भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भक्ति-अङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष ३२, सन् १९५८ ई०]—इसमें ईश्वरोपासना, भगवद्भक्तिका स्वरूप तथा भक्तिके प्रकारों और विभिन्न पक्षोंपर शास्त्रीय दृष्टिसे व्यापक विचार किया गया है। साथ ही इसमें अनेक भगवद्भक्तोंके शिक्षाप्रद-अनुकरणीय जीवन चरित्र भी बड़े ही मर्मस्पर्शी, प्रेरणाप्रद और सर्वदा पठनीय हैं।

संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष ३४, सन् १९६० ई०]—इसमें पराशक्ति भगवतीके स्वरूप-तत्त्व, महिमा आदिके तात्त्विक विवेचनसहित श्रीमद्देवीकी लीला-कथाओंका सरस एवं कल्याणकारी वर्णन है। श्रीमद्देवीभागवतके विविध, विचित्र कथा-प्रसंगोंके रोचक और ज्ञानप्रद उल्लेखके साथ देवी-माहात्म्य, देवी-आराधनाकी विधि एवं उपासनापर इसमें महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला गया है। अतः साधनाकी दृष्टिसे यह अत्यन्त उपादेय और अनुशीलनयोग्य है।

संक्षिप्त योगवासिष्ठाङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष ३५, सन् १९६१ ई०]—योगवासिष्ठके इस संक्षिप्त रूपान्तरमें जगत्‌की असत्ता और परमात्मसत्ताका प्रतिपादन है। पुरुषार्थ एवं तत्त्व-ज्ञानके निरूपणके साथ-साथ इसमें शास्त्रोक्त सदाचार, त्याग-वैराग्ययुक्त सत्कर्म और आदर्श व्यवहार आदिपर सूक्ष्म विवेचन है। कल्याणकामी साधकोंके लिये इसका अनुशीलन उपादेय है।

संक्षिप्त शिवपुराण (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष ३६, सन् १९६२ ई०]—सुप्रसिद्ध शिवपुराणका यह संक्षिप्त अनुवाद—परात्पर परमेश्वर शिवके कल्याणमय स्वरूप-विवेचन, तत्त्व-रहस्य, महिमा, लीला-विहार, अवतार आदिके रोचक, किंतु ज्ञानमय वर्णनसे युक्त है। इसकी कथाएँ अत्यन्त सुरुचिपूर्ण, ज्ञानप्रद और कल्याणकारी हैं। इसमें भगवान् शिवकी पूजन-विधिसहित महत्त्वपूर्ण स्तोत्रोंका भी उपयोगी संकलन है।

परलोक और पुनर्जन्माङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष ४३, सन् १९६९ ई०]—मनुष्यमात्रको मानव-चरित्रके पतनकारी आसुरी-सम्पदाके दोषोंसे सदा दूर रहने तथा परम विशुद्ध उज्ज्वल चरित्र होकर सर्वदा सत्कर्म करते रहनेकी शुभ प्रेरणाके साथ इसमें परलोक तथा पुनर्जन्मके रहस्यों और सिद्धान्तोंपर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। आत्म कल्याणकामी पुरुषों तथा साधकमात्रके लिये इसका अध्ययन-अनुशीलन अति उपयोगी है।

गर्ग-संहिता (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष ४४-४५, सन् १९७०-७१ ई०]—श्रीराधाकृष्णकी दिव्य मधुर लीलाओंका इसमें बड़ा ही हृदयहारी वर्णन है। इसकी सरस-मधुर कथाएँ ज्ञानप्रद, भक्तिप्रद और भगवान् श्रीकृष्णमें अनुराग बढ़ानेवाली हैं।

नरसिंहपुराण [वर्ष ४५, सन् १९७१ ई०] भगवान् व्यासकी एक सुन्दर रचना है। इसमें पुराणोंके पाँचों लक्षणोंके साथ भगवान्‌के लीलावतारकी कथाओंका सुन्दर वर्णन है। इसके अतिरिक्त भगवान् श्रीरामकी लीलाके विशेष चित्रणके साथ मार्कण्डेय, ध्रुव-चरित्र, यमगीता तथा अनेक मन्त्रोंका भी वर्णन है, जिनकी साधनासे इहलौकिक और पारलौकिक सिद्धियोंको सहज ही प्राप्त किया जा सकता है।

श्रीगणेश-अङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष ४८, सन् १९७४ ई०]—भगवान् गणेश अनादि, सर्वपूज्य, आनन्दमय, ब्रह्ममय और सच्चिदानन्दरूप (परमात्मा) हैं। 'आदौ पूज्यो विनायक:'—इस उक्ति के अनुसार भी गणपति की अग्रपूजा सुप्रसिद्ध और सर्वत्र प्रचलित ही है। महामहिम गणेशकी इन्हीं सर्वमान्य विशेषताओं और सर्वसिद्धि-प्रदायक उपासना-पद्धतिका विस्तृत वर्णन 'कल्याण' के इस (पुनर्मुद्रित) विशेषाङ्कमें उपलब्ध है। इसमें श्रीगणेशकी लीला-कथाओंका भी बड़ा ही रोचक वर्णन और पूजा-अर्चना आदिपर उपयोगी दिग्दर्शन है।

श्रीहनुमान-अङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष ४९, सन् १९७५ ई०]—इसमें श्रीहनुमान्‌जीका आद्योपान्त जीवन-चरित्र और श्रीरामभक्तिके प्रतापसे सदा अमर बने रहकर उनके द्वारा किये गये क्रिया-कलापोंका तात्त्विक और प्रामाणिक एवं सुरुचिपूर्ण चित्रण है। श्रीहनुमान्‌जीको प्रसन्न करनेवाले विविध स्तोत्र, ध्यान एवं पूजन-विधियाँ आदि साधनोपयोगी बहुमूल्य सामग्रीका भी इसमें उपयोगी संकलन है। अतः साधकोंके लिये यह उपादेय है।

सूर्याङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष ५३, सन् १९७९ ई०]—भगवान् सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं। इनमें समस्त देवताओंका निवास है। अतः भगवान् सूर्य सभीके लिये उपास्य और आराध्य हैं। प्रस्तुत अङ्कमें विभिन्न संत-महात्माओंके सूर्यतत्त्वपर सुन्दर लेखोंके साथ वेदों, पुराणों, उपनिषदों तथा रामायण इत्यादिमें सूर्य-सन्दर्भ, भगवान् सूर्यके उपासनापरक विभिन्न स्तोत्र, देश-विदेशमें सूर्योपासनाके विविध रूप तथा सूर्य-लीलाका सरस वर्णन है। इसके साथ अन्तमें भारतीय कलामें सूर्य प्रतिमाएँ, नवग्रह-उपासना, सूर्य-सम्बन्धी व्रत-अनुष्ठान आदि अनेक विषयके रूपमें दो परिशिष्टाङ्क जोड़ दिये जानेसे यह अङ्क और उपयोगी हो गया है।