संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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साथ वहाँ फूलोंकी वर्षा होने लगी। देवताओंको बड़ा आनन्द मिला। वे अनसूयादेवीसे कहने लगे।
देवता बोले— कल्याणी! आपने देवताओंका बहुत बड़ा कार्य किया है। तपस्विनी! इससे प्रसन्न होकर देवता आपको वर देना चाहते हैं। आप कोई वर माँगें।
अनसूयाने कहा— यदि ब्रह्मा आदि देवता मुझपर प्रसन्न होकर वर देना चाहते हैं, यदि आपलोगोंने मुझे वर देनेके योग्य समझा है तो मेरी यही इच्छा है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव मेरे पुत्रके रूपमें प्रकट हों तथा अपने स्वामीके साथ मैं उस योगको प्राप्त करूँ, जो समस्त क्लेशोंसे मुक्ति देनेवाला है।
यह सुनकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंने 'एवमस्तु' कहा और तपस्विनी अनसूयाका सम्मान करके वे सब-के-सब अपने-अपने धामको चले गये।
दत्तात्रेयजीके जन्म और प्रभावकी कथा
पुत्र (सुमति) कहता है— तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होनेके बाद ब्रह्माजीके द्वितीय पुत्र महर्षि अत्रिने अपनी परमसाध्वी पत्नी अनसूयाको देखा, जो ऋतुस्नान कर चुकी थीं। वे सर्वाङ्गसुन्दरी थीं। उनका रूप मनको लुभानेवाला था। उन्हें देखकर मुनिने कामयुक्त होकर मन-ही-मन उनका चिन्तन किया। उनके चिन्तन करते समय जो विकार प्रकट हुआ, उसे वेगयुक्त वायुने इधर-उधर और ऊपरकी ओर पहुँचा दिया। वह अत्रिमुनिका तेज ब्रह्मस्वरूप, शुक्लवर्ण, सोमरूप एवं व्योमग था। जब वह गिरने लगा तो उसे दसों दिशाओंने ग्रहण कर लिया। वही प्रजापति अत्रिके मानस-पुत्र चन्द्रमाके रूपमें अनसूयासे उत्पन्न हुआ, जो समस्त प्राणियोंके जीवनका आधार है। भगवान् विष्णुने सन्तुष्ट होकर अपने श्रीविग्रहसे सत्त्वमय तेजको प्रकट किया। उसीसे दत्तात्रेयजीका जन्म हुआ। भगवान् विष्णुने ही दत्तात्रेयके नामसे प्रसिद्धि प्राप्त करके अनसूयाका स्तनपान किया। वे अत्रिके द्वितीय पुत्र थे। हैहयराज कृतवीर्य बड़ा उद्दण्ड था। उसने एक बार महर्षि अत्रिका अपमान कर दिया। यह देख अत्रिके तृतीय पुत्र दुर्वासा, जो अभी माताके गर्भमें ही थे, क्रोधमें भरकर सात ही दिनोंमें माताके उदरसे बाहर निकल आये। गर्भावासजनित महान् आयास तथा पिताके अपमानजनित दुःख और अमर्षसे युक्त होकर वे हैहयराजको तत्काल भस्म कर डालनेको उद्यत हो गये थे। वे तमोगुणके उत्कर्षसे युक्त साक्षात् भगवान् रुद्रके अंश थे। इस प्रकार अनसूयाके गर्भसे ब्रह्मा, विष्णु और शिवके अंशभूत तीन पुत्र उत्पन्न हुए। चन्द्रमा ब्रह्माके अंशसे हुए थे, दत्तात्रेय श्रीविष्णुभगवान्के स्वरूप थे और दुर्वासाके रूपमें साक्षात् भगवान् शङ्करने ही अवतार लिया था।* देवताओंके वरदान देनेके कारण ये तीनों देवता वहाँ प्रकट हुए थे। चन्द्रमा अपनी शीतल किरणोंसे तृण, लता, वल्ली, अन्न तथा मनुष्योंका पोषण करते हैं और सदा स्वर्गमें रहते हैं; वे प्रजापतिके अंश हैं। दत्तात्रेय दुष्ट दैत्योंका संहार करके प्रजाकी रक्षा करते हैं। वे शिष्टजनोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। उन्हें भगवान् विष्णुका अंश जानना चाहिये। दुर्वासा अपमान करनेवालेको भस्म कर डालते हैं। वे शरीर, दृष्टि, मन और वाणीसे भी उद्धत स्वभावके हैं और रुद्रभावका आश्रय लेकर रहते हैं। इस प्रकार प्रजापति महर्षि अत्रिने स्वयं ही चन्द्रमाको प्रकट किया। श्रीविष्णुरूप दत्तात्रेयजी योगस्थ रहकर विषयोंका अनुभव
* सोमो ब्रह्मभवोऽप्येवं दत्तात्रेयोऽभवत्परः। दुर्वासाः शङ्करो जज्ञे वरदानाद्दिवौकसाम्॥ (१७।११)