संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- दत्तात्रेयजीके जन्म-प्रसङ्गमें एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूयाजीका चरित्र * ५१
कीजिये। वानप्रस्थ आश्रमके कर्तव्यका भलीभाँति अनुष्ठान करके फिर आहवनीय आदि अग्नियोंका संग्रह भी छोड़ दीजिये और आत्मा (बुद्धि) को आत्मामें लगाकर द्वन्द्वरहित एवं परिग्रहशून्य हो जाइये। एकान्तमें रहते हुए अपने मनको वशमें कीजिये और आलस्य छोड़कर भिक्षु (संन्यासी)-का जीवन व्यतीत कीजिये। संन्यासाश्रममें योगपरायण होकर बाह्य विषयोंके सम्पर्कसे अलग हो जाइये। इससे आपको उस योगकी प्राप्ति होगी, जो दुःख-संयोगको दूर करनेकी ओषधि, मोक्षका साधन, तुलनारहित, अनिर्वचनीय एवं असङ्ग है और जिसका संयोग प्राप्त होनेपर आपको फिर संसारी जीवोंके सम्पर्कमें नहीं आना पड़ेगा।
**पिता बोले—**बेटा! अब तुम मुझे मोक्षके साधनभूत उस उत्तम योगका उपदेश दो, जिससे मैं फिर संसारी जीवोंके सम्पर्कमें आकर ऐसा दुःख न उठाऊँ। यद्यपि आत्मा स्वभावतः सब प्रकारके योगसे रहित है तो भी जिस योगमें आसक्त होनेपर मेरे आत्माका सांसारिक बन्धनोंसे योग न हो, उसी योगको इस समय मुझे बताओ। संसाररूपी सूर्यके प्रचण्ड तापकी पीड़ासे मेरे शरीर और मन दोनों सूख रहे हैं। तुम ब्रह्मज्ञानरूपी जलकी शीतलतासे युक्त अपने वचनरूपी सलिलसे इन्हें सींच दो। मुझे अविद्यारूपी काले नागने डस लिया है। मैं उसके विषसे पीड़ित होकर मर रहा हूँ। तुम अपने वचनामृतसे मुझे पुनः जीवित कर दो। मैं स्त्री-पुत्र, घर-द्वार, खेती-बारीकी ममतारूपी बेड़ीमें जकड़ा जाकर कष्ट पा रहा हूँ; तुम प्रिय एवं उत्तम भावसे युक्त विज्ञानद्वारा इस बन्धनको खोलकर मुझे शीघ्र मुक्त करो।
**पुत्रने कहा—**पिताजी! पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् दत्तात्रेयजीने राजा अलर्कको उनके पूछनेपर जिस योगका भलीभाँति विस्तारपूर्वक उपदेश किया था, वही आपको बता रहा हूँ; सुनिये।
**पिता बोले—**दत्तात्रेयजी किसके पुत्र थे? उन्होंने किस प्रकार योगका उपदेश किया था और महाभाग अलर्क कौन थे, जिन्होंने योगके विषयमें प्रश्न किया था?
**पुत्रने कहा—**प्रतिष्ठानपुरमें एक कौशिक नामक ब्राह्मण था। वह पूर्वजन्ममें किये हुए पापोंके कारण कोढ़के रोगसे व्याकुल रहने लगा। ऐसे घृणित रोगसे युक्त होनेपर भी उसे उसकी पत्नी देवताकी भाँति पूजती थी। वह अपने पतिके पैरोंमें तेल मलती, उसका शरीर दबाती, अपने हाथसे उसे नहलाती, कपड़े पहनाती और भोजन कराती थी; इतना ही नहीं, उसके थूक, खँखार, मल-मूत्र और रक्त भी वह स्वयं ही धोकर साफ करती थी। वह एकान्तमें भी पतिकी सेवा करती और उसे मीठी वाणीसे प्रसन्न रखती थी। इस प्रकार अत्यन्त विनीत भावसे वह सदा अपने स्वामीकी पूजा किया करती तो भी अधिक क्रोधी स्वभावका होनेके कारण वह निष्ठुर प्रायः अपनी पत्नीको फटकारता ही रहता था। इतनेपर भी वह उसके पैरों पड़ती और उसे देवताके समान समझती थी। यद्यपि उसका शरीर अत्यन्त घृणाके योग्य था तो भी वह साध्वी उसे सबसे श्रेष्ठ मानती थी। कौशिकसे चला-फिरा नहीं जाता था तो भी एक दिन उसने अपनी पत्नीसे कहा—'धर्मज्ञे! उस दिन मैंने घरपर बैठे-बैठे ही सड़कपर जिस वेश्याको जाते देखा था, उसके घरमें आज मुझे ले चलो। मुझे उससे मिला दो। वही मेरे हृदयमें बसी हुई है। जबसे मैंने उसे देखा है, तबसे वह मेरे मनसे दूर नहीं होती। यदि वह आज मेरा आलिङ्गन नहीं करेगी तो कल तुम मुझे मरा हुआ देखोगी। मनुष्योंके लिये कामदेव प्रायः टेढ़ा होता है। उस वेश्याको बहुत लोग चाहते हैं और मुझमें उसके पासतक जानेकी शक्ति नहीं है; इसलिये आज मुझे बड़ा सङ्कट प्रतीत होता है।'
अपने कामातुर स्वामीका यह वचन सुनकर