संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
सदा तृप्ति लाभ करें। मैं उन सबको प्रणाम करता हूँ। जो वैश्वदेवपूर्वक समर्पित किये हुए श्राद्धको पूर्ण तृप्तिके लिये भोजन करते हैं और तृप्त हो जानेपर ऐश्वर्यकी तुष्टि करते हैं, वे पितर यहाँ तृप्त हों। मैं उन सबको नमस्कार करता हूँ। जो राक्षसों, भूतों तथा भयानक असुरोंका नाश करते हैं, प्रजाजनोंका अमङ्गल दूर करते हैं, जो देवताओंके भी पूर्ववर्ती तथा देवराज इन्द्रके भी पूज्य हैं, वे यहाँ तृप्त हों। मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। अग्निष्वात्त पितृगण मेरी पूर्व दिशाकी रक्षा करें, बर्हिषद् पितृगण दक्षिण दिशाकी रक्षा करें। आज्यप नामवाले पितर पश्चिम दिशाकी तथा सोमप संज्ञक पितर उत्तर दिशाकी रक्षा करें। उन सबके स्वामी यमराज राक्षसों, भूतों, पिशाचों तथा असुरोंके दोषसे सब ओरसे मेरी रक्षा करें। विश्व, विश्वभुक्, आराध्य, धर्म, धन्य, शुभानन, भूतिद, भूतिकृत् और भूति—ये पितरोंके नौ गण हैं। कल्याण, कल्पताकर्ता, कल्प, कल्पतराश्रय, कल्पता-हेतु तथा अनघ—ये पितरोंके छः गण माने गये हैं। वर, वरेण्य, वरद, पुष्टिद, तुष्टिद, विश्वपाता तथा धाता—ये पितरोंके सात गण हैं। महान्, महात्मा, महित, महिमावान् और महाबल—ये पितरोंके पापनाशक पाँच गण हैं। सुखद, धनद, धर्मद और भूतिद—ये पितरोंके चार गण कहे जाते हैं। इस प्रकार कुल इकतीस पितृगण हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है। वे सब पूर्ण तृप्त होकर मुझपर सन्तुष्ट हों और सदा मेरा हित करें।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—मुने! इस प्रकार स्तुति करते हुए रुचिके समक्ष सहसा एक बहुत ऊँचा तेजःपुञ्ज प्रकट हुआ, जो सम्पूर्ण आकाशमें व्याप्त था। समस्त संसारको व्याप्त करके स्थित हुए उस महान् तेजको देखकर रुचिने पृथ्वीपर घुटने टेक दिये और इस स्तोत्रका गान किया—
रुचिरुवाच
अर्चितानाममूर्त्तानां पितॄणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्॥
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान्॥
मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितॄनप्युदधावपि॥
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलिः॥
देवर्षीणां जनितॄंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातॄन् नमस्येऽहं कृताञ्जलिः॥
प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरुणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलिः॥
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे॥
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्त्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्॥