संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- राजा खनित्रकी कथा * २७१
राजा प्रजातिके पुत्र ऐसे थे। वे समस्त गुणोंसे सम्पन्न और सुन्दर थे। उनके नेत्र पद्मपत्रके समान सुशोभित थे। उन्होंने अपने भाइयोंको प्रेमपूर्वक पृथक्-पृथक् राज्योंमें अभिषिक्त कर दिया और स्वयं समुद्रवसना पृथ्वीका उपभोग करने लगे। उन्होंने पूर्व दिशामें अपने भाई शौरिको, दक्षिण दिशामें उदावसुको, पश्चिममें सुनयको और उत्तरमें महारथको अभिषिक्त किया। उन चारों भाइयोंके तथा स्वयं राजा खनित्रके भिन्न-भिन्न गोत्रवाले मुनि पुरोहित हुए और वे ही वंशपरम्पराके क्रमसे मन्त्री भी होते आये। उक्त चारों राजा अपने-अपने राज्यका उपभोग करने लगे। खनित्र उन सबके सम्राट् थे। वे सारी पृथ्वीके स्वामी थे। महाराज खनित्र उन चारों भाइयों तथा समस्त प्रजापर सदा पुत्रोंकी भाँति स्नेह रखते थे। एक दिन राजा शौरिसे उनके मन्त्री विश्ववेदीने एकान्तमें कहा—'राजन्! मुझे आपसे कुछ कहना है। जिसके अधिकारमें यह सारी पृथ्वी रहती है, उसीके वशमें अन्य सब राजा भी रहते हैं। वह तो राजा होता ही है, उसके पुत्र-पौत्र तथा वंशके लोग भी क्रमशः राजा होते हैं। इसलिये आप हमलोगोंको साधन बनाकर अपने बाप-दादोंके राज्यपर अधिकार कर लीजिये। हम इस लोकमें ही आपको लाभ पहुँचा सकते हैं, परलोकमें नहीं।'
राजा ने कहा—'हमारे ज्येष्ठ भाई राजा हैं और हमलोगोंको पुत्रकी भाँति प्रेमसे अपनाये रखते हैं; फिर हम उनके राज्यपर किस प्रकार अधिकार जमावें।
विश्ववेदी बोले—राजन्! आप राज्यपर अधिकार कर लेनेके बाद राजाचित धन-सम्पत्तिके द्वारा अपने बड़े भाईकी पूजा करते रहियेगा। भला, राज्य-प्राप्तिकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंमें यह छोटे-बड़ेका भेद कैसा।
विश्ववेदीके इस प्रकार समझानेपर शौरिने उनकी इच्छाके अनुसार काम करनेकी प्रतिज्ञा की। तब मन्त्रीने उनके अन्य भाइयोंको भी वशमें किया। फिर साम-दान आदिके द्वारा उन सबके पुरोहितोंको भी फोड़ लिया। फिर वे चारों पुरोहित महाराज खनित्रके विरुद्ध भयङ्कर पुरश्चरण करने लगे। उनके आभिचारिक कर्मसे चार कृत्याएँ
शिवमस्तु द्विजातीनां प्रीतिरस्तु परस्परम्। समृद्धिः सर्ववर्णानां सिद्धिरस्तु च कर्मणाम्॥
हे लोकाः सर्वभूतेषु शिवा वोऽस्तु सदा मतिः। यथाऽऽत्मनि यथा पुत्रे हितमिच्छथ सर्वदा॥
तथा समस्तभूतेषु वर्तध्वं हितबुद्धयः। एवंहि हितमन्त्यन्तं को वा कस्मापराध्यते॥
यत् करोत्यहितं किञ्चित् कस्यचित्क्षुद्रमानसः। तं संनयति तद्धर्मं कांगानि फलं यतः॥
इति मत्वा मनस्तेषु भो लोकाः कृतबुद्धयः। सन्तु मा लौकिके पापे लोकान् प्राप्स्यथ वै मृधाः।
यो मेऽद्य सिद्ध्यते तस्य शिवमस्तु सदा भुवि। यश्च मांद्वैष्टि लोकेऽस्मिन् सोऽपि भद्राणि पश्यतु।
\hfill [११७। २२। १९]