भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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'कल्याण' के पुराने, लोकप्रिय पुनर्मुद्रित विशेषाङ्कः

ईश्वराङ्क [कल्याण वर्ष ७, सन् १९३२ ई०]—मनुष्यमात्रके मनमें इस जगत्‌के सृजक, पालक एवं संहारक सत्ताके विषयमें शाश्वत प्रश्न सदैव ही गूँजा करते हैं। अखिल सृष्टिके उसी कारण-सत्ताको ईश्वर कहा जाता है। ईश्वर-विषयक समस्त प्रश्नोंके समाधानके लिये 'कल्याण'में 'ईश्वराङ्क'का पूर्व प्रकाशन किया गया था। इस अङ्कमें ईश्वर-तत्त्व, ईश्वरमें विश्वास, ईश्वर-महिमा, ईश्वर और उसकी प्राप्ति, परमात्मा और जीवात्मा, ईश्वर-निरूपण, ईश्वरका अस्तित्व, विज्ञान और ईश्वर आदि अनेक विषयोंपर देश-विदेशके मूर्धन्य विद्वानों, सन्त-महापुरुषोंके लेखोंका अद्भुत संग्रह है। इसके अतिरिक्त अनेक सिद्ध महात्माओंके द्वारा ईश्वर-सम्बन्धी प्रश्नोंका प्रश्नोत्तर-शैलीमें सुन्दर समाधान भी है।

शिवाङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष ८, सन् १९३४ ई०]—यह शिवतत्त्व तथा शिव-महिमापर विशद विवेचनसहित शिवार्चन, पूजन, व्रत एवं उपासनापर तात्त्विक और ज्ञानप्रद मार्ग-दर्शन कराता है। यह एक मूल्यवान् अध्ययन-सामग्री है। द्वादश ज्योतिर्लिङ्गोंका सचित्र परिचय तथा भारतके सुप्रसिद्ध शैव-तीर्थोंका प्रामाणिक वर्णन इसके अन्यान्य महत्त्वपूर्ण (पठनीय) विषय हैं।

शक्ति-अङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष ९, सन् १९३५ ई०]—इसमें परब्रह्म परमात्माके आद्याशक्ति-स्वरूपका तात्त्विक विवेचन, महादेवीकी लीला-कथाएँ एवं सुप्रसिद्ध शाक्त-भक्तों और साधकोंके प्रेरणादायी जीवन-चरित्र तथा उनकी उपासना-पद्धतिपर उत्कृष्ट उपयोगी सामग्री संगृहीत है। इसके अतिरिक्त भारतके सुप्रसिद्ध शक्ति-पीठों तथा प्राचीन देवी-मन्दिरोंका सचित्र दिग्दर्शन भी इसकी उल्लेखनीय विषय-वस्तुके महत्त्वपूर्ण अङ्ग हैं।

योगाङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष १०, सन् १९३६ ई०]—इसमें योगकी व्याख्या तथा योगका स्वरूप-परिचय एवं प्रकार और योग-प्रणालियों तथा अङ्ग-उपाङ्गोंपर विस्तारसे प्रकाश डाला गया है। साथ ही अनेक योग-सिद्ध महात्माओं और योग-साधकोंके जीवन-चरित्र तथा साधना-पद्धतियोंपर रोचक, ज्ञानप्रद वर्णन हैं। यह विशेषाङ्क योगके कल्याणकारी और योग-सिद्धियोंके चमत्कारी प्रभावोंकी ओर आकृष्ट कर 'योग' के सर्वमान्य महत्त्वसे परिचय कराता है।

संत-अङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष १२, सन् १९३८ ई०]—इसमें उच्चकोटिके अनेक संतों—प्राचीन, अर्वाचीन, मध्ययुगीन एवं कुछ विदेशी भगवद्विश्वासी महापुरुषों तथा त्यागी-वैरागी महात्माओंके ऐसे आदर्श जीवन-चरित्र हैं, जो पारमार्थिक गतिविधियोंके लिये प्रेरित करनेके साथ-साथ उनके सार्वभौमिक सिद्धान्तों, त्याग-वैराग्यपूर्ण तपस्वी जीवन-शैलीको उजागर करके उच्चकोटिके पारमार्थिक आदर्श, जीवन-मूल्योंको रेखाङ्कित करते हैं।

साधनाङ्क (सचित्र, सजिल्द) [वर्ष १५, सन् १९४१ ई०]—यह अङ्क उच्चकोटिके विचारकों, वीतराग महात्माओं, एकनिष्ठ साधकों एवं विद्वान् मनीषियोंके साधनापयोगी अनुभूत विचार और उनके साधनापरक बहुमूल्य मार्ग-दर्शनसे ओतप्रोत-महत्त्वपूर्ण है। इसमें साधना-तत्त्व, साधनाके विविध स्वरूप—ईश्वरोपासना, योगसाधना, प्रेमोपासना आदि अनेक कल्याणकारी साधनों और उनके अङ्ग-उपाङ्गोंका शास्त्रीय विवेचन है। यह सभीके लिये उत्तमोत्तम दिशा-निर्देशक है।

भागवताङ्क [कल्याण वर्ष १६, सन् १९४२ ई०]—भारतीय संस्कृतिकी अनुपम निधि श्रीमद्भागवत संस्कृति-वाङ्मयकी सर्वोत्कृष्ट परिणति है। इसमें वर्णित भगवान्‌की दिव्य-लीला, उत्कृष्ट काव्य, समाज-संगठन-प्रणाली, अध्यात्म, भक्त-चरित्र आदि संसारके लिये अनुकरणीय आदर्श है। श्रद्धालु भक्तोंके लिये तो यह साक्षात् भगवद्विग्रह एवं आश्रय-स्थान है। इसीलिये गीताप्रेससे कल्याणके सोलहवें वर्षके विशेषाङ्कके रूपमें 'भागवताङ्क' का पूर्व प्रकाशन किया गया था। इसमें भारतके उत्कृष्ट संत-महात्माओं-विद्वान् तथा चिन्तकोंके श्रीमद्भागवतके विभिन्न पक्षोंपर सुन्दर लेखोंके साथ सम्पूर्ण श्रीमद्भागवतका हिन्दी अनुवाद भी है।

संक्षिप्त महाभारत (सचित्र, सजिल्द दो खण्डोंमें) [वर्ष १७, सन् १९४३ ई०]—धर्म, अर्थ, काम, मोक्षके महान् उपदेशों एवं प्राचीन ऐतिहासिक घटनाओंके उल्लेखसहित इसमें ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, योग, नीति, सदाचार, अध्यात्म, राजनीति, कूटनीति आदि मानव-जीवनके उपयोगी विषयोंका विशद वर्णन और विवेचन है। इसमें अनेक महत्त्वपूर्ण विषयोंके समावेशके कारण इसे शास्त्रों में 'पञ्चम वेद' और विद्वत्समाजमें भारतीय ज्ञानका 'विश्वकोश' कहा गया है।