संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें• पिता-पुत्र-संवादका आरम्भ, जीवकी मृत्यु तथा नरक-गतिका वर्णन • ३३
भयानक प्रतीत होते हैं। पापी जीव उन्हींकी बतायी हुई शुभाशुभ गतिको प्राप्त होता है। झूठी गवाही देने और झूठ बोलनेवाला मनुष्य रौरव नरकमें जाता है। अब मैं रौरवका स्वरूप बतलाता हूँ, आप ध्यान देकर उसे सुनें। रौरव नरककी लंबाई-चौड़ाई दो हजार योजनकी है। वह एक गड्ढेके रूपमें है, जिसकी गहराई घुटनोंतककी है। वह नरक अत्यन्त दुस्तर है। उसमें भूमिके बराबरतक अङ्गारराशि बिछी रहती है। उसके भीतरकी भूमि दहकते हुए अङ्गारोंसे बहुत तपी होती है। सारा नरक तीव्रवेगसे प्रज्वलित होता रहता है। उसीके भीतर यमराजके दूत पापी मनुष्यको डाल देते हैं। वह धधकती हुई आगमें जब जलने लगता है तो इधर-उधर दौड़ता है, किन्तु पग-पगपर उसका पैर जल-भुनकर राख होता रहता है। वह दिन-रातमें कभी एक बार पैर उठाने और रखनेमें समर्थ होता है। इस प्रकार सहस्रों योजन पार करनेपर वह उससे छुटकारा पाता है। फिर दूसरे पापोंकी शुद्धिके लिये उसे वैसे ही अन्य नरकोंमें जाना पड़ता है। इस प्रकार सब नरकोंमें यातना भोगकर निकलनेके बाद पापी जीव तिर्यग्योनिमें जन्म लेता है। क्रमशः कीड़े मकोड़े, पतङ्ग, हिंसक जीव, मच्छर, हाथी, वृक्ष आदि, गौ, अश्व तथा अन्यान्य दुःखदायिनी पापयोनियोंमें जन्म धारण करनेके पश्चात् वह मनुष्ययोनिमें आता है। उसमें भी वह कुरूप, कुबड़ा, नाटा और चाण्डाल आदि होता है। फिर अवशिष्ट पाप और पुण्यसे युक्त हो, वह क्रमशः ऊँचे चढ़नेवाली योनियोंमें जन्म लेता—शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण, देवता तथा इन्द्र आदिके रूपमें उत्पन्न होता है।
इस प्रकार पाप करनेवाले जीव नरकोंमें नीचे गिरते हैं। अब पुण्यात्मा जीव जिस प्रकार यात्रा करते हैं उसको सुनिये; वे पुण्यात्मा मनुष्य धर्मराजकी बतायी हुई पुण्यमयी गतिको प्राप्त होते हैं। उनके साथ गन्धर्व गीत गाते चलते हैं, अप्सराएँ नृत्य करती रहती हैं तथा वे भाँति-भाँतिके दिव्य आभूषणोंसे सुशोभित हो सुन्दर विमानोंपर बैठकर यात्रा करते हैं। वहाँसे पृथ्वीपर आनेपर वे राजाओं तथा अन्य महात्माओंके कुलमें जन्म लेते और सदाचारका पालन करते हैं। वहाँ उन्हें श्रेष्ठ भोग प्राप्त होते हैं। तदनन्तर शरीर त्यागनेके बाद वे पुनः स्वर्ग आदि ऊपरके लोकोंमें जाते हैं। ऊपरके लोकोंमें होनेवाली गतिको 'आरोहिणी' कहते हैं। फिर वहाँसे पुण्यभोगके पश्चात् जो मृत्युलोकमें उतरना होता है, वह 'अवरोहिणी' गति है। इस अवरोहिणी गतिको प्राप्त होनेपर मनुष्य फिर पहलेकी ही भाँति आरोहिणी गतिको प्राप्त होते हैं। ब्रह्मर्षे ! जीवकी जिस प्रकार मृत्यु होती है, वह सब प्रसङ्ग मैंने आपसे कह सुनाया। अब जिस तरह जीव गर्भमें आता है, उस विषयका वर्णन सुनिये।