भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 48
४८* संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

यमदूतने कहा— राजन्! आपका यह शरीर पितरों, देवताओं, अतिथियों और भृत्यजनोंसे बचे हुए अन्नके सेवनसे पुष्ट हुआ है तथा आपका मन भी इन्हींकी सेवामें संलग्न रहा है। इसीलिये आपके शरीरको छूकर बहनेवाली वायु आनन्ददायिनी जान पड़ती है और इसके लगनेसे इन पापियोंको नरककी यातना कष्ट नहीं पहुँचाती। आपने अश्वमेध आदि यज्ञोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया है; अतः आपके दर्शनसे यमलोकके यन्त्र, शस्त्र, अग्नि और कौए आदि पक्षी, जो पीड़न, छेदन और जलन आदि महान् दुःखके कारण हैं, कोमल हो गये हैं। आपके तेजसे इनका क्रूर स्वभाव दब गया है।

राजा बोले— भद्रमुख! मेरा तो ऐसा विचार है कि पीड़ित प्राणियोंको दुःखसे मुक्त करके उन्हें शान्ति प्रदान करनेसे जो सुख मिलता है, वह मनुष्योंको स्वर्गलोक अथवा ब्रह्मलोकमें भी नहीं प्राप्त होता। यदि मेरे समीप रहनेसे इन दुःखी जीवोंको नरकयातना कष्ट नहीं पहुँचाती तो मैं सूखे काठकी तरह अचल होकर यहाँ रहूँगा।

यमदूतने कहा— राजन्! आइये, अब यहाँसे चलें। आप पापियोंकी इन यातनाओंको यहाँ छोड़कर अपने पुण्यसे प्राप्त हुए दिव्य भोगोंका उपभोग कीजिये।

राजा बोले— जबतक ये लोग अत्यन्त दुःखी रहेंगे तबतक तो मैं यहाँसे नहीं जाऊँगा; क्योंकि मेरे निकट रहनेसे इन नरकवासियोंको सुख मिलता है। जो शरणमें आनेकी इच्छा रखनेवाले आतुर एवं पीड़ित मनुष्यपर, भले ही वह शत्रुपक्षका ही क्यों न हो, कृपा नहीं करता, उस पुरुषके जीवनको धिक्कार है। जिसका मन सङ्कटमें पड़े हुए प्राणियोंकी रक्षा करनेमें नहीं लगता, उसके यज्ञ, दान और तप इहलोक और परलोकमें भी कल्याणके साधन नहीं होते। जिसका हृदय बालक, वृद्ध तथा आतुर प्राणियोंके प्रति कठोरता धारण करता है, मैं उसे मनुष्य नहीं मानता; वह तो निरा राक्षस है। माना, इनके निकट रहनेसे अग्निजनित संतापका कष्ट सहना होगा, नरककी भयानक दुर्गन्धका भोग करना पड़ेगा, भूख-प्यासका महान् दुःख, जो मूर्च्छित कर देनेवाला है, भोगना पड़ेगा; तथापि इन दुखियोंकी रक्षा करनेमें जो सुख है, उसे मैं स्वर्गीय सुखसे भी बढ़कर मानता हूँ। यदि अकेले मेरे दुखी होनेसे बहुत-से आर्त मनुष्योंको सुख प्राप्त होता है तो मुझे कौन-सा सुख नहीं मिला? इसलिये दूत! अब तुम शीघ्र लौट जाओ, मैं यहीं रहूँगा।*


* यमपुरुष उवाच
पितृदेवातिथिभ्रैष्याशिष्टान्नेन तं तनुः। पुष्टिमभ्यागता यस्मात् तद्गतं च मनो यतः॥
तत्सङ्गात्प्रसंसर्गी पवनो ह्लाददायकः। पापकर्मकृतां राजन् यातना न प्रबाधते॥