भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 28

२८ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

उनका समान अधिकार हो।*

'ऐसा ही होगा' यों कहकर त्रिभुवनपति इन्द्र, धर्म और गाधिनन्दन विश्वामित्र मन ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। लोगोंपर अनुग्रह रखनेवाले देवेन्द्रने स्वर्गलोकसे भूतलतक करोड़ों विमानोंका ताँता बाँध दिया। फिर चारों वर्णों और आश्रमोंसे युक्त अयोध्या नगरमें प्रवेश करके राजा हरिश्चन्द्रके समीप ही देवराज इन्द्रने कहा—'प्रजाजनो! तुम सब लोग शीघ्र आओ। धर्मके प्रसादसे तुम सब लोगोंको अत्यन्त दुर्लभ स्वर्गलोक प्राप्त हुआ है।'

इन्द्रकी यह बात सुनकर महाराज हरिश्चन्द्रकी प्रसन्नताके लिये महातपस्वी विश्वामित्रने राजकुमार रोहिताश्वको परम रमणीय अयोध्यापुरीमें ला वहाँ राज्य-सिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया। देवताओं, मुनियों और सिद्धोंके साथ रोहिताश्वका राज्याभिषेक करके राजासहित सभी बन्धु-बान्धव बहुत प्रसन्न हुए। उसके बाद वहाँके सब लोग अपने पुत्र, भृत्य और स्त्रियोंसहित स्वर्गलोकको चले। वे पग-पगपर एक विमानसे दूसरे विमानपर जा पहुँचते थे। विमानोंके सहित यह अनुपम ऐश्वर्य पाकर महाराज हरिश्चन्द्र बहुत प्रसन्न हुए। स्वर्गमें नगरके आकारवाले सुन्दर विमानोंमें, जो परकोटोंसे सुशोभित था, महाराज हरिश्चन्द्र विराजमान हुए। उनकी यह समृद्धि देखकर सब शास्त्रोंका तत्त्व जाननेवाले दैत्याचार्य महाभाग शुक्रने इस प्रकार उनका यशोगान किया—'अहो! क्षमाका कैसा माहात्म्य है। दानका कितना महान् फल है, जिससे हरिश्चन्द्र अमरावतीपुरीमें आये और इन्द्रपदको प्राप्त हुए।'

पक्षीगण कहते हैं—जैमिनिजी! राजा हरिश्चन्द्रका यह सारा चरित्र मैंने आपसे वर्णन किया। दुःखमें पड़ा हुआ जो मनुष्य इसका श्रवण करता है, वह महान् सुख पाता है। इसके श्रवणसे पुत्रार्थीको पुत्र, सुखार्थीको सुख, स्त्रीकी इच्छा रखनेवालेको स्त्री और राज्यकी कामनावालेको राज्यकी प्राप्ति होती है। उसको संग्राममें विजय होती है और वह कभी नरकमें नहीं पड़ता।


* हरिश्चन्द्र उवाच
देवराज नमस्तुभ्यं वाक्यं चैतन्निबोध मे। प्रसादसुमुखं यत् त्वां ब्रवीमि प्रणयान्वितः॥
मच्छोकशमनसः कोसलानगरे जनाः। तिष्ठन्ति तानपोत्सृज्य कथं यास्याम्यहं दिवम्॥
ब्रह्महत्या गुरोर्घातो गोवधः स्त्रीवधस्तथा। तुल्यमेभिर्महापापं भक्तत्यागोऽप्युदाहृतम्॥
भजतो भक्तमल्पाभ्यामहृष्टं त्यजतः सुखम्। नेह नामुत्र पश्यामि तस्माच्छक्र दिवं व्रज॥
यदि ते सहिताः स्वर्गं मया यान्ति सुरेश्वर। ततोऽहमपि यास्यामि नरकं वापि तैः सह॥
इन्द्र उवाच
बहूनि पुण्यपापानि तेषां भिन्नानि वै पृथक्। कथं सहैकभोग्यं त्वं भूयः स्वर्गमवाप्स्यसि॥
हरिश्चन्द्र उवाच
शक्र भुङ्क्ते नृपो राज्यं प्रभावेण कुटुम्बिनाम्। कश्चित् करोति यन्महायज्ञैः कर्म शौचं करोति च॥
तन्न तेषां प्रभावेण मया सर्वमनुष्ठितम्। उपकर्तॄन् न सन्त्यक्ष्ये तानहं स्वर्गलिप्सया॥
तस्माद् यन्मम देवेश किञ्चिदस्ति सुचेष्टितम्। दत्तमिष्टमथो जप्तं सामान्यं तैस्तदस्तु नः॥
(अ० ८। २४८—२५६)