भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 54

५४ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


सत्कारपूर्वक पूजा करता है, उसके भी पुण्यका आधा भाग स्त्री अनन्यचित्तसे पतिकी सेवा करनेमात्रसे प्राप्त कर लेती है।*

अनसूयाजीका वचन सुनकर पतिव्रता ब्राह्मणीने बड़े आदरके साथ उनका पूजन किया और इस प्रकार कहा—'स्वभावतः सबका कल्याण करनेवाली देवी! स्वयं आप यहाँ पधारकर पतिकी सेवामें मेरी पुनः श्रद्धा बढ़ा रही हैं। इससे मैं धन्य हो गयी। यह आपका मुझपर बहुत बड़ा अनुग्रह है। इसीसे देवताओंने भी आज मुझपर कृपादृष्टि की है। मैं जानती हूँ कि स्त्रियोंके लिये पतिके समान दूसरी कोई गति नहीं है। पतिमें किया हुआ प्रेम इहलोक और परलोकमें भी उपकार करनेवाला होता है। यशस्विनि! पतिके प्रसादसे ही नारी इस लोक और परलोकमें भी सुख पाती है; क्योंकि पति ही नारीका देवता है। महाभागे! आज आप मेरे घरपर पधारी हैं। मुझसे अथवा मेरे इन पतिदेवसे आपको जो भी कार्य हो, उसे बतानेकी कृपा करें।†

अनसूयोवाच एते देवाः सहेन्द्रेण मामुपागम्य दुःखिताः।
त्वद्वाक्यापास्तसत्कर्मदिननक्तनिरूपणाः ॥
याचन्तेऽहर्निशासंस्थां यथावदविखण्डिताम्।
अहं तदर्थमायाता शृणु चैतद्वचो मम॥
दिनाभावात् समस्तानाम्भावो यागकर्मणाम्।
तदभावात् सुराः पुष्टिं नोपयान्ति तपस्विनि॥
अह्नश्चैव समुच्छेदादुच्छेदः सर्वकर्मणाम्।
तदुच्छेदादनावृष्ट्या जगदुच्छेदमेष्यति॥
तत्त्वमिच्छसि चेदेतज्जगदुद्धर्तुमापदः।
प्रसीद साध्वि लोकानां पूर्ववद्वर्त्ततां रविः॥


अनसूया बोलीं—देवि! तुम्हारे वचनसे दिन-रातकी व्यवस्थाका लोप हो जानेके कारण शुभ कर्मोंका अनुष्ठान बंद हो गया है; इसलिये ये इन्द्र आदि देवता मेरे पास दुःखी होकर आये हैं और प्रार्थना करते हैं कि दिन-रातकी व्यवस्था पहलेकी तरह अखण्डरूपसे चलती रहे। मैं उसीके लिये तुम्हारे पास आयी हूँ। मेरी यह बात सुनो। दिन न होनेसे समस्त यज्ञकर्मोंका अभाव हो गया है और यज्ञोंके अभावसे देवताओंकी पुष्टि नहीं हो पाती है; अतः तपस्विनि! दिनके नाशसे समस्त शुभ कर्मोंका नाश हो जायगा और उनके नाशसे वृष्टिमें बाधा पड़नेके कारण इस संसारका ही उच्छेद हो जायगा। अतः यदि तुम इस जगत्को आपत्तिसे बचाना चाहती हो तो सम्पूर्ण लोकोंपर दया करो, जिससे पहलेकी भाँति सूर्योदय हो।

ब्राह्मण्युवाच माण्डव्येन महाभागे शप्तो भर्ता ममेश्वरः।
सूर्योदये विनाशं त्वं प्राप्स्यसीत्यतिमन्युना॥

ब्राह्मणीने कहा—महाभागे! माण्डव्य ऋषिने अत्यन्त क्रोधमें भरकर मेरे स्वामी—मेरे ईश्वरको शाप दिया है कि सूर्योदय होते ही तेरी मृत्यु हो जायगी।

अनसूयोवाच यदि वा रोचते भद्रे ततस्त्वद्वचनादहम्।
करोमि पूर्ववद्देहं भर्तारं च नवं तव॥
मया हि सर्वथा स्त्रीणां माहात्म्यं वरवर्णिनि।
पतिव्रतानामाराध्यमिति सम्मान्यासि ते॥

अनसूया बोलीं—कल्याणी! यदि तुम्हारी इच्छा हो और तुम कहो तो मैं तुम्हारे पतिको पूर्ववत् शरीर एवं नयी स्वस्थ अवस्थाका कर दूँगी।


* नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न श्राद्धं नाप्युपोषितम्। भर्तृशुश्रूषयैवैतान् लोकांनिष्टान् ब्रजन्ति हि॥
तस्मात् साध्वि महाभागे पतिशुश्रूषणं प्रति। त्वया गतिः सदा कार्या यतो भर्त्ता परा गतिः॥
यद्देवेभ्यो यच्च पित्रागतेभ्यः कुर्याद्धनीयार्चनं शक्तिभावः। तस्यान्वद्धं केवलानन्यचित्ता नारी भुङ्क्ते भर्तृशुश्रूषयैव॥ (१६।६१-६३)
† स त्वं ब्रूहि महाभागे प्रसाद्य मम मन्दिरम्। आर्याया कस्यवा कार्ये मयाऽऽद्यैणापि वा श्रुते॥ (१६।६८)

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