भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 274
२७४* संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

करने लगे। सन्तानके लिये उन्होंने इन्द्रका स्तवन किया। उनके स्तोत्र, तपस्या और भक्तिसे सन्तुष्ट होकर इन्द्रने कहा—'राजन्! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, कोई वर माँगो।'

राजा बोले—देवेश्वर! मुझे कोई पुत्र नहीं है, अतः आपकी कृपासे मुझे पुत्र प्राप्त हो। वह पुत्र समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, अक्षय ऐश्वर्यसे युक्त, धर्मपालक तथा धर्मज्ञ हो।

इन्द्रने 'एवमस्तु' कहकर आशीर्वाद दिया। राजाका मनोरथ पूर्ण हो गया, अब वे प्रजाका पालन करनेके लिये अपने नगरमें आये। वहाँ वे विधिपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान तथा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करने लगे। उस समय इन्द्रकी कृपासे उन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम उसके पिताने बलाश्र्व रखा। फिर राजाने पुत्रको सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा दी। पिताके मरनेके बाद जब बलाश्र्व राज्यसिंहासनपर आसीन हुए, तब उन्होंने पृथ्वीके सम्पूर्ण राजाओंको अपने वशमें कर लिया। परन्तु बहुत-से महापराक्रमी राजा, जो सब प्रकारके साधन और धनसे सम्पन्न थे, एक साथ मिल गये और उन्होंने राजा बलाश्र्वको उनकी राजधानीमें ही घेर लिया। नगरपर घेरा पड़ जानेसे राजा बलाश्र्वको बड़ा क्रोध हुआ, परन्तु उनका खजाना बहुत थोड़ा रह गया था; इसलिये सैनिक बलकी कमी हो जानेसे वे अत्यन्त विकल हो गये। जब उन्हें और कोई शरण नहीं दिखायी दी, तब वे आर्त हो दोनों हाथ मुँहके आगे करके जोर-जोरसे साँस लेने लगे; फिर तो उनके हाथकी अँगलियोंके छिद्रसे, मुखकी वायुसे प्रेरित हो सैकड़ों योद्धा, रथ, हाथी और घोड़े निकलने लगे। क्षणभरमें राजाका सारा नगर बहुत बड़ी सेनासे भर गया। तब उस विशाल सेनाके साथ नगरसे बाहर निकलकर उन्होंने उन शत्रु राजाओंको परास्त किया और सबको अपने अधीन करके उनपर कर लगा दिया। करका धमन करने (हाथोंको फूँकने)-से उन्होंने शत्रुओंका दाह करनेवाली सेना उत्पन्न की थी, इसलिये वे राजा बलाश्र्व करन्धम कहलाने लगे। करन्धम धर्मात्मा, सब प्राणियोंके मित्र तथा तीनों लोकोंमें विख्यात थे। जब राजा सङ्कटमें पड़े थे, तब साक्षात् उनके धर्मने उनके पास पहुँचकर शत्रुनाशक सेना प्रदान की थी और फिर स्वयं ही उसे अदृश्य कर दिया।

राजा वीर्यचन्द्रकी सुन्दरी कन्या वीराने, जो उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाली थी, स्वयंवरमें महाराज करन्धमका वरण किया था। उसके गर्भसे महाराजने अबीक्षित् नामक पुत्र उत्पन्न किया। उसके इस नामका प्रसङ्ग सुनो। पुत्र उत्पन्न होनेपर राजा करन्धमने उसके ग्रह आदिके विषयमें ज्योतिषियोंसे पूछा। तब ज्योतिषियोंने कहा—'महाराज! आपका पुत्र उत्तम मुहूर्त, श्रेष्ठ नक्षत्र और शुभ लग्नमें उत्पन्न हुआ है; अतः यह महान् पराक्रमी, परम सौभाग्यवान् तथा अधिक बलशाली होगा। बृहस्पति और शुक्र सातवें स्थानमें तथा चन्द्रमा चौथे स्थानमें रहकर इस बालकको देखते हैं। ग्यारहवें स्थानमें स्थित बुध भी इसको देखते हैं। सूर्य, मङ्गल और शनैश्चरकी इसपर दृष्टि नहीं है; अतः यह सब प्रकारकी सम्पत्तियोंसे युक्त होगा।' ज्योतिषियोंकी बात सुनकर राजा करन्धमके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोले—''इसे बृहस्पति और बुध देखते हैं और सूर्य, शनैश्वर एवं मङ्गलसे यह अबीक्षित (अदृष्ट) है; इसलिये इसका नाम 'अवीक्षित' होगा।''

करन्धमके पुत्र अवीक्षित वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् हुए। उन्होंने मुनिवर कण्वके पुत्रसे सम्पूर्ण अस्त्रविद्याकी शिक्षा ग्रहण की। वे रूपमें अश्विनीकुमार, बुद्धिमें बृहस्पति, कान्तिमें चन्द्रमा,