संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रणाम किया। सुमनाने भी सास-ससुरके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तब उन दोनोंने भी आशीर्वाद देकर नव-दम्पतिका अभिनन्दन किया। फिर तो नरिष्यन्तके नगरमें बड़ा भारी उत्सव मनाया गया। दशार्णराज सम्बन्धी हुए और बहुत-से राजा पुत्रके हाथों युद्धमें परास्त हो गये, यह सुनकर महाराज नरिष्यन्त बहुत प्रसन्न हुए। दशार्णराजकुमारी सुमना दमके साथ बहुत समयतक विहार करती रही। फिर उसने गर्भ धारण किया। राजा नरिष्यन्त भी सब भोगोंको भोगकर वृद्धावस्थामें पहुँच चुके थे, इसलिये वे दमको राजपदपर अभिषिक्त करके स्वयं वनमें चले गये। उनकी यशस्विनी पत्नी इन्द्रसेनाने भी उनका ही अनुसरण किया। नरिष्यन्त वहाँ वानप्रस्थके नियमोंका पालन करते हुए रहने लगे।
एक दिन दक्षिण देशका दुराचारी राजकुमार वपुष्मान्, जो संक्रन्दनका पुत्र था, थोड़ी-सी सेना साथ ले वनमें शिकार खेलनेके लिये गया। उसने तपस्वी नरिष्यन्त तथा उनकी पत्नी इन्द्रसेनाको तपस्याके कारण दुर्बल देखकर पूछा—'आप वानप्रस्थ-आश्रममें स्थित ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य हैं? मुझे बताइये।' राजा नरिष्यन्तने मौन-व्रत धारण कर लिया था, इसलिये उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया; किन्तु उनकी पत्नी इन्द्रसेनाने सब बातें सच-सच बता दीं। परिचय पाकर वपुष्मान्ने सोचा, अब तो मैं अपने शत्रुके पिताको पा गया हूँ। यह विचारकर उसने कुपित हो नरिष्यन्तकी जटा पकड़ ली। इन्द्रसेना आँसू बहाती हुई गद्गदकण्ठसे रोने और हाहाकार करने लगी। वपुष्मान्ने म्यानसे तलवार निकाल ली और यह बात कही, 'जिसने युद्धमें मुझे परास्त किया और मेरी सुमनाको हर लिया, उस दमके पिताको आज मैं मार डालूँगा। अब वह आकर इनकी रक्षा करे।'
यह कहकर उस दुराचारीने इन्द्रसेनाको रोती-बिलखती छोड़ नरिष्यन्तका मस्तक काट डाला, तब समस्त मुनि तथा अन्य वनवासी भी उसे धिक्कारने लगे। वपुष्मान् अपने नगरको लौट गया। उसके चले जानेपर इन्द्रसेनाने एक शुद्ध तपस्वीको अपने पुत्रके पास भेजा और कहा—'तुम शीघ्र जाकर मेरे पुत्रसे यह सब हाल कहो। मेरा सन्देश इस प्रकार कहना—'महाराजकी इस प्रकार तिरस्कारपूर्ण हिंसा देखकर मैं बहुत दुखी हूँ। राजा होनेका अधिकार उसीको है, जो चारों वर्णों और आश्रमोंकी रक्षा करे। तुम जो तपस्वियोंकी रक्षा नहीं करते, क्या यही तुम्हारे लिये उचित है? तुम्हारे महाराज नरिष्यन्तके विषयमें यह बात प्रसिद्ध हो गयी कि बिना किसी अपराधके उनके केश पकड़कर वपुष्मान्ने उनकी हत्या की; ऐसी स्थितिमें तुम वही कार्य करो, जिससे तुम्हारे धर्मका लोप न हो। इससे आगे मुझे कुछ नहीं कहना है, क्योंकि मैं तपस्विनी हूँ। तुम्हारे मन्त्री धीर तथा सब शास्त्रोंके ज्ञाता हैं; उन सबके साथ विचार करके इस समय जो करना उचित हो, वह करो। अपने पिता शक्तिको राक्षसके हाथसे मारा गया सुनकर महर्षि पराशरने समस्त राक्षस-कुलको अग्निकुण्डमें होमकर भस्म कर दिया था। मैं तो ऐसा मानती हूँ कि तुम्हारे पिता नहीं, तुम मारे गये; उनके ऊपर नहीं, तुम्हारे ऊपर वह तलवार गिरी है। यह तुम्हारी ही मर्यादाका उल्लङ्घन किया गया है। अब तुम्हें भृत्य, कुटुम्ब और बन्धु-बान्धवोंसहित वपुष्मान्के प्रति जो बर्ताव करना उचित हो, वह करो।'
इस प्रकार संदेश दे इन्द्रसेनाने शुद्ध तपस्वीको विदा किया और स्वयं पतिके शरीरको गोदमें ले वे अग्निमें प्रवेश कर गयीं। इन्द्रसेनाकी आज्ञाके