भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

हा बन्धु ! हा भ्राता ! हा वत्स ! हा प्रियतम ! हा पतिदेव ! हाय बहिन ! हा माता ! हा मामा ! हा पितामह ! हा मातामह ! हा पिताजी ! हा पौत्र ! हा बान्धव ! तुम कहाँ चले गये ? लौट आओ !' इस प्रकार विलाप करनेवालोंकी करुणापूर्ण ध्वनि वहाँ जोर-जोरसे सुनायी पड़ती थी। ऐसी भूमिमें निवास करनेके कारण राजा न रातमें सो पाते थे, न दिनमें। बारंबार हाहाकार करते रहते थे। इस प्रकार उनके बारह महीने सौ वर्षोंके समान बीते। अन्तमें राजाने दुःखी होकर देवताओंकी शरण ली और कहा—'महान् धर्मको नमस्कार है। जो सच्चिदानन्दस्वरूप, सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करनेवाले विधाता, परात्पर ब्रह्म, शुद्ध, पुराणपुरुष एवं अविनाशी हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। देवगुरु बृहस्पति ! तुम्हें नमस्कार है। इन्द्रको भी नमस्कार है।' यों कहकर राजा पुनः चाण्डालके कार्यमें लग गये।

तदनन्तर महाराज हरिश्चन्द्रकी पत्नी शैब्या साँपके काटनेसे मरे हुए अपने बालकको गोदमें उठाये विलाप करती हुई श्मशान-भूमिमें आयी। वह बार-बार यही कहती थी, 'हा वत्स ! हा पुत्र ! हा शिशो !' उसका शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया था। कान्ति मलिन पड़ गयी थी। मन बेचैन था। सिरके बालोंमें धूल जम गयी थी। शैब्याके विलापका शब्द सुनकर राजा हरिश्चन्द्र तुरंत उसके पास गये। उन्हें आशा थी, यहाँ भी मुर्देके शरीरका कफन मिलेगा। वे जोर-जोरसे रोती हुई अपनी पत्नीको पहचान न सके। अधिक कालतक प्रवासमें रहनेके कारण वह बहुत सन्तप्त थी। ऐसी जान पड़ती थी, मानो उसका दूसरा जन्म हुआ हो। शैब्याने भी पहले उनके मस्तकको मनोहर केशोंसे सुशोभित देखा था। अब उनके सिरपर जटा थी। वे सूखे हुए वृक्षके समान जान पड़ते थे। इस अवस्थामें वह भी अपने पतिको न पहचान सकी। राजाने काले कपड़ेमें लिपटे हुए बालकको, जिसे साँपने काट खाया था तथा जिसके अङ्गोंमें राजोचित चिह्न दिखायी देते थे, जब देखा तो उन्हें बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—'अहो ! बड़े कष्टकी बात है, यह बालक किसी राजाके कुलमें उत्पन्न हुआ था; किन्तु दुरात्मा कालने इसे किसी और ही दशाको पहुँचा दिया। अपनी माताकी गोदमें पड़े हुए इस बालकको देखकर मुझे कमलके समान नेत्रोंवाला अपना पुत्र रोहिताश्व याद आ रहा है। यदि उसे भयंकर कालने अपना ग्रास न बनाया होगा तो वह मेरा लाड़ला भी इसी उम्रका हुआ होगा।'

इतनेमें ही रानीने विलाप करते हुए कहा—हा वत्स ! किस पापके कारण यह अत्यन्त भयंकर दुःख आ पड़ा है, जिसका कभी अन्त ही नहीं आता। हा प्राणनाथ ! आप कहाँ हैं ? ओ विधाता ! तूने राज्यका नाश किया, सुहृदोंसे विक्षोह कराया और स्त्री तथा पुत्रको भी बिकवा दिया। अरे ! तूने राजर्षि हरिश्चन्द्रकी कौन-सी दुर्दशा नहीं की।

रानीका यह वचन सुनकर अपने पथसे भ्रष्ट हुए राजा हरिश्चन्द्रने अपनी प्राणप्यारी पत्नी तथा मृत्युके मुखमें पड़े हुए पुत्रको पहचान लिया। 'ओह ! कितने कष्टकी बात है, यह शैब्या इस अवस्थामें और यह वही मेरा पुत्र है ?' यों कहते हुए वे दुःखसे सन्तप्त होकर रोते-रोते मूर्च्छित हो गये। इस अवस्थामें पहुँचे हुए राजाको पहचानकर रानीको भी बड़ा दुःख हुआ। वह भी मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। उसका शरीर निश्चेष्ट हो गया। फिर थोड़ी देर बाद होशमें आनेपर महाराज और महारानी दोनों साथ-ही-साथ शोकके भारसे पीड़ित एवं सन्तप्त हो विलाप करने लगे।

राजाने कहा—हा वत्स ! सुन्दर नेत्र, भौंह, नासिका और बालोंसे युक्त तुम्हारा यह सुकुमार एवं दीन मुख देखकर मेरा हृदय क्यों नहीं विदीर्ण हो जाता। हा बेटा ! तुम मेरे अङ्ग-प्रत्यङ्गसे उत्पन्न