भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 291
  • राजा नरिष्यन्त और दमका चरित्र * २११

अनुसार क्षुद्र तापसने वहाँ जाकर दमसे उनके पिताके मारे जानेका सब समाचार कहा। यह सुनकर दम क्रोधसे जल उठा। जैसे घी डालनेपर आग प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार दम क्रोधाग्निसे जलते हुए हाथ-से-हाथ मलने लगे और इस प्रकार बोले—'ओह! मुझ पुत्रके जीते-जी उस नृशंस वपुष्मान्ने मेरे पिताको अनाथकी भाँति मार डाला और इस प्रकार मेरे कुलका अपमान किया। यदि मैं बैठकर शोक मनाऊँ या क्षमा कर दूँ तो यह मेरी नपुंसकता है। दुष्टोंका दमन और साधु पुरुषोंका पालन—यही मेरा कर्तव्य है। मेरे पिताको मारा गया देखकर भी यदि शत्रु जीवित है तो अब 'हा तात! हा तात!' कहकर बहुत अधिक विलाप करनेसे क्या होगा। इस समय जो करना आवश्यक है, वही मैं करूँगा। उस कायर, पापी एवं दुष्ट दक्षिण-देशनिवासी शत्रुको युद्धमें मारकर सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य भोगूँगा। यदि उसे न मार सका तो स्वयं ही अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा। यदि देवराज इन्द्र हाथमें वज्र लिये स्वयं ही इस युद्धमें पधारें, भयङ्कर दण्ड लिये साक्षात् यमराज भी कुपित होकर आ जायें, कुबेर, वरुण और सूर्य भी वपुष्मान्की रक्षाका यत्न करें तो भी मैं अपने तीखे बाणोंसे उसका वध कर डालूँगा। जो नियतात्मा, निर्दोष, वनवासी, अपने आप गिरे हुए फलका आहार करनेवाले तथा सब प्राणियोंके मित्र थे—ऐसे मेरे पिताकी जिसने मुझ जैसे शक्तिशाली पुत्रके रहते हुए हिंसा की है, उसके मांस और रक्तसे आज गृध्र तृप्त हों।'

इस प्रकार प्रतिज्ञा करके नरिष्यन्तकुमार दमने मन्त्रियों तथा पुरोहितको बुलाकर कहा—'क्षुद्र तपस्वीने जो समाचार कहा है, उसे आपलोगोंने सुन लिया होगा। पिताजी तो स्वर्गधाममें जा पहुँचे। अब मेरे लिये जो उचित हो, सो बताओ। आज मैं वही करूँगा, जिसके लिये मेरी माताने आज्ञा दी है। हाथी, घोड़े, रथ और पैदलसे युक्त चतुरङ्गिणी सेना तैयार करो। पिताके वैरका बदला लिये बिना, पिताके हत्यारेका प्राण लिये बिना तथा माताजीकी आज्ञाका पालन किये बिना मुझे जीवित रहनेका उत्साह नहीं है।' राजाकी वह बात सुनकर खिन्नचित्त हुए मन्त्रियोंने सेवकों और वाहनोंसहित सेनाको कूचके लिये तैयार किया और त्रिकालवेत्ता पुरोहितसे आशीर्वाद ले सब लोग तलवार, शक्ति और ऋष्टि आदि आयुध लिये नगरसे बाहर निकले। महाराज दम नागराजकी भाँति फुफकारते हुए वपुष्मान्की ओर चले। उन्होंने वपुष्मान्के सीमारक्षकों तथा सामन्तोंका वध करते हुए, बड़े वेगसे दक्षिण दिशामें चढ़ाई की। संक्रन्दनकुमार वपुष्मान्को यह पता लग गया कि दम दल-बलसहित आ रहा है। इससे उसके मनमें तनिक भी भय या कम्प नहीं हुआ। उसने भी अपनी सेनाको युद्धके लिये तैयार होनेका आदेश दिया और नगरसे बाहर निकलकर दमके पास दूत भेजा। दूतने वहाँ जाकर कहा—'क्षत्रियाधम! तू शीघ्रतापूर्वक मेरे समीप आ। नरिष्यन्त अपनी स्त्रीके साथ तेरी प्रतीक्षा करते हैं। मेरी भुजाओंसे छूटे हुए बाण, जो शानपर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये गये हैं, तेरे शरीरमें घुसकर युद्धमें तेरा रक्तपान करेंगे।'

दूतकी कही हुई सारी बातें सुनकर दमने अपनी पूर्वोक्त प्रतिज्ञाका पुनः स्मरण किया और सर्पकी भाँति फुफकारते हुए वेगसे पैर बढ़ाया। कुण्डिनपुरके पास पहुँचकर दमने वपुष्मान्को युद्धके लिये ललकारा। फिर तो दोनोंमें भयङ्कर संग्राम छिड़ गया। रथी रथसवारके साथ, हाथीसवार हाथीसवारके साथ और घुड़सवार घुड़सवारके