संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५२ | * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण * |
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उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई इस परम सौभाग्यशालिनी पतिव्रता पत्नीने अपनी कमर खूब कस ली और अधिक शुल्क लेकर पतिको कंधेपर चढ़ा लिया। फिर धीरे-धीरे वेश्याके घरकी ओर प्रस्थान किया। रात्रिका समय था, आकाश मेघोंसे आच्छन्न हो रहा था। केवल बिजलीके चमकनेसे मार्ग दिखायी दे जाता था। ऐसी वेलामें वह ब्राह्मणी अपने पतिका अभीष्ट साधन करनेके लिये राजमार्गसे जा रही थी। मार्गमें सूली थी, जिसके ऊपर चोर न होते हुए भी चोरके सन्देहसे माण्डव्य नामक ब्राह्मणको चढ़ा दिया गया था। वे दुःखसे आतुर हो रहे थे। कौशिक पत्नीके कंधेपर बैठा था, उस अन्धकारमें देख न सकनेके कारण उसने अपने पैरोंसे छूकर सूलीको हिला दिया। इससे कुपित होकर माण्डव्यने कहा—'जिसने पैरसे हिलाकर मुझे इस कष्टकी दशामें पहुँचा दिया और मुझे अत्यन्त दुखी कर दिया, वह पापात्मा नराधम सूर्योदय होनेपर विवश हो निस्सन्देह अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा। सूर्यका दर्शन होते ही उसका विनाश हो जायगा।' इस अत्यन्त दारुण शापको सुनकर उसकी पत्नी व्यथित होकर बोली—'अब सूर्यका उदय ही नहीं होगा।'* तदनन्तर सूर्योदय न होनेके कारण चराचर रात ही रहने लगी। कितने ही दिनोंके बराबर समय रातभरमें ही बीत गया। इससे देवताओंको बड़ा भय हुआ। वे सोचने लगे—स्वाध्याय, वषट्कार, स्वधा (श्राद्ध) तथा स्वाहा (यज्ञ)-से रहित होकर यह सारा जगत् नष्ट हुए बिना कैसे रह सकता है। दिन-रातकी व्यवस्था हुए बिना मास और ऋतुका भी लोप हो जायगा। उनके लोप होनेसे दक्षिणायन और उत्तरायणका भी ज्ञान नहीं होगा। अयनका ज्ञान हुए बिना वर्ष कैसे हो सकता है, और वर्षके बिना कालका ज्ञान होना असम्भव है। पतिव्रताके वचनसे सूर्यका उदय ही नहीं होता; उसके बिना स्नान, दान आदि क्रियाएँ बंद हो गयीं। अग्निहोत्र और यज्ञका अभाव भी दृष्टिगोचर होने लगा है। होमके बिना हमलोगोंकी तृप्ति नहीं होती। जब मनुष्य यज्ञका यथोचित भाग देकर हमें तृप्त करते हैं, तब हम खेतोंकी उपजके लिये वर्षा करके मनुष्योंपर अनुग्रह करते हैं। नया अन्न पैदा होनेपर मनुष्य फिर हमारे लिये यज्ञ करते हैं और हमलोग यज्ञादिद्वारा पूजित होनेपर उन्हें मनोवाञ्छित भोग प्रदान करते हैं। हम नीचेकी ओर वर्षा करते हैं और मनुष्य ऊपरकी ओर। हम जलकी वर्षासे मनुष्योंको और मनुष्य हविष्यकी वर्षासे हमलोगोंको तृप्त करते हैं। जो दुरात्मा लोभवश हमारा यज्ञभाग स्वयं खा लेते हैं, उन अपकारी पापियोंके नाशके लिये हम जल, सूर्य, अग्नि, वायु तथा पृथ्वीको भी दूषित कर देते हैं। उन दूषित वस्तुओंका उपयोग करनेसे उन कुकर्मियोंको मृत्युके लिये भयङ्कर महामारी आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
* तस्य भार्या ततः श्रुत्वा तं शापमतिदारुणम् । प्रोवाच व्यथिता सूर्यो नैवोदेष्यत्युदर्धितः । (१६ । ३१)