भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२४ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


सुनकर रानीको बड़ा दुःख हुआ और उसने गरम साँस खींचकर बहुत देरतक रोनेके पश्चात् अपने पुत्रकी मृत्युकी यथार्थ घटना निवेदित की। पुत्रके मरनेकी बात सुनकर राजा पुनः पृथ्वीपर गिर पड़े और विलाप करते हुए बोले—'प्रिये ! अब मैं अधिक दिनोंतक जीवित रहकर क्लेश भोगना नहीं चाहता; परन्तु मेरा अभाग्य तो देखो, मेरा आत्मा भी मेरे अधीन नहीं है। तुम मेरे अपराधोंको क्षमा करना। मैं आज्ञा देता हूँ, तुम ब्राह्मणके घर चली जाओ। शुभे ! 'मैं राजपत्नी हूँ', इस अभिमानमें आकर कभी उस ब्राह्मणका अपमान न करना। सब प्रकारके यत्न करके उसे सन्तुष्ट रखना; क्योंकि स्वामी देवताके समान होता है।'

रानी बोली—राजर्षे! मुझसे भी अब यह दुःखका भार नहीं सहा जाता, अतः आपके साथ ही मैं भी चिताकी जलती हुई आगमें प्रवेश करूँगी।

यह सुनकर राजाने कहा—'पतिव्रते ! जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा ही करो।' तदनन्तर राजाने चिता बनाकर उसके ऊपर अपने पुत्रको रखा और अपनी पत्नीके साथ हाथ जोड़कर सबके ईश्वर परमात्मा नारायण श्रीहरिका स्मरण किया, जो हृदयरूपी गुफामें विराजमान हैं तथा जिनका वासुदेव, सुरेश्वर, आदि-अन्तरहित, ब्रह्म, कृष्ण, पीताम्बर एवं शृंग आदि नामोंसे चिन्तन किया जाता है। उनके इस प्रकार भगवत्स्मरण करनेपर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता धर्मको अगुआ बनाकर तुरंत वहाँ आये और इस प्रकार बोले—'राजन्! हमारी बात सुनो, तुम्हारे स्मरण करनेपर सम्पूर्ण देवता यहाँ उपस्थित हुए हैं। ये साक्षात् पितामह ब्रह्माजी हैं और ये स्वयं भगवान् धर्म हैं। इनके सिवा साध्यगण, विश्वेदेव, मरुद्गण और लोकपाल भी अपने वाहनोंसहित पधारे हैं। नाग, सिद्ध, गन्धर्व, रुद्र, अश्विनीकुमार तथा और भी बहुत-से देवता यहाँ उपस्थित हुए हैं। साथ ही बाबा विश्वामित्रजी भी हैं।'

तत्पश्चात् धर्मने कहा—राजन् ! प्राण त्यागनेका साहस न करो। मैं साक्षात् धर्म तुम्हारे पास आया हूँ। तुमने अपने क्षमा, इन्द्रियसंयम तथा सत्य आदि गुणोंसे मुझे सन्तुष्ट किया है।

इन्द्र बोले—महाभाग हरिश्चन्द्र ! मैं इन्द्र तुम्हारे पास आया हूँ। तुमने स्त्री-पुत्रके साथ सनातन लोकोंपर अधिकार प्राप्त किया है। राजन्! पत्नी और पुत्रको साथ लेकर स्वर्गलोकको चलो, जिसे तुमने अपने शुभकर्मोंसे प्राप्त किया है तथा जो दूसरे मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है।

इसके बाद इन्द्रने चिताके ऊपर आकाशसे अमृतकी वृष्टि की, जो अकालमृत्युका निवारण करनेवाली है। फिर फूलोंकी भी वर्षा होने लगी। देवताओंकी दुन्दुभि जोर-जोरसे बज उठी। इस प्रकार वहाँ एकत्रित हुए देवताओंके समाजमें महात्मा राजाका पुत्र रोहिताश्व चितासे जीवित हो उठा। उसका शरीर सुकुमार और स्वस्थ था। उसकी इन्द्रियों और मनमें प्रसन्नता थी। फिर तो महाराज हरिश्चन्द्रने अपने पुत्रको