भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 47
  • पापोंके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंकी प्राप्ति तथा विपश्चित्‌के पुण्यदानसे पापियोंका उद्धार * ४७

कहना, वेद स्वतः प्रमाण हैं—ऐसी दृष्टि रखना, गुरु, देवता, ऋषि, सिद्ध और महात्माओंका सत्कार करना, साधु पुरुषोंके सङ्गमें रहना, अच्छे कर्मोंका अभ्यास करना, सबके प्रति मित्रभाव रखना तथा और भी जो उत्तम धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाले कार्य हैं, वे सब स्वर्गसे लौटे हुए पुण्यात्मा पुरुषोंके चिह्न हैं—ऐसा विद्वान् पुरुषोंको समझना चाहिये।*

राजन्! अपने-अपने कर्मोंका फल भोगनेवाले पुण्यात्मा और पापियोंसे सम्बन्ध रखनेवाली ये सब बातें मैंने आपको संक्षेपसे बतायी हैं। अच्छा, अब आप आइये; अन्यत्र चलें। इस समय यहाँ सब कुछ आपने देख लिया।

**पुत्र कहता है—**पिताजी! तदनन्तर राजा विपश्चित् यमदूतको आगे करके वहाँसे जानेको उद्यत हुए। यह देख यातनामें पड़े हुए सभी मनुष्योंने चिल्लाकर कहा—'महाराज! हमपर कृपा कीजिये। दो घड़ी और ठहर जाइये। आपके शरीरको छूकर बहनेवाली वायु हमारे चित्तको आनन्द प्रदान करती है और समस्त शरीरोंमें जो सन्ताप, वेदना और बाधाएँ हैं, उनका नाश किये देती है; अतः नरश्रेष्ठ महीपते! हमपर अवश्य कृपा कीजिये।' उनकी यह बात सुनकर राजाने यमदूतसे पूछा—'मेरे रहनेसे इन्हें आनन्द क्योंकर प्राप्त होता है? मैंने मर्त्यलोकमें रहकर कौन-सा महान् पुण्यकर्म किया है, जिससे इन लोगोंपर आनन्ददायिनी वायुकी वृष्टि हो रही है? इस बातको बताओ।'†


* परनिन्दा कृतघ्नत्वं परम्पोषविघ्ननम्।
नैष्ठुर्यं निर्घृणत्वं च परदारोपसेवनम्। परस्वहरणाशौचं देवतानां च कुत्सनम्॥
निकृत्या वञ्चनं नृणां कार्पण्यं च नृणां वधः। यानि च प्रतिषिद्धानि तत्प्रवृत्तिश्च संतता॥
उपलक्ष्याणि जानीयान्नृणानां नरकादनु। दया भूतेषु सद्वादः परलोकप्रतिक्रिया॥
सत्यं भूतहितार्थोक्तिर्वेदप्रामाण्यदर्शनम्। गुरुदेवर्षिसिद्धर्षिपूजनं साधुसङ्गमः॥
सत्क्रियाभ्यसनं मैत्रीमिति बुध्येत पण्डितः। अन्यानि चैव सद्धर्मक्रियाभूतानि यानि च॥
स्वर्गच्युतानां लिङ्गानि पुरुषाणामपापिनाम्॥
(अ० १५। ३१—४४ १/२)

†पुत्र उवाच
ततस्तमग्रतः कृत्वा स राजा गन्तुमुद्यतः। ततश्च सर्वैरुत्क्रुष्टं यातनास्थाथिभिर्नृभिः॥
प्रसादं कुरु भूपेति तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम्। त्वदङ्गसङ्गी पवनो मनो ह्लादयते हि नः॥
परितापं च गात्रेभ्यः पीडाबाधाश्च कृत्स्नशः। अपहन्ति नरव्याघ्र दयां कुरु महीपते॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां तं याम्यपुरुषं नृपः। पप्रच्छ कथमेतेषामाह्लादो मयि तिष्ठति॥
किं मया कर्म तत् पुण्यं मर्त्यलोके महत् कृतम्। आह्लाददायिनी वृष्टिर्येनेयं तदुदोरय॥
(अ० १५। ४७—५१)