संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * २५
तथा मन और हृदयको आनन्द देनेवाले थे, किन्तु मुझ-जैसे दुष्ट पिताने तुम्हें एक साधारण वस्तुकी भाँति बेच डाला। हाय ! दुर्दैवरूपी क्रूर सर्पने सब प्रकारके साधन और वैभवसे पूर्ण मेरे महान् राज्यका अपहरण करके अब मेरे पुत्रको भी काट खाया। दैवरूपी सर्पसे डसे हुए अपने पुत्रके मुख कमलको देखते हुए भी मैं इस समय उसीके भयंकर विषके प्रभावसे अंधा हो रहा हूँ।
आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठसे यों कहकर राजाने बालकको उठाकर छातीसे लगा लिया और मूर्च्छासे निश्चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़े।
उस समय रानी इस प्रकार बोली—ये तो वही नरश्रेष्ठ जान पड़ते हैं। केवल स्वरसे इनकी पहचान हो रही है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि ये विद्वज्जनोंके हृदयरूपी चकोरको आह्लादित करनेवाले चन्द्ररूप महाराज हरिश्चन्द्र ही हैं; किन्तु वे महाराज इस समय श्मशानमें कैसे आ पहुँचे ?
अब शैव्या पुत्र-शोकको भूलकर गिरे हुए पतिको देखने लगी। पति और पुत्र दोनोंकी चिन्तासे पीड़ित, विस्मित एवं दीन हुई रानी जब पतिकी दशाका निरीक्षण कर रही थी, उस समय उसकी दृष्टि अपने स्वामीके उस दण्डपर पड़ी, जो बहुत ही घृणित एवं चाण्डालके धारण करने योग्य था। वह देखते ही वह बेहोश होकर गिर पड़ी। फिर धीरे-धीरे जब चेत हुआ तो गद्गद-वाणीमें कहने लगी—'ओ दैव! तूने देवताके समान कान्तिमान् इन महाराजको चाण्डालकी दशाको पहुँचा दिया। तूने इनके राज्यका नाश, सुहृदोंका त्याग और स्त्री-पुत्रका विक्रय कराकर भी इन्हें नहीं छोड़ा। आखिर इन्हें राजासे चाण्डाल बना दिया ! हा राजन् ! आज मैं आपके पास छत्र, झारी, चँवर और व्यजन—कुछ भी नहीं देखती। यह विधाताका कैसा विपरीत भाव है ! पूर्वकालमें जिनके आगे आगे चलनेपर कितने ही राजा सेवक बनकर अपनी चादरोंसे धरती बुहारा करते थे, वे ही महाराज अब दुःखसे पीड़ित हो इस अपवित्र श्मशानभूमिमें विचरते हैं, जहाँ खोपड़ियोंसे सटे कितने ही मिट्टीके घड़े चारों ओर बिखरे पड़े हैं। जहाँ मृतकोंकी लाशसे चर्बी गल-गलकर पृथ्वीके सूखे दोनोंमें पड़ रही है। चिताकी राख, अँगारे, अधजली हड्डियों और मज्जाके ढेरसे यहाँकी भयंकरता बहुत बढ़ गयी है। यहाँसे गृध्रों और गीदड़ोंके भयंकर नाद सुनकर छोटे-छोटे पक्षी भाग गये हैं। चिताके धुएँसे यहाँकी सारी दिशाएँ काली दिखायी देती हैं।'
यों कहकर महारानी शैव्या महाराज हरिश्चन्द्रके कण्ठमें लग गयी तथा कष्ट एवं सैकड़ों प्रकारके शोकसे आक्रान्त हो आर्तवाणीमें विलाप करने लगी—'राजन् ! यह स्वप्न है या सत्य ? महाभाग ! आप इसे जैसा समझते हों, बतलायें। मेरा मन अचेत होता जा रहा है?'
रानीकी यह बात सुनकर महाराज हरिश्चन्द्रने गरम साँस ली और गद्गदवाणीमें अपनेको चाण्डालत्व प्राप्त होनेकी सारी कथा कह सुनायी। उसे
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