संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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साथ भिड़ गये। इस प्रकार समस्त देवताओं, सिद्धों और गन्धर्व आदिके देखते-देखते दोनों दलोंमें घमासान युद्ध हुआ। जब दम क्रोधपूर्वक युद्ध करने लगे, उस समय पृथ्वी काँप उठी। कोई हाथीसवार, रथी या घुड़सवार ऐसा नहीं मिला, जो उनका बाण सह सके। तदनन्तर वपुष्मान्का सेनापति दमके साथ युद्ध करने लगा। दमने अपने बाणसे उसकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी, जिससे वह गिरकर प्राणोंसे हाथ धो बैठा। सेनाध्यक्षके गिरते ही राजासहित सारी सेनामें भगदड़ पड़ गयी। तब दमने कहा—'ओ दुष्ट! तू मेरे तपस्वी पिताका, जिनके हाथमें कोई शस्त्र नहीं था, अकारण वध करके कहाँ भागा जाता है। यदि क्षत्रिय है तो लौट आ।' तब वपुष्मान् अपने छोटे भाईके साथ लौट आया। साथमें उसके पुत्र, सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धव भी थे। वह रथपर आरूढ़ हो दमके साथ युद्ध करने लगा। दम अपने पिताके वधसे कुपित हो रहे थे। उन्होंने वपुष्मान्के चलाये हुए समस्त बाणोंको काट डाला और उसके अङ्ग-प्रत्यङ्गको बींध डाला। फिर एक-एक बाण मारकर उसके सात पुत्रों, भाइयों, सम्बन्धियों तथा मित्रोंको यमराजके घर भेज दिया। पुत्रों और भाइयोंके मारे जानेपर वपुष्मान्को बड़ा क्रोध हुआ और वह सर्पोंके समान विषैले बाणोंसे दमके साथ युद्ध करने लगा। दमने उसके बाणोंको काट डाला और उसने भी दमके बाण टुकड़े-टुकड़े कर डाले। दोनों ही अत्यन्त क्रोधमें भरकर एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे लड़ रहे थे। परस्परके बाणोंकी चोटसे दोनोंके धनुष कट गये, फिर दोनों तलवार हाथमें लेकर पैंतरे बदलने लगे। दमने क्षणभर अपने मरे हुए पिताका ध्यान किया, फिर दौड़कर वपुष्मान्की चोटी पकड़ ली। तत्पश्चात् उसे धरतीपर पटककर एक पैरसे उसका गला दबा दिया और अपनी भुजा उठाकर कहा—'समस्त देवता, मनुष्य, सिद्ध और नाग देखें, मैं इस नीच क्षत्रिय वपुष्मान्की छाती चीरे डालता हूँ।'
यों कहकर दमने अपनी तलवारसे उसकी छाती चीर डाली। इस प्रकार अपने पिताके वैरका बदला लेकर वे पुनः अपने नगरको लौट आये। सूर्यवंशके राजा ऐसे ही पराक्रमी हुए। इनके अतिरिक्त भी बहुत-से शूरवीर, विद्वान्, यज्ञकर्ता और धर्मज्ञ राजा हो गये हैं। वे सभी वेदान्तके पारङ्गत पण्डित थे। मैं उनकी संख्या बतलानेमें असमर्थ हूँ। इन सब राजाओंका चरित्र श्रवण करके मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है।
श्रीमार्कण्डेयपुराणका उपसंहार और माहात्म्य
पक्षी कहते हैं—जैमिनिजी! महातपस्वी मार्कण्डेय मुनिने यह सब कथा सुनाकर क्रौष्टुकिजीको विदा कर दिया। उसके बाद मध्याह्नकालकी क्रिया समाप्त की। महामुने! हमने भी उनसे जो कुछ सुना था, वह सब आपको कह सुनाया। यह अनादिसिद्ध पुराण ब्रह्माजीने पहले मार्कण्डेय मुनिको सुनाया था। वही हमने आपसे कहा है। यह पुण्यमय, पवित्र, आयुवर्धक तथा सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है। जो इसका पाठ और श्रवण करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। आपने प्रारम्भमें जो कई प्रश्न किये थे, उसके उत्तरमें हमने पिता-पुत्र-संवाद, ब्रह्माजीके द्वारा रची हुई सृष्टि, मनुओंकी उत्पत्ति तथा राजाओंके चरित्र सुनाये हैं। यह सब बात तो हम बता चुके।