी और पुत्रका विक्रय तथा अन्तमें चाण्डालत्वकी प्राप्ति— अहो! यह एकके बाद एक दुःखोंकी कैसी परम्परा चली आती है।'
इस प्रकार वे चाण्डालके घरमें रहते हुए प्रतिदिन अपने प्रिय पुत्र तथा अनुकूल पत्नीका