भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 296 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

५० * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


अभिलाषा क्यों करेंगे? अतः मेरा जो कुछ भी पुण्य है, उसके द्वारा ये यातनामें पड़े हुए पापी जीव नरकसे छुटकारा पा जायें।

इन्द्र बोले—राजन्! इस उदारताके कारण तुमने और भी ऊँचा स्थान प्राप्त कर लिया। देखो, ये पापी जीव भी नरकसे मुक्त हो गये।

पुत्र कहता है—पिताजी! तदनन्तर राजा विपश्चित्‌के ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी और स्वयं भगवान् विष्णु उन्हें विमानमें बिठाकर दिव्यधाममें ले गये।* उस समय मैं तथा और भी जितने पापी जीव थे, वे सब नरकयातनासे छूटकर अपने-अपने कर्मफलके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंमें चले गये। द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने इन नरकोंका वर्णन किया; साथ ही पूर्वकालमें मैंने जैसा अनुभव किया था, उसके अनुसार जिस-जिस पापके कारण मनुष्य जिस-जिस योनिमें जाता है, वह सब भी बतला दिया।


दत्तात्रेयजीके जन्म-प्रसङ्गमें एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूयाजीका चरित्र

पिता बोले—बेटा! तुमने अत्यन्त हेय संसारके व्यवस्थित स्वरूपका वर्णन किया, जो घटी-यन्त्रकी भाँति निरन्तर आवागमनशील और प्रवाहरूपसे अविनाशी है। इस प्रकार मैंने इसके स्वरूपको भलीभाँति समझ लिया है। ऐसी स्थितिमें अब मुझे क्या करना चाहिये? यह बताओ।

पुत्र (सुमति) ने कहा—पिताजी! यदि आप शङ्का छोड़कर मेरे वचनोंमें पूर्ण श्रद्धा रखते हैं तो मेरी राय यह है कि आप गृहस्थाश्रमका परित्याग करके वानप्रस्थके नियमोंका पालन


* यमपुरुष उवाच—एष धर्मश्च शक्रश्च त्वां नेतुं समुपागतौ। अवस्थानमदन्तव्यं तस्मात् पार्थिव गम्यताम्॥
धर्म उवाच—नयामि त्वामहं स्वर्गं त्वया सम्यगुपासितः। विमानमेतदारुह्य मा विलम्बस्व गम्यताम्॥
राजोवाच—नरके मानवा धर्म पीड्यन्तेऽत्र सहस्रशः। त्राहीति चार्त्ताः क्रन्दन्ति तन्मतो न व्रजाम्यहम्॥
यदि जानसि धर्म त्वं त्वां वा शक्र शचीपते। मम यावत्प्रमाणं तु शुभं तद्वक्तुमर्हथः॥
धर्म उवाच—अब्बिन्दवो यथाभ्रोंत्था यथा वा दिवि तारकाः। यथा वा वर्षतो धारा गङ्गायां सिकता यथा॥
असंख्येया महाराज यथा विन्द्याटव्यां तृणाम्। तथा तथापि पुण्यस्य संख्या नैवोपपद्यते॥
अनुकम्पामिमाञ्चाद्य भारूढेऽसि कुर्वतः। तदेव राजशार्दूल संख्येयानुपगतं तव॥
तद् गच्छ त्वं नृपश्रेष्ठ तद्भौङ्क्तुममरालयम्। एतेऽपि पापं नरके शमयन्तु स्वकर्मजम्॥
राजोवाच—कथं स्पृहां करिष्यन्ति मदङ्गेभ्यो मुदिता मानवाः। यदि मत्संनिधावेषामनुकल्पो नोपजायते॥
तस्माद् यत् सुकृतं किञ्चिन्ममास्ति त्रिदशाधिप। तेन मुञ्चन्तु नरकात् पापिनो यातनां गताः॥
इन्द्र उवाच—एवमुच्चैस्तरं स्थानं त्वयावाप्तं महोदय। एतांश्च नरकात् पश्य विमुक्तान् पापकारिणः॥
पुत्र उवाच—अथोऽपतत् पुष्पवृष्टिस्तस्योपरि महीपतेः। विमानं चारुरोहैनं स्वलोकं नयत हरिः॥
(अ० १५। ६६—६८, ७०—७८)