संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *
पाशोंसे बाँध लेते हैं और डंडोंकी मारसे व्याकुल करते हुए दक्षिण दिशाकी ओर खींच ले जाते हैं। उस मार्गपर कहीं तो कुश जमे होते हैं, कहीं काँटे फैले होते हैं, कहीं बाँबीकी मिट्टियाँ जमी होती हैं, कहीं लोहेकी कीलें गड़ी होती हैं और कहीं पथरीली भूमि होनेके कारण वह पथ अत्यन्त कठोर जान पड़ता है। कहीं जलती हुई आगकी लपटें मिलती हैं तो कहीं सैकड़ों गड्ढोंके कारण वह मार्ग अत्यन्त दुर्गम प्रतीत होता है। कहीं सूर्य इतने तपते हैं कि उस राहसे जानेवाला जीव उनकी किरणोंसे जलने लगता है। ऐसे पथसे यमराजके दूत उसे घसीटकर ले जाते हैं। वे दूत घोर शब्द करनेके कारण अत्यन्त भयङ्कर जान पड़ते हैं। जिस समय वे जीवको घसीटकर ले जाते हैं, सैकड़ों गीदड़ियाँ जुटकर उसके शरीरको नोच-नोचकर खाने लगती हैं। पापी जीव ऐसे ही भयंकर मार्गसे यमलोककी यात्रा करते हैं।
जो मनुष्य छाता, जूता, वस्त्र और अन्न-दान करनेवाले होते हैं, वे उस मार्गपर सुखसे यात्रा करते हैं। इस प्रकार अनेक प्रकारका कष्ट भोगता हुआ पापपीड़ित जीव विवश होकर बारह दिनोंमें धर्मराजके नगरतक पहुँचाया जाता है। उसके यातनामय शरीरके जलाये जानेपर जीव स्वयं भी अत्यन्त दाहका अनुभव करता है, उसी प्रकार मारे और काटे जानेपर भी उसे अत्यन्त भयङ्कर वेदना होती है। अधिक देरतक जलमें भिगोये जानेके कारण भी जीवको भारी दुःख उठाना पड़ता है। इस प्रकार दूसरे शरीरको प्राप्त होनेपर भी उसे अपने कर्मोंके फलस्वरूप कष्ट भोगने पड़ते हैं। उसके भाई-बन्धु जो तिल और जलकी अञ्जलि देते तथा पिण्डदान करते हैं, वही उस मार्गपर जाते समय उसे खानेको मिलता है। भाई-बन्धु यदि अशौचके भीतर तेल लगावें और उबटन मलवावें तो उसीसे जीवका पोषण किया जाता है अर्थात् वह मैल ही उन्हें खानी पड़ती है [अतः ये वस्तुएँ वर्जित हैं]। इसी प्रकार बान्धवगण जो कुछ खाते-पीते हैं, वह मृतक जीवको मिलता है; अतः उन्हें भोजनकी शुद्धिपर भी ध्यान रखना चाहिये। यदि भाई-बन्धु भूमिपर शयन करें तो उससे जीवको कष्ट नहीं होता और यदि वे उसके निमित्त दान करें तो उससे मृत जीवको बड़ी तृप्ति होती है। यमदूत जब उसे साथ लेकर जाते हैं तो वह बारह दिनोंतक अपने घरकी ओर देखता रहता है। उस समय पृथ्वीपर उसके निमित्त जो जल और पिण्ड दिये जाते हैं, उन्हींका वह उपभोग करता है।*
मृत्युसे बारह दिन बीतनेके पश्चात् यमपुरीकी ओर खींचकर ले जाया जानेवाला जीव अपने सामने यमराजके नगरको देखता है, जो बड़ा ही भयानक है। उस नगरमें पहुँचनेपर उसे मृत्यु, काल और अन्तक आदिके बीचमें बैठे हुए यमराजका दर्शन होता है, जो कज्जलगराशिके समान काले हैं और अत्यन्त क्रोधसे लाल-लाल आँखें किये रहते हैं। दाढ़ोंके कारण उनका मुख बड़ा विकराल दिखलायी पड़ता है। टेढ़ी भौंहोंसे युक्त उनकी आकृति बड़ी भयङ्कर है। वे कुरूप, भीषण और टेढ़े-मेढ़े सैकड़ों रोगोंसे घिरे रहते हैं। उनकी भुजाएँ विशाल हैं। उनके एक हाथमें यमदण्ड और दूसरेमें पाश है। देखनेमें वे बड़े
* तत्र यद्बान्धवास्तोयं प्रयच्छन्ति तिलैः सह। यच्च पिण्डं प्रयच्छन्ति नीयमानस्तदश्नुते ॥
तैलाभ्यङ्गो बान्धवानामङ्गसंवाहनं च यत्। तेन चाप्याय्यते जन्तुर्यच्चाश्नन्ति सबान्धवाः ॥
भूमौ स्वपन्द्भिरत्यन्तं क्लेशमाप्नोति बान्धवैः। दानं ददद्भिस्त्वं तथा जन्तुराप्याय्यते मृतः ॥
नीयमानः स्वकं गेहं द्वादशाहं स पश्यति। उपभुङ्क्ते तथा दत्तं तोयपिण्डादिकं भुवि ॥
(अ० १०। ७२-७५)