भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 49

• पापोंके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंकी प्राप्ति तथा विपश्चित्के पुण्यदानसे पापियोंका उद्धार • ४९


**यमदूतने कहा—**महाराज! ये धर्मराज और इन्द्र आपको लेनेके लिये आये हैं। यहाँसे आपको अवश्य जाना है, अतः चले चलिये।चलता हूँ। इस विमानपर चढ़कर चलो, विलम्ब न करो।
**राजाने कहा—**धर्मराज! यहाँ नरकमें हजारों मनुष्य कष्ट भोगते हैं और मुझे लक्ष्य करके आर्त्तभावसे त्राहि-त्राहि पुकार रहे हैं, इसलिये मैं यहाँसे नहीं जाऊँगा। देवराज इन्द्र! और धर्म! यदि आप दोनों जानते हों कि मेरा पुण्य कितना है तो उसे बतानेकी कृपा करें।
**धर्म बोले—**महाराज! जिस प्रकार समुद्रके जलबिन्दु, आकाशके तारे, वर्षाकी धाराएँ, गङ्गाकी बालुकाके कण तथा जलकी बूँदें आदि असंख्य हैं, उसी प्रकार तुम्हारे पुण्यकी भी कोई नियत संख्या नहीं हो सकती। आज यहाँ इन नरकमें पड़े हुए जीवोंपर कृपा करनेसे तुम्हारा पुण्य लाखोंगुना बढ़ गया। नृपश्रेष्ठ! अपने इस पुण्यका फल भोगनेके लिये अब देवलोकमें चलो और ये पापी जीव भी नरकमें रहकर अपने कर्मोंका फल भोगें।
**धर्मराज बोले—**राजन्! तुमने मेरी भलीभाँति उपासना की है, अतः मैं तुम्हें स्वर्गलोकमें ले**राजाने कहा—**देवराज! यदि मेरे समीपमें आनेपर भी इन दुखी जीवोंको कोई ऊँचा पद नहीं प्राप्त हुआ तो मनुष्य मेरे सम्पर्कमें रहनेकी

अश्वमेधादयो यज्ञास्त्वयेष्टा विधिवद् यतः। ततस्त्वद्दर्शनाच्चान्या यन्त्रशस्त्राग्निभावजाः॥
पीडनच्छेददाहादिमहादुःखस्य हेतवः। मृदुत्वमागता राजन् तेजस्याहतास्त्वयि॥
राजोवाच
न स्वर्गं ब्रह्मलोके वा तत् सुखं प्राप्यते नरैः। यदार्तजन्तुनिर्वाणदानोत्थमिति मे मतिः॥
यदि मत्संन्निधावेतान् यातना न प्रबाधते। ततो भद्रमुखात्राहं स्थास्ये स्थाणुरिवाचलः॥
यमपुरुष उवाच
एहि राजन् प्रगच्छामो निजपुण्यसमर्जितान्। भुङ्क्ष्व भोगानपास्येह यातनाः पापकर्मणाम्॥
राजोवाच
तस्मान्न तावद् यास्यामि यावदेते सुदुःखिताः। मत्संन्निधानात् सुखिनो भवन्ति नरकौकसः॥
धिक् तस्य जीवनं पुंसः शरणार्थिनमातुरम्। यो नार्त्तिमनुगृह्णाति वैरिपक्षमपि ध्रुवम्॥
यज्ञादानात्सर्वलोके परत्र च न भूयते। भवन्ति तस्य यस्यार्त्तपरित्राणे न मानसम्॥
नरस्य यस्य कठिनं मनो बालातुरादिषु। वृद्धेषु च न तं मन्ये मानुषं राक्षसो हि सः॥
एतेषां संनिकर्षात्तु पद्मगन्धानिलात्मजम्। तद्योगगन्धजं वापि दुःखं नरकसम्भवम्॥
क्षुत्पिपासाभवं दुःखं यच्च मूर्च्छाप्रदं महत्। एतेषां त्राणदानं तु मन्ये स्वर्गसुखात् परम्॥
प्राप्स्यन्त्यर्त्ता यदि सुखं बहवो दुःखिते मयि। किं तुष्टं तर्हि मया न स्यात् तस्मात् त्वं व्रज मा चिरम्॥
(अ० १५। ५२–६५)