भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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  • राजा हरिश्चन्द्रका चरित्र * २७

तुरंत छातीसे लगा लिया। वे स्त्रीसहित पूर्ववत् तेज और कान्तिसे सम्पन्न हो गये। उनकी देहपर दिव्य हार और वस्त्र शोभा पाने लगे। राजा स्वस्थ एवं पूर्णमनोरथ हो परम आनन्दमें निमग्न हो गये। उस समय इन्द्रने पुनः उनसे कहा—'महाभाग! स्त्री और पुत्रसहित तुम्हें उत्तम गति प्राप्त होगी, अतः अपने कर्मोंके फल भोगनेके लिये दिव्य लोकको चलो।'

हरिश्चन्द्रने कहा—देवराज! मैं अपने स्वामी चाण्डालकी आज्ञा लिये बिना तथा उसके ऋणसे उद्धार पाये बिना देवलोकको नहीं चल सकूँगा।*

धर्म बोले—राजन् ! तुम्हारे इस भावी संकटको जानकर मैंने ही मायासे अपनेको चाण्डालके रूपमें प्रकट किया तथा चाण्डालत्वका प्रदर्शन किया था।

इन्द्रने कहा—हरिश्चन्द्र ! पृथ्वीके समस्त मनुष्य जिस परमधामके लिये प्रार्थना करते हैं, केवल पुण्यवान् मनुष्योंको प्राप्त होनेवाले उस धामको चलो।

हरिश्चन्द्र बोले—देवराज! आपको नमस्कार है। मेरा यह वचन सुनिये; आप मुझपर प्रसन्न हैं, अतएव मैं विनीतभावसे आपके सम्मुख कुछ निवेदन करता हूँ। अयोध्याके सब मनुष्य मेरे विरह-शोकमें मग्न हैं। आज उन्हें छोड़कर मैं दिव्यलोकको कैसे जाऊँगा? ब्राह्मणकी हत्या, गुरुकी हत्या, गौका वध और स्त्रीका वध—इन सबके समान ही भक्तोंका त्याग करनेमें भी महान् पाप बताया गया है। जो दोषरहित एवं त्यागनेके अयोग्य भक्त पुरुषको त्याग देता है, उसे इहलोक या परलोकमें कहीं भी सुखकी प्राप्ति नहीं दिखायी देती; इसलिये इन्द्र! आप स्वर्गको लौट जाइये। सुरेश्वर! यदि अयोध्यावासी पुरुष मेरे साथ ही स्वर्ग चल सकें तब तो मैं भी चलूँगा; अन्यथा उन्होंके साथ नरकमें भी जाना मुझे स्वीकार है।

इन्द्रने कहा—राजन्! उन सब लोगोंके पृथक्-पृथक् नाना प्रकारके बहुत-से पुण्य और पाप हैं। फिर तुम स्वर्गको सबका भोग्य बनाकर वहाँ कैसे चल सकोगे ?

हरिश्चन्द्र बोले—इन्द्र! राजा अपने कुटुम्बियोंके ही प्रभावसे राज्य भोगता है। प्रजावर्ग भी राजाका कुटुम्बी ही है। उन्हींके सहयोगसे राजा बड़े बड़े यज्ञ करता, पोखरे खुदवाता और बगीचे आदि लगवाता है। वह सब कुछ मैंने अयोध्यावासियोंके प्रभावसे किया है, अतः स्वर्गके लोभमें पड़कर मैं अपने उपकारियोंका त्याग नहीं कर सकता। देवेश! यदि मैंने कुछ भी पुण्य किया हो, दान, यज्ञ अथवा जपका अनुष्ठान मुझसे हुआ हो, उन सबका फल उन सबके साथ ही मुझे मिले। उसमें


* देवराजाननुज्ञातः स्वामिना ऋणेन वै। अगत्वा निष्कृतिं तस्य नारोक्ष्येऽहं सुरालयम् ॥ (देवी० ८। २४५)