भारतकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 55
  • दत्तात्रेयजीके जन्म-प्रसङ्गमें एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूयाजीका चरित्र * ५५

सुन्दरी! मुझे पतिव्रता स्त्रियोंके माहात्म्यका सर्वथा आदर करना है, इसीलिये तुम्हें मनाती हूँ।

पुत्र उवाच
तथेत्युक्ते तया सूर्यमाजुहाव तपस्विनी।
अनसूयार्घ्यमुद्यम्य दशरात्रे तदा निशि॥
ततो विवस्वान् भगवान् फुल्लपद्मारुणाकृतिः।
शैलराजानमुदयमारुरोहोरुमण्डलः ॥
समनन्तरमेवास्या भर्ता प्राणैर्व्ययुज्यत।
पपात च महीपृष्ठे पतन्तं जगृहे च सा॥

पुत्र (सुमति) कहता है—ब्राह्मणीके 'तथास्तु' कहकर स्वीकार करनेपर तपस्विनी अनसूयाने अर्घ्य हाथमें लेकर सूर्यदेवका आवाहन किया। उस समयतक दस दिनोंके बराबर रात बीत चुकी थी। तदनन्तर भगवान् सूर्य खिले हुए कमलके समान अरुण आकृति धारण किये अपने महान् मण्डलके साथ गिरिराज उदयाचलपर आरूढ़ हुए। सूर्यदेवके प्रकट होते ही ब्राह्मणीका पति प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिरा; किन्तु उसकी पत्नीने गिरते समय उसे पकड़ लिया।

अनसूयोवाच
न विषादस्त्वया भद्रे कर्तव्यः पश्य मे बलम्।
पतिशुश्रूषयावाप्तं तपसः किं चिरेण ते॥
यथा भर्तृसमं नान्यमपश्यं पुरुषं क्वचित्।
रूपतः शीलतो बुद्ध्या वाङ्माधुर्यादिभूषणैः॥
तेन सत्येन विप्रोऽयं व्याधिमुक्तः पुनर्युवा।
प्राप्नोतु जीवितं भार्यासहायः शरदां शतम्॥
यथा भर्तृसमं नान्यमहं पश्यामि दैवतम्।
तेन सत्येन विप्रोऽयं पुनर्जीवत्वनामयः॥
कर्मणा मनसा वाचा भर्तुराराधनं प्रति।
यथा ममोद्यमो नित्यं तथायं जीवताद् द्विजः ॥

अनसूया बोलीं—भद्रे! तुम विषाद न करना। पतिकी सेवासे जो तपोबल मुझे प्राप्त हुआ है, उसे तुम अभी देखो; विलम्बकी क्या आवश्यकता? मैंने जो रूप, शील, बुद्धि एवं मधुर भाषण आदि सद्गुणोंमें अपने पतिके समान दूसरे किसी पुरुषको कभी नहीं देखा है, उस सत्यके प्रभावसे यह ब्राह्मण रोगसे मुक्त हो फिरसे तरुण हो जाय और अपनी स्त्रीके साथ सौ वर्षोंतक जीवित रहे। यदि मैं स्वामीके समान और किसी देवताको नहीं समझती तो उस सत्यके प्रभावसे यह ब्राह्मण रोगमुक्त होकर पुनः जीवित हो जाय। यदि मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा मेरा सारा उद्योग प्रतिदिन स्वामीकी सेवाके ही लिये होता हो तो यह ब्राह्मण जीवित हो जाय।

पुत्र उवाच
ततो विप्रः समुत्तस्थौ व्याधिमुक्तः पुनर्युवा।
स्वभाभिर्भासयन् वेश्म वृन्दारक इवाजरः॥
ततोऽपतन् पुष्पवृष्टिर्देववाद्यादिनिःस्वनः।
लेभिरे च मुदं देवा अनसूयामथाब्रुवन् ॥

पुत्र कहता है—पिताजी! अनसूयादेवीके इतना कहते ही वह ब्राह्मण अपनी प्रभासे उस भवनको प्रकाशमान करता हुआ रोगमुक्त तरुण शरीरसे जीवित हो उठा, मानो जरावस्थासे रहित देवता हो। तदनन्तर दुन्दुभि आदि देवताओंके बाजोंकी आवाजके