भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२७२ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •

उत्पन्न हुईं। वे सभी विकराल, बड़े-बड़े मुखवाली तथा देखनेमें अत्यन्त भयङ्कर थीं। उनके हाथोंमें भयानक एवं विशाल त्रिशूल था। वे सभी राजा खनित्रके पास आयीं। राजा साधु पुरुष थे, अतः उनके पुण्य-समूहसे वे परास्त हो गयीं और लौटकर उन दुष्टात्मा पुरोहितोंपर ही टूट पड़ीं। कृत्याओंने उन चारों पुरोहितों तथा शौरिके दुष्ट मन्त्री विश्ववेदीको भी जलाकर भस्म कर डाला।

इस घटनासे सब लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ; क्योंकि भिन्न-भिन्न नगरोंमें निवास करनेवाले वे सभी पुरोहित और मन्त्री एक ही समय नष्ट हुए। महाराज खनित्रने भी जब सुना कि भाइयोंके पुरोहित मर गये और मन्त्री विश्ववेदी भी जलकर भस्म हो गये, तब उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने सोचा यह क्या बात हो गयी। महाराजको इसका कुछ भी कारण नहीं मालूम हुआ। तब उन्होंने अपने घरपर पधारे हुए महर्षि वसिष्ठसे पूछा—'ब्रह्मन्! भाइयोंके पुरोहित और मन्त्री जो नष्ट हो गये, इसका क्या कारण है?' राजाके इस प्रकार पूछनेपर महामुनि वसिष्ठने सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया। शौरिके मन्त्रीने जो भाइयोंमें भेद डालनेवाली बात कही थी और शौरिने जो उत्तर दिया था, पुरोहितोंने जो अभिचार-कर्म किया तथा जिस कारण उनकी मृत्यु हुई, वे सब बातें महर्षिने निवेदन कीं। यह सब समाचार सुनकर महाराज खनित्रने कहा—'मुझ पापी, भाग्यहीन तथा दुष्टको धिक्कार है, जिनके कारण चार ब्राह्मणोंकी हत्या हुई। मेरे राज्यको धिक्कार है तथा महान् राजाओंके कुलमें लिये हुए जन्मको भी धिक्कार है, क्योंकि मैं ब्राह्मणोंके विनाशका कारण बन गया। वे पुरोहित तो अपने स्वामी, मेरे भाइयोंका कार्य कर रहे थे, उस दशामें उनकी मृत्यु हुई है। अतः दुष्ट वे नहीं हैं, मैं ही दुष्ट हूँ; क्योंकि मैं ही उनके नाशका कारण बना हूँ।' ऐसा विचार करके महाराज खनित्र अपने क्षुप नामक पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त करके तीनों पत्नियोंके साथ तपस्याके लिये वनमें चले गये। वे वानप्रस्थके नियमोंके ज्ञाता थे, अतः वनमें जाकर उन्होंने साढ़े तीन सौ वर्षोंतक घोर तपस्या की। तपस्यासे शरीरको दुर्बल करके समस्त इन्द्रियोंको रोककर वनवासी नरेशने अपने प्राण त्याग दिये। इससे वे सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अक्षय पुण्यलोकोंमें गये। उनकी तीनों पत्नियाँ भी उन्हींके साथ प्राण त्यागकर उन्हीं लोकोंमें गयीं। राजा खनित्रका यह चरित्र सुनने और पढ़नेपर मनुष्योंका पाप नष्ट करनेवाला है। अब क्षुपका वृत्तान्त सुनो।