भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 245
  • रौच्य मनुकी उत्पत्ति-कथा * | २४५ ---|---:

ब्राह्मणलोग अभिलषित वस्तुकी प्राप्तिके लिये जिनकी अर्चना करते हैं तथा जो आराधना करनेपर प्राजापत्य लोक प्रदान करते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। तपस्या करनेसे जिनके पाप धूल गये हैं तथा जो संयमपूर्वक आहार करनेवाले हैं, ऐसे वनवासी महात्मा जिनके फल-मूलोंद्वारा श्राद्ध करके जिन्हें तृप्त करते हैं, उन पितरोंको मैं मस्तक झुकाता हूँ। नैष्ठिक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले संयतात्मा ब्राह्मण समाधिके द्वारा जिन्हें सदा तृप्त करते हैं, क्षत्रिय सब प्रकारके श्राद्धोपयोगी पदार्थोंके द्वारा विधिवत् श्राद्ध करके जिनको सन्तुष्ट करते हैं, जो तीनों लोकोंको अभीष्ट फल देनेवाले हैं, स्वकर्मपरायण वैश्य पुष्प, धूप, अन्न और जल आदिके द्वारा जिनकी पूजा करते हैं तथा शूद्र भी श्राद्धोंद्वारा भक्तिपूर्वक जिनकी तृप्ति करते हैं और जो संसारमें सुकालीके नामसे विख्यात हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। पातालमें बड़े-बड़े दैत्य भी दम्भ और मद त्यागकर श्राद्धोंद्वारा जिन स्वधाभोजी पितरोंको सदा तृप्त करते हैं, मनोवाञ्छित भोगोंको पानेकी इच्छा रखनेवाले नागगण रसातलमें सम्पूर्ण भोगों एवं श्राद्धोंसे जिनकी पूजा करते हैं तथा मन्त्र, भोग और सम्पत्तियोंसे युक्त सर्पगण भी रसातलमें ही विधिपूर्वक श्राद्ध करके जिन्हें सर्वदा तृप्त करते हैं, उन पितरोंको मैं नमस्कार करता हूँ। जो साक्षात् देवलोकमें, अन्तरिक्षमें और भूतलपर निवास करते हैं, देवता आदि समस्त देहधारी जिनकी पूजा करते हैं, उन पितरोंको मैं नमस्कार करता हूँ। वे पितर मेरे द्वारा अर्पित किये हुए इस जलको ग्रहण करें। जो परमात्मस्वरूप पितर मूर्तिमान् होकर विमानोंमें निवास करते हैं, जो समस्त क्लेशोंसे छुटकारा दिलानेमें हेतु हैं तथा योगीश्वरगण निर्मल हृदयसे जिनका यजन करते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। जो स्वधाभोजी पितर दिव्यलोकमें मूर्तिमान् होकर रहते हैं, काम्यफलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ हैं और निष्काम पुरुषोंको मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। वे समस्त पितर इस जलसे तृप्त हों, जो चाहनेवाले पुरुषोंको इच्छानुसार भोग प्रदान करते हैं, देवत्व, इन्द्रत्व तथा उससे ऊँचे पदकी प्राप्ति कराते हैं; इतना ही नहीं, जो पुत्र, पशु, धन, बल और गृह भी देते हैं। जो पितर चन्द्रमाकी किरणोंमें, सूर्यके मण्डलमें तथा श्वेत विमानोंमें सदा निवास करते हैं, वे मेरे दिये हुए अन्न, जल और गन्ध आदिसे तृप्त एवं पुष्ट हों। अग्निमें हविष्यका हवन करनेसे जिनको तृप्ति होती है, जो ब्राह्मणोंके शरीरमें स्थित होकर भोजन करते हैं तथा पिण्डदान करनेसे जिन्हें प्रसन्नता प्राप्त होती है, वे पितर यहाँ मेरे दिये हुए अन्न और जलसे तृप्त हों। जो देवताओंसे भी पूजित हैं तथा सब प्रकारसे श्राद्धोपयोगी पदार्थ जिन्हें अत्यन्त प्रिय हैं, वे पितर यहाँ पधारें। मेरे निवेदन किये हुए पुष्प, गन्ध, अन्न एवं भोज्य पदार्थोंके निकट उनकी उपस्थिति हो। जो प्रतिदिन पूजा ग्रहण करते हैं, प्रत्येक मासके अन्तमें जिनकी पूजा करनी उचित है, जो अष्टकाओंमें, वर्षके अन्तमें तथा अभ्युदयकालमें भी पूजनीय हैं, वे मेरे पितर वहाँ तृप्ति लाभ करें। जो ब्राह्मणोंके यहाँ कुमुद और चन्द्रमाके समान शान्ति धारण करके आते हैं, क्षत्रियोंके लिये जिनका वर्ण नवोदित सूर्यके समान है, जो वैश्योंके यहाँ सुवर्णके समान उज्ज्वल कान्ति धारण करते हैं तथा शूद्रोंके लिये जो श्याम वर्णके हो जाते हैं, वे समस्त पितर मेरे दिये हुए पुष्प, गन्ध, धूप, अन्न और जल आदिसे तथा अग्निहोत्रसे