भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 235

• देवी-चरित्रोंके पाठका माहात्म्य * २३५ धारण करके मुनियोंकी रक्षाके लिये हिमालयपर पैरोंवाले असंख्य भ्रमरोंका रूप धारण करके रहनेवाले राक्षसोंका भक्षण करूँगी, उस समय उस महादैत्यका वध करूँगी ॥ ५३॥ उस सब मुनि भक्तिसे नतमस्तक होकर मेरी समय सब लोग 'भ्रामरी' के नामसे चारों ओर स्तुति करेंगे ॥५०-५१ ॥ तब मेरा नाम 'भीमादेवी' मेरी स्तुति करेंगे। इस प्रकार जब-जब के रूपमें विख्यात होगा। जब अरुण नामक संसारमें दानवी बाधा उपस्थित होगी, तब- दैत्य तीनों लोकोंमें भारी उपद्रव मचायेगा ॥ ५२ ॥ तब अवतार लेकर मैं शत्रुओंका संहार तब मैं तीनों लोकोंका हित करनेके लिये छः करूँगी ॥ ५४-५५ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देव्याः स्तुतिर्नामकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ उवाच ४, अर्धश्लोकः १, श्लोकाः ५०, एवम् ५५, एवमादितः ॥ ६३० ॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'देवीस्तुति' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥११॥ द्वादशोऽध्यायः देवी-चरित्रोंके पाठका माहात्म्य ध्यान मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम्। ( ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद् वधं शुम्भनिशुम्भयोः ॥ ३ ॥ कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्। अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चैकचेतसः । हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं श्रोष्यन्ति चैव ये भक्त्या मम माहात्म्यमुत्तमम् ॥ ४ ॥ बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गा त्रिनेत्रां भजे ॥ न तेषां दुष्कृतं किञ्चिद् दुष्कृतोत्था न चापदः । मैं तीन नेत्रोंवाली दुर्गादेवीका ध्यान करता हूँ, भविष्यति न दारिद्र्यं न चैवेष्टवियोजनम् ॥ ५ ॥ उनके श्रीअङ्गोंकी प्रभा बिजलीके समान है। वे शत्रुतो न भयं तस्य दस्युतो वा न राजतः । सिंहके कंधेपर बैठी हुई भयङ्कर प्रतीत होती हैं। न शस्त्रानलतोयौघात्कदाचित्सम्भविष्यति ॥ ६ ॥ हाथोंमें तलवार, ढाल लिये अनेक कन्याएँ उनकी तस्मान्ममैतन्माहात्म्यं पठितव्यं समाहितैः । सेवामें खड़ी हैं। वे अपने हाथोंमें चक्र, गदा, श्रोतव्यं च सदा भक्त्या परं स्वस्त्ययनं हि तत् ॥ ७ ॥ तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जनी मुद्रा उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान् । धारण किये हुए हैं। उनका स्वरूप अग्निमय है तथा तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम ॥ ८ ॥ वे माथेपर चन्द्रमाका मुकुट धारण करती हैं।) यत्रैतत्पठ्यते सम्यङ्नित्यमायतने मम। देव्युवाच ॥ १ ॥ सदा न तद्विमोक्ष्यामि सांनिध्यं तत्र मे स्थितम् ॥ ९ ॥ 'ॐ' एभिः स्तवैश्च मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः । बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे । तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम् ॥ २॥ सर्वं ममैतच्चरितमुच्चार्यं श्राव्यमेव च ॥ १० ॥ १. पा०-शम०।