संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण
अश्वमेध और सौ राजसूय-यज्ञोंका फल पाता है। उसे न यमराजसे भय होता है न नरकोंसे। वह मनुष्य सब पापोंसे मुक्त होकर कृतार्थ हो जाता है। इस पृथ्वीपर उसका वंश-परम्परा सदा कायम रहती है तथा वह इन्द्रलोक एवं सनातन ब्रह्मलोकमें जाता है। वहाँसे पुनः च्युत होकर मनुष्य-योनिमें उसे नहीं आना पड़ता।
इस पुराणके श्रवणसे ही मनुष्य परम योग प्राप्त कर लेता है। नास्तिक, वेदनिन्दक शूद्र, गुरुद्रोही, व्रत-भंग करनेवाले, माता-पिताके त्यागी, सुवर्णचोर, मर्यादा भंग करनेवाले तथा जातिको कलङ्कित करनेवाले पुरुषोंको प्राण कण्ठमें आ जायं तो भी इस पुराणका उपदेश नहीं देना चाहिये। यदि लोभ, मोह अथवा विशेषतः भयके कारण कोई उक्त मनुष्योंको यह पुराण सुनाता अथवा पढ़ाता है तो वह निश्चय ही नरकमें पड़ता है।*
जैमिनि बोले—‘पक्षियो! महाभारतमें मेरे जिस सन्देहका निवारण नहीं हो सका, उसका निवारण आपलोगोंने मित्रभावसे किया है; ऐसा दूसरा कौन करेगा। आपलोग दीर्घायु, नीरोग तथा उत्तम वृत्तिसे युक्त हों। सांख्ययोगमें आपकी बुद्धि अविचलभावसे स्थित रहे। पिताके शापजनित दोषसे जो आपके मनमें दुःख रहता है, वह दूर हो जाय।’
यों कहकर महाभाग जैमिनि उन श्रेष्ठ पक्षियोंकी प्रशंसा करके अपने आश्रमपर चले गये। वे उन पक्षियोंद्वारा किये हुए परम उदार उपदेशका सदा चिन्तन करने लगे।
श्रीमार्कण्डेयपुराण सम्पूर्ण
* पुराणश्रवणादेव परं योगमवाप्नुयात्। नास्तिकाय न दातव्यं वृषले वेदनिन्दके॥
गुरुविद्वेषके चैव तथा भग्नव्रतेषु च। पितृमातृपरित्यागे सुवर्णस्तेयिने तथा॥
भिन्नमर्यादके चैव तथैव जातिदूषके। एतेषां नैव दातव्यं प्राज्ञैः कण्ठगतैरपि॥
लोभाद्वा यदि वा मोहाद् भयाद्वापि विशेषतः। पठेद्वा पाठयेद्वापि स गच्छेन्नरकं ध्रुवम्॥
(१३७। ३२—३५)